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विचार बनाम तर्क

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गाँधीवाद हो या मार्क्सवाद या फिर अम्बेडकरवाद इन तीनों विचारधाराओं के अनुयायियों ने उनके आदर्शों और विचारों की फ़जीहत ही की है । ये जो फ़जीहत हुई है इसमें पूंजीवादी व्यवस्था और उपभोक्तावाद की सबसे बड़ी भूमिका रही है । आज हर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुविधाओं को इकट्ठा करने में लगा हुआ है। पूंजीवाद और उपभोक्तावाद की सबसे बड़ी सफलता यही रही है कि इसने लोगों का ज़िन्दगी के प्रति नज़रिया बदल दिया है । हर व्यक्ति आजकल एक shortcut रास्ता अपनाना चाहता है । सफलता को पाने का shortcut । बहुत कम लोग विचारों और आदर्शों के पालन के लिए ज़रूरी कष्ट सहने के लिए तैयार हैं । दलितों के उत्थान और एक समतामूलक समाज की स्थापना जिसमें दलितों को बराबरी और सम्मान के साथ एक इज़्ज़तदार ज़िन्दगी जीने का अधिकार हो । इसके लिए समाज में एक लम्बी लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है । इस लड़ाई को लड़ने के लिए कई लोगों को अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़कर विचार और आदर्श पर आधारित ज़िन्दगी जीना होगा । आज कितने लोग दलितों की इस लड़ाई का बीड़ा उठाने के लिए तैयार हैं । आज दलितों में भी आपस में ही जाति आधारित गैर-बराबरी बनी हुई है और दलित स्वयं भी जाति और जातिगत रीति-रिवाजों का पालन करते हैं । जाति आन्दोलन जाति तोड़ो आन्दोलन होने के बजाय आरक्षण लागू कराने के आन्दोलन व जाति आधारित राजनीति तक सीमित होकर रह गया है । अन्य दूसरे वर्गों तथा लोगों की तरह बहुत से दलित भी इसी कोशिश में लगेहुए हैं कि कैसे उनकी (व्यक्तिगत) आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो और वो समाज में अन्य दलित भाईयों-साथियों को छोड़कर अपनी हाशिए की स्थिति से बाहर आ जाय । पूंजीवाद ने लोगों को इस भ्रम में डाल रखा है ये सम्भव है कि सारे दलित यदि व्यक्तिगत प्रयास करें तो इस हाशिए की स्थिति से बाहर आ सकते हैं पर जब तक व्यवस्था परिवर्तन नहीं होगा और समतामूलक समाज की स्थापना नहीं होगी तब तक ये सम्भव नहीं है । Gandhivad, Marxvad, Ambedkarvadइस हाशिए की स्थिति से बाहर निकलने के लिए दलितों के प्रयास व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होने होंगे । एक और चालाकी पूंजीवाद ने की है कि वो ये कि आर्थिक सुदृढ़ता को ही सामाजिक उत्थान का पर्याय मान लिया गया है, दलितों व दलितों के लिए गैर दलित समर्थकों द्वारा ।सूरजपाल चौहान Surajpal Chauhan ने अपने एक लेख “एक विचारणीय मुद्दा” Ek Vicharniya Mudda (५फरवरी२०१२) जनसत्ता में लिखाहै कि “आज अगर हिन्दू धर्म जिन्दा है तो देश के दलितों के कारण ही । धर्म के नाम पर जागरण करने वाले भी यही हैं और इन जागरणों को आयोजित कराने वाले भी यही हैं ।” हिन्दू धर्म के जारी रहने की जिम्मेदारी दलितों के ऊपर थोपना तो उचित नहीं है, लेकिन इस बात में सच्चाई है कि बहुत से दलित भी हिन्दू धर्म को बनाए रखने में बढ़ कर भाग ले रहे हैं । आश्चर्यजनक बात तो यह है कि सूरजपाल चौहान जी ने इस समस्या के लिए डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar को दोषी ठहराया है । वह लिखते हैं कि “इस बात के लिए दलितों के मुक्तिदाता डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar कम जिम्मेदार नहीं हैं । शुरू-शुरू में उन्होंने हिन्दुओं के मन्दिरों में दलित प्रवेश को लेकर बड़े पैमाने पर आन्दोलन किए थे । उन्हीं आन्दोलनों का आज तक इतना गहरा असर है कि देश के दलित मंदिर प्रवेश की लड़ाई में अपना समय नष्ट करने में लगे हुए हैं । जबकि कटु सत्य यह है कि दलितों के देवी-देवता हिन्दू देवी-देवताओं से अलग हैं ।”सूरजपाल जी को पता होना चाहिए कि जब डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar ने यह आन्दोलन किया था तब हमारे देश में दलितों को यह अधिकार नहीं था कि वो एक मनुष्य की ज़िन्दगी जी सके । सिर्फ एक सौ वर्ष पहले तक भारत में दलितों की स्थिति इतनी नारकीय थी कि दास और पशु उनके मुकाबले बेहतर थे । दास और पशु को उनके स्वामी छू सकते थे, पर दलितों को छूना तो दूर, सवर्ण हिन्दू उनकी परछाई तक से अपवित्र हो जाते थे और स्नान के बाद ही शुद्ध होते थे । उन्हें न सार्वजनिक कुओं, तालाबों से पानी लेने का अधिकार था और न विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने का यहाँ तक कि मन्दिर के दरवाजे भी उनके लिए पूरी तरह से बन्द थे । दलित इसे अपनी नियति समझ कर जी रहे थे । न उनमें किसी प्रकार का अपनी स्थिति-बोध था और न ही अपने अधिकारों का ज्ञान ।

