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दलित साहित्य 2011

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अम्बेडकरवाद को दलित विमर्श का वैचारिक आधार बताते हुए उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि अम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकार करना कोई भूल नहीं थी, बल्कि दलितों को सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिये सुविचारित ढंग से उठाया गया एक राजनैतिक कदम था। उनका मानना है कि दलित लेखकों के बीच जाति के सवाल पर दो धड़े हैं, एक वे ‘जो जातिवाद का विघटन चाहते हैं, दूसरे वे जो जातिवाद का प्रतिष्ठापन चाहते हैं।’ इस पुस्तक में उन्होंने साम्प्रदायिकता और भूमंडलीकरण जैसे सवालों पर भी ध्यान दिया है, लेकिन ‘साहित्य एक लोकतांत्रिक क्षेत्र है’ जैसी अतिव्याप्ति दोष से ग्रस्त उनकी मान्यताओं से सहमत हो पाना मुश्किल है।दलित प्रश्न के लिहाज से वर्ष 2010 का बौद्धिक परिदृश्य उत्तेजना भरा रहा था। डा. धर्मवीर की वृहदाकार और आक्रामक आलोचना पुस्तक प्रेमचंद की नीली आंखे, डा. तेजसिंह की अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा , डा. श्यौराज सिंह बेचैन का कहानी संग्रह भरोसे की बहन , मोहनदास नैमिशराय का उपन्यास जख्म हमारे और डाॅ. तुलसीराम की बहुप्रशंसित आत्मकथा मुर्दहिया का प्रकाशन वर्ष 2010 में हुआ। उत्तेजक परिदृश्य और बड़े लेखकों की इस सक्रियता की तुलना में पत्र-पत्रिकाओं में चले छिटपुट विवादों को छोड़कर वर्ष 2011 का बौद्धिक परिदृश्य अपेक्षाकृत शांत रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस वर्ष दलित प्रश्न से संबंधित पुस्तकें कम मात्रा में प्रकाशित हुई हैं या कि उनका महत्व कम रहा है। इसका अर्थ मात्र इतना है कि इस वर्ष अपेक्षाकृत बाद वाली पीढ़ी की भागीदारी अधिक रही है।
लंबे समय के बाद कैलाश चंद चैहान लेखन के क्षेत्र में पुनः सक्रिय हुए हैं। आरोही प्रकाशन दिल्ली से उनका एक पठनीय उपन्यास सुबह के लिए इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। वाल्मीकि समाज पर केन्द्रित इस उपन्यास में गांव भी है और शहर भी। कैलाश जी ने पैनी नजर से परिवेश की भिन्नता के अनुरूप उत्पीड़न के बदलते हुए रूपों को पकड़ने का प्रयास किया है। इसके चलते लेखक छोटे और सामान्य जीवन प्रसंगों में निहित दमन को भी पहचान पाने में सफल रहा है। विषय वस्तु की नवीनता के साथ-साथ उपन्यास उत्पीड़न के विविध रूपों की शिनाख्त के लिहाज से भी उल्लेखनीय है। सीवर की सफाई करने वाले मजदूरों की मौत के प्रसंग के साथ पितृसत्तात्मक दमन के ऐसे रूपों की अभिव्यक्ति भी उपन्यास में हुई है, जो नजर तो नहीं आते पर बहुत गहरा घाव छोड़ जाते हैं। उपन्यास की भाषा सहजता के साथ-साथ मार्मिकता और गहराई को सफलता से व्यक्त करने के कारण ध्यान खींचती है।
रत्नकुमार सांभरिया का कहानी संग्रह दलित समाज की कहानियां इस वर्ष अनामिका पब्लिशर्स, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में उनका आलोचक-कथाकार दोनों रूप देखने को मिलता है। यानि जहां एक ओर इसमें आखेट, चपड़ासन , बिपर सूदर एक कीने और खेत जैसी कहानियां शामिल हैं, तो वहीं ‘मेरी बात’ शीर्षक भूमिका में उन्होंने दलित कहानी की सैद्धांतिकी निर्मित करने का प्रयास किया है। दलित साहित्य के बारे में उनके विचारों में इधर कुछ परिवर्तन हुआ है, इसका पता भूमिका से लगता है। अपनी सैद्धांतिकी में उन्होंने दलित कहानियों से दलित पात्रों के उज्जवल पक्ष की प्रतिष्ठा और भाषा शैली में माधुर्य और संयम की अपेक्षा की है। भूमिका में व्यक्त विचारों का यथा संभव निर्वाह उन्होंने खुद अपनी कहानियों में करने का प्रयास किया है। दलित समाज के विभिन्न तबकों से जुड़े पात्रों की कहानियां इस संग्रह में मिलती हैं, सभी में इन पात्रों के जुझारू तेवर को चिन्हित करने का प्रयास किया गया है। भाषा और भूगोल दोनों ही स्तरों पर सांभरिया जी ने राजस्थान के परिवेश को जीवंतता प्रदान की है।
