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दो दशकों की गवाही

यह हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील परंपरा की बहुआयामिता कहिए, या प्रगतिशील आंदोलन की व्यापकता कि हिन्दी साहित्य में आधिकारिक रूप से कोई दक्षिणपंथ नहीं मौजूद है, ले-देके इन प्रवृत्तियों का जो पोषक समूह मौजूद है, वह कलावादियों के रूप में मौजूद रहा है। ऐसी स्थिति में (कम से कम हिन्दुस्तान में तो जरूर) लिबास बदलने वाले ‘उत्तर’ मार्क्सवादियों के लिए पूँजीपति-बुर्जुआ वर्ग की गोद में बैठने के सिवा कोई और विकल्प शेष नहीं था।

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