एक ऐसे समय में डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar ने दलितों के हित के लिए दलित आन्दोलन चलाया जब कांग्रेस और महात्मा गाँधी अंग्रेजी दासता के विरूद्ध भारत-मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे थे । इसी भारत-मुक्ति ने दलितों की मुक्ति का भी मार्ग खोला । जब हिन्दुओं को पराधीनता सहन नहीं है, तो दलितों को पराधीनता कैसे सहन हो सकती है? यदि अंग्रेजी सत्ता से भारत को मुक्ति चाहिए थी तो हिन्दू सत्ता से दलितों को भी मुक्ति चाहिए थी । भारत की स्वाधीनता भारतवासियों के स्वाधीन होने में ही सुरक्षित थी । यदि भारत स्वाधीन हो गया और करोड़ों दलित भारतीयों को स्वाधीनता नहीं मिली, तो भारत की स्वाधीनता का कोई मूल्य नहीं था । वह पुनः कभी भी पराधीन हो सकता है । इस विचार के साथ डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने दलित-स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी ।

भारत में दलित आन्दोलन का एक लम्बा इतिहास रहा है । डॉ.अम्बेडकर ने सर्वप्रथम अपनी भूमिका इस आन्दोलन को सीधी लड़ाई से जोड़ने में निभायी । डॉ.अम्बेडकर ने दो सत्याग्रह किए पहला महाड़ का जल सत्याग्रह और दूसरा नासिक का धर्म सत्याग्रह । वैसे देखा जाय तो सत्याग्रह गाँधी जी का अस्त्र था, जिसे वह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ उपयोग में लाते थे । डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar ने इसी अस्त्र को हिन्दू सत्ता के खिलाफ उपयोग किया ।

धर्म सत्याग्रह डॉ.अम्बेडकर ने नासिक में काला राम मन्दिर में दलितों के प्रवेश के अधिकार के लिए आरम्भ किया था । २मार्च १९३० को गाँधी जी Gandhi Ji ने अपना सविनय आन्दोलन प्रारम्भ किया था ठीक उसी दिन डॉ.अम्बेडकर ने नासिक में हजारों अछूतों को लेकर काला राम मन्दिर की ओर कूच किया । गाँधी जी का आन्दोलन ब्रिटिश निरंकुशता के खिलाफ था तो डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar का आन्दोलन हिन्दू निरंकुशता के खिलाफ था । गाँधी जी Gandhi Ji के आन्दोलन का दमन अंग्रेजी शासन ने किया, तो डॉ.अम्बेडकर के धर्म सत्याग्रह आन्दोलन को सवर्ण हिन्दुओं ने सत्याग्रही अछूतों पर हमला करके कुचल दिया । अछूतों और हिन्दुओं के बीच खुला संघर्ष हुआ । इसमें डॉ.अम्बेडकर सहित कई लोगों को चोट भी आयी । फिर भी अछूतों का जोश कम नहीं हुआ । फलस्वरूप मन्दिर के प्रबन्धकों ने एक साल के लिए मन्दिर का दरवाजा ही बन्द कर दिया ।