दलित कविता में लेखकों और पाठकों की रुचि बढ़ रही है, इसका प्रमाण हर वर्ष प्रकाशित होने वाले काव्य संग्रहों की मात्रा से लगाया जा सकता है। एक नई बात इस वर्ष यह हुई है कि गुजराती कवि प्रवीण गढ़वी की कविताओं का हिन्दी अनुवाद कवि की आवाज शीर्षक से आकाश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्युटर्स, गाजियाबाद से प्रकाशित हुआ है। संग्रह की ज्यादातर कविताएं गांधी और अम्बेडकर की मान्यताओं और उनके द्वारा दुनिया को बदलने के लिये किये गए प्रयासों पर केन्द्रित हैं। यह दिलचस्प है कि इस संग्रह की कविताओं में न तो उक्त इतिहास पुरुषों की तुलना का कोई प्रयास है और न ही उनके टकरावों की कोई झलक इसमें मिलती है। अम्बेडकर की व्यथा बेहद मार्मिक कविता है। संग्रह की कविताओं का अनुवाद खुद लेखक ने किया है, लेकिन अनुवाद में अपेक्षित सफलता नहीं मिली है और कई जगह भाषिक गड़बड़ियां खटकती हैं।
ईश कुमार गंगानिया का कविता संग्रह एक वक्त की रोटी समकालीन प्रकाशन नई दिल्ली, दलित लेखकों के विस्तृत होते सरोकारों की सूचना देता है। लघुशंका केन्द्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने साम्प्रदायिक ताकतों पर प्रहार किया है। ईश कुमार गंगानियां मूलतः विमर्शकार हैं और उनका यह रूप प्रायः उनके कवि रूप पर हावी हो जाता है। जो कविताओं में आजीवक शब्द पर उनके द्वारा अतिरिक्त जोर दिये जाने में भी देखा जा सकता है। कफन शीर्षक कविता में उन्होंने डाॅ. धर्मवीर की पद्धति का अनुसरण करते हुए यह कहने का प्रयास किया है कि चंूकि बुधिया का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था तो घीसू और माधव उसके लिये कफन कैसे खरीद सकते थे।
मुसाफिर बैठा का पहला काव्य संग्रह बीमार मानस का गेह जागृति साहित्य प्रकाशन, पटना से इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। मुसाफिर सुलझी समझ के कवि हैं और व्यंग्य उनका सबसे बड़ा हथियार है, जो संग्रह की अधिकांश कविताओं में दिखाई देता है। गाली शीर्षक कविता गाली देने वाले के मनोविज्ञान और भारतीय समाज के पितृसत्तात्मक मिजाज की अंतर्दृष्टिपूर्ण पड़ताल करती है। वैचारिक आवेग कई बार उनकी कविताओं को सपाट गद्यात्मक बना देता है। चार हिस्सों में विभाजित इस संग्रह की सबसे मूल्यवान कविताएं मन के भींगल कोर शीर्षक अंतिम खंड में है, जिसमें कवि ने बड़े आत्मीय ढंग और संवेदनात्मक भाषा में मां, पिता, बेटी तथा अन्य अपने परिवार जनों और परिवेश को याद किया है। व्यंग्य और आक्रोश से दूर मार्मिकता में पगी हुई ऐसी कविताएं दलित साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ हैं।