दलित वर्गों के लोग एक निर्णायक लड़ाई लड़ना चाहते थे । वे तब तक आन्दोलन करना चाहते थे जब तक कि मन्दिर के दरवाजे उनके लिए खोल न दिए जायें । किन्तु डॉ.अम्बेडकर इस सत्याग्रह को लम्बे समय तक चलाने के पक्षधर नहीं थे । अतः उन्होंने इसे स्थगित कर दिया । इसका कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि मन्दिर आन्दोलन इसलिए नहीं किया गया था कि मन्दिर में बैठे हुए “भगवान”अछूतों के कष्ट दूर कर देंगे । यह आन्दोलन इसलिए आरम्भ किया गया था कि उन्होंने यह अनुभव किया था कि वह दलित वर्गों को ऊर्जा देने और उन्हें वास्तविक स्थिति का बोध कराने का बेहतर मार्ग था । इस सत्याग्रह से उनका यह उद्देश्य पूरा हो गया है और इसलिए अब मन्दिर प्रवेश आन्दोलन की कोई आवश्यकता नहीं है । इसके स्थान पर उन्होंने दलित वर्गों को अपनी ऊर्जा राजनीति पर केन्द्रित करने की सलाह दी ।

डॉ.अम्बेडकर का मानना था कि वर्णव्यवस्था ही जाति भेद और अस्पृश्यता का मूल है । वर्णव्यवस्था को नष्ट किए बिना न जाति भेद समाप्त हो सकता है और न अस्पृश्यता दूर किया जा सकता है । हिन्दू नेताओं ने कुछ समय बाद दलित वर्गों से मन्दिर प्रवेश आन्दोलन को समर्थन देने की अपील की थी । किन्तु डॉ.अम्बेडकर इसके पीछे की राजनीति को जानते थे । इसलिए उन्होंने अपना एक लम्बा वक्तव्य १४ फरवरी १९३३ को प्रेस को दिया । उनके इस वक्तव्य ने जहाँ दलितों में सम्मान की भावना पैदा की, वहाँ हिन्दुओं को भी यह स्पष्ट शब्दों में अवगत कराया कि “दलितों की मंजिल मन्दिर नहीं है ।”

इस वक्तव्य में उन्होंने कहा था कि –“अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए, भारत में यूरोपियन क्लबों के दरवाजों पर लिखा होता था – कुत्तों और भारतीयों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है । आज हिन्दुओं के मन्दिरों पर भी ऐसे ही बोर्ड टंगे हैं । अन्तर सिर्फ यह है कि उनमें जानवर प्रवेश कर सकते हैं, परन्तु दलितों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है । दोंनो मामलों में स्थिति एक सी है । किन्तु भारतीयों ने अपना स्वाभिमान त्यागकर कभी भी यूरोपियों से उनके क्लबों में जाने की भीख नहीं मांगी । क्या फिर दलित ही अपना स्वाभिमान त्याग कर उन मन्दिरों में प्रवेश करना चाहते हैं, जहाँ से हिन्दुओं ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया है? दलितों के मन्दिरों के दरवाजे खुलें या न खुलें – इस प्रश्न पर हिन्दुओं को सोचना है न कि दलितों को इसके लिए आन्दोलन चलाना है । यदि हिन्दू सोचते हैं कि मनुष्यता की पवित्रता का अनादर करना बुरा है, तो वे मन्दिरों के दरवाजे बन्द रखें । वे भाड़ में जायें, दलितों को मन्दिरों में जाने की कोई जरूरत नहीं है । हिन्दू इस बात पर भी विचार करें कि क्या मन्दिर प्रवेश हिन्दू समाज में दलितों के सामाजिक स्तर को ऊँचा उठाने का अन्तिम उद्देश्य है? या उनके उत्थान की दिशा में यह पहला क़दम है?यदि यह पहला क़दम है तो अन्तिमलक्ष्य क्या है?यदि मन्दिर प्रवेश अन्तिम लक्ष्य है, तो दलित वर्गों के लोग उसका समर्थन कभी नहीं करेंगे । दलितों का अन्तिम लक्ष्य है सत्ता में भागीदारी ।”१ (कंवल भारती-डॉ.अम्बेडकर एक पुनर्मूल्यांकन, बोधिसत्व प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-८०-८१)

इन सभी पहलुओं को ध्यान से देखें तो यह समझ में आता है कि डॉ.अम्बेडकर ने दलितों के अन्दर वो चेतना जगायी जो उनके पहले किसी ने भी उनमें नहीं जगायी थी । उनके अधिकारों के प्रति चेतना । डॉ.अम्बेडकर ने दलितों को वो अधिकार वापस दिलाया जो इस संसार में मनुष्य होने के नाते उनके पास होने चाहिए थे । अगर डॉ.अम्बेडकर ने दलितों को हिन्दू मन्दिर में प्रवेश कराने का आन्दोलन किया तो यह उनका अधिकार था । इसके अतिरिक्त महाड़ में तालाब का पानी पीने का आंदोलन भी एक प्रमुख घटना थी । हम यह जानते हैं कि हिन्दू धर्म में अनेक कर्मकाण्ड, अंधविश्वास तथा खामियाँ हैं । यह मनुष्य को आपस में लड़ना और बैर सिखाता है । चातुर्वर्ण हिन्दू धर्म का वह विभाजन था जो गैर-बराबरी को दर्शाता है । इसके विपरीत दलित वैचारिकी मनुष्य में बंधुता का भाव-बोध जगाता है ।

दलित आन्दोलन हिन्दू धर्म के ब्राह्म्णवादी संस्कारों के विरूद्ध दलितों को उनका अधिकार वापस दिलाने तथा उनमें चेतना जगाने के लिए डॉ.अम्बेडकर ने प्रारम्भ किया था । दलित सैद्धान्तिकी भगवान की सत्ता तथा भाग्यवाद को नहीं मानती । डॉ.अम्बेडकर का अन्दोलन ईश्वरवाद और कर्मकाण्ड पर आधारित नहीं था ।

आज अगर दलित हिन्दू धर्म को अपना रहें हैं और हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां अपने घरों में रखकर पूजा कर रहें हैं तथा अपने घरों में हिन्दू देवी-देवताओं के मन्दिर बनवा रहें हैं तो यह उनकी अज्ञानता है न कि डॉ.अम्बेडकर द्वारा दलितों को उनका मनुष्य के रूप में दिलाया गया अधिकार । अम्बेडकर ने यह साफ-साफ कहा था कि हिन्दू धर्म में अनेक ऐसी चीजें हैं जो मनुष्य में गैर-बराबरी तो सीखाता ही है तथा मनुष्य मानने से भी इन्कार करता है । यह धर्म हमें गुलाम बनाता है । डॉ.अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के संबंध में अपने विचार दिए थे कि “हिन्दुओं की गिनती उन अविश्वासी लोगों में से की जा सकती है जिनकी करनी और कथनी में विरोधाभास है । उन लोगों पर विश्वास मत कीजिए जो एक ओर घोषणा करते हैं कि ईश्वर सभी में है तथा दूसरी ओर आदमियों के साथ पशुओं से भी बदतर व्यवहार करते हैं । ऐसे लोग दंभी हैं । ऐसे लोगों से संबंध मत रखिए जो चीटियों को तो चीनी दें किन्तु आदमियों को सार्वजनिक कुंओं से पीने का पानी न लेने देकर मारें ।” वह अछूतों से अपने भाषण में कहते हैं –“आप लोग जानते हैं कि हिन्दू और हिन्दू धर्म के संबंधों ने आप लोगों पर किस प्रकार बुरा प्रभाव छोड़ा है?कोई आपकी इज़्जत नहीं करता । आपका कोई सामाजिक स्तर नहीं, प्रतिष्ठा नहीं, यहाँ तक कि मनुष्यता भी नहीं । यदि आप लोग चाहते हैं कि यह प्रतिष्ठा रहित स्थिति बदले, यानि आप लोग छुआछूत के कलंक व मनुष्यों के निचले स्तर से मुक्ति चाहते हैं, और चाहते हैं कि इस बहुमूल्य जीवन का उपयोग हो तो इसके सिवाय कोई अन्य पर्याय नहीं है कि आप लोग हिन्दू धर्म व समाज की गुलामी से जिसके साथ सदियों से चिपके हैं, संबंध तोड़ दें ।”

डॉ.अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म ग्रहण करने के लिए कहा था । उनका मानना था कि बौद्ध धर्म अत्यन्त ही व्यवहारिक धर्म है, जो मनुष्य के चरमोत्कर्ष का साधन है । यह धर्म मानव मात्र की समानता का पक्षपाती है । इसके द्वार सभी के लिए खुले हैं । इसका मत बहुजन हिताय बहुजन सुखाय से जुड़ा है । डॉ.अम्बेडकर ने धर्मान्तरण को आवश्यक माना था । उनके अनुसार धर्मान्तरण कोई खेल नहीं । न तो यह मौज का या मनोरंजन का विषय ही है । यह तो संपूर्ण दलित समाज के ज़िन्दगी और मौत का प्रश्न है । व्यक्ति के विकास के लिए समाज की आवश्यकता है, तब भी समाज की धारणा धर्म का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता । व्यक्ति का विकास ही धर्म का वास्तविक उद्देश्य है, ऐसा मैं समझता हूँ । जिस धर्म में व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है, वह धर्म मुझे स्वीकार नहीं है । हिन्दू धर्म व्यक्ति के महत्व को स्वीकार नहीं करता इसलिए वह मुझे स्वीकार नहीं है ।”

डॉ.अम्बेडकर का धर्मान्तरण आध्यात्मिक कारणों से था । हिन्दू धर्म की अनेक खामियों और जटिलताओं को देखते हुए उन्होंने कहा था कि यह धर्म मेरे विवेक को मान्य नहीं है। यह मेरे आत्मसम्मान को स्वीकार नहीं है । उन्होंने दलितों को अपने भाषण में यह साफ-साफ कहा कि यदि आप ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो आपको सहयोग व भाईचारे की गारंटी दे, तो अपना धर्म बदलिए । डॉ.अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन के लिए किसी पर जोर-जबरदस्ती नहीं की थी। उन्होंने धर्मान्तरण के समय लोगों से कहा था कि- “आप लोग भावनाओं से प्रभावित होकर मेरा साथ न दें क्योंकि मैं ऐसा कह रहा हूँ । आप लोगों के विचारों को यदि यह बात पटती है तो ही आप लोग ऐसा करने की स्वीकृति दें ।”२ (धर्मान्तरण क्यों?-डॉ.अम्बेडकर, गौतम बुक सेन्टर पृष्ठ संख्या-३५) इन सभी बातों को ध्यान में रखकर देखें तो कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि डॉ.अम्बेडकर ने दलितों को हिन्दू धर्म ग्रहण करने के लिए बाध्य किया हो या फिर बौद्ध धर्म ग्रहण करने के लिए ।

डॉ.अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को एक सद् धर्म माना था जो समतापूर्ण जीवन जीने की भावना लोगों में सीखाता है । अगर आपको लगता है कि हिन्दू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म में भी खामी है तो आप उसे मत अपनाइए । दलितों द्वारा हिन्दू धर्म को अपनाने या फिरहिन्दू मन्दिरों में जाने तथा देवी-देवताओं की पूजा करने के लिए डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar को जिम्मेदार ठहराना कहाँ का इंसाफ़ है?

हमारे देश और समाज की विडम्बना यह है कि अगर हमारे अधिकारों या हमारे हित के लिए यदि कोई आवाज़ उठाता है तो हमारे देश में उसकी क्या गति होती है यह डॉ.अम्बेडकर जी के साथ हो रहे अन्याय को देख सकते हैं । उनके सिद्धान्तों को मानना तो दूर लोग उनको ही कोस रहें हैं दोषी मान रहें हैं । जिन चीजों के विरोध के लिए अम्बेडकरवादी आन्दोलन चला था उन्हीं चीजों को पुनः स्थापित किया जा रहा है । यहाँ तक कि आज डॉ.अम्बेडकर Dr. Ambedkar पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं । डॉ.अम्बेडकर ने अगर दलितों को उनका अधिकार वापस दिलाया, उनमें चेतना जगायी ताकि वो भी एक सम्मान की और इज़्ज़त की ज़िन्दगी जी सके एक मनुष्य होने के नाते, तो इसमें वो कहाँ गलत थे? ये उनके साथ नाइंसाफी होगी अगर हम उनको हर चीज़ के लिए जिम्मेदार ठहराते रहेंगे ।

सूरजपाल जी का डॉ.अम्बेडकर के ऊपर इस तरह का इल्ज़ाम लगाना धर्मवीर जी के आजीवक परम्परा का समर्थन करना है । वह दलितों को इस परम्परा से जोड़कर देखते हैं । इस प्रकार, यह पता चलता है कि वह धर्मवीर Dr. Dharmveer के द्वारा चलाए जा रहे आजीवक परम्परा Aajivak Parampara के अभियान का समर्थन कर रहे हैं । इसको इस तरह से देखा जाय कि राजनीति में कैसे एक पक्ष दूसरे पक्ष की खामियां निकालकर अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करता है । उसी तरह सूरजपाल जी Surajpal भी अम्बेडकर जी में खामियां ढूंढ कर धर्मवीर जी Dr. Dharmvir की आजीवक परम्परा को स्थापित करके स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे हुए हैं ।

Jansatta 5 feb 2012

14th Feb 1933

Kanwal Bharti, Dr. Ambedkar ek Punarmulyankan, Bodhisatva prakashan

Dr. Ambedkar, Dharmantaran Kyon, Gautam Book Centre

विचार बनाम तर्क

प्रियंका सोनकर

एम.फिल.(शोधार्थी)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली




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