नीलकमल गोरखपुर से प्रकाशित हम उन्हें अच्छे नहीं लगते सुरेश चंद का पहला कविता संग्रह जरूर है, लेकिन इसमें संग्रहित कविताएं उनके एक मंजे हुए कवि होने का साक्ष्य हैं। संग्रह की कविताओं में पर्याप्त वैविध्य है। अगर यहां क्रांति है, तो काली घटा के गीत भी हैं; सूअर चराती ‘काली कलूटी लड़की’ की मासूमियत से कवि की संवेदना जुड़ी है, तो राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य तक की चिंता भी उसे सताती है। सुरेश चंद के इस संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें उत्पीड़न के विविध रूपों (जाति-वर्ग-जेंडर इत्यादि) से एक साथ संघर्ष करने पर बल दिया गया है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सपाट नारेबाजी का सरल रास्ता छोड़कर कवि ने सघन संवेदना का धरातल ही अपनी सर्जना के लिये चुना है। अमूर्त वैचारिक वक्तव्य की बजाय लेखक ने जीवन प्रसंगों के चित्रों के माध्यम से अपनी बात कहने की कोशिश की है। इस संग्रह को इस वर्ष की एक उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए।
हरपाल सिंह ‘अरुष’ की आलोचना पुस्तक दलित साहित्य के आधार तत्व भारतीय पुस्तक परिषद, नई दिल्ली, दलित आलोचना के मुख्य मुद्दों का पुनर्मूल्यांकन है। हरपाल सिंह इस बात पर जोर देते हंै कि हिन्दी की पारंपरिक आलोचना पद्धति दलित साहित्य का मूल्यांकन करने में असमर्थ है, क्योंकि उसके प्रतिमान ‘वर्णवादी’ हैं। इसके विकल्प के तौर पर वे रेड इंडियन और नीग्रो साहित्य के प्रतिमानों को ग्रहण करने का प्रस्ताव रखते हैं। भारतीय अस्मिता में पिछड़ों और दलितों का स्थान, दलित अस्मिता का आशय, परंपरा और दलित चेतना का संबंध जैसे सवाल इस पुस्तक के केन्द्र में हैं। ‘बहुलतावाद’ लेखक का मुख्य तर्क है। मौलिकता के बावजूद इस पुस्तक में वैचारिक गहराई का अभाव है। भाषा को कई जगह लेखक ने बेवजह दुरूह बनाया है। आरंभिक अध्यायों की भाषा ‘सरकारी हिन्दी’ की तरह यांत्रिक और कृत्रिम लगती है।
दलित मुद्दों पर लेखन करने वालों में उमाशंकर चैधरी कुछ समय से चर्चा में रहे हैं। इस वर्ष उनकी दो पुस्तकें दलित विमर्श: कुछ मुद्दे-कुछ सवाल और विमर्श में कबीर आधार प्रकाशन, पंचकूला से प्रकाशित हुई हैं। ‘दलित विमर्श: कुछ मुद्दे-कुछ सवाल’ में उन्होंने विवादास्पद और गंभीर सवालों से मुठभेड़ की है।
विमर्श में कबीर विभिन्न आलोचकों द्वारा किये गए कबीर संबंधी मूल्यांकन की आलोचना है। उमाशंकर चैधरी ने अपने अध्ययन में यह दिखाया है कि सवर्ण आलोचकों का कबीर संबंधी मूल्यांकन उनके जातिवादी संस्कारों से प्रभावित रहा है। इस प्रसंग में उन्होंने डाॅ. धर्मवीर के आलोचनात्मक अवदान के महत्व को रेखांकित किया है, लेकिन उतने ही पुरजोर ढंग से वे डाॅ. धर्मवीर द्वारा कबीर को दलित धर्म का संस्थापक सिद्ध करने के प्रयासों का विरोध भी करते हैं। यह पुस्तक संयमित भाषा में शोधपरक गंभीर आलोचना का अच्छा उदाहरण है।
रजनी तिलक और रजनी अनुरागी के संपादकत्व में समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन नाम से एक पुस्तक श्रृंखला स्वराज पुस्तक दिल्ली से प्रकाशित हो रही है। अभी इस श्रृंखला का पहला ही खंड आया है, लेकिन उससे इस श्रृंखला के सरोकारों का पता चलता है। दलित और स्त्री जैसे केन्द्रीय विमर्शों की मौजूदगी के समानान्तर यह दलित महिला आन्दोलन जैसीे एक तीसरी धारा के विकसित होने का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। जाति और जेंडर के सवालों को जोड़कर देखना इस तीसरी धारा की उल्लेखनीय उपलब्धि है। इस पुस्तक में विभिन्न भारतीय भाषाओं की दलित महिला लेखिकाओं की रचनाएं शामिल हैं। यह किसी एक विधा तक सीमित संकलन नहीं है, बल्कि इसमें कविता, कहानी, आत्मवृत्तांत, मीडिया मीमांसा से लेकर दलित महिला राजनीति तक को इसमें जगह मिली है। एक तरह से इसे भारतीय दलित महिला लेखन की वैविध्यपूर्ण दुनिया का एक प्रातिनिधिक संकलन कहा जा सकता है।
शिंकजे का दर्द के रूप में इस वर्ष के खाते में भी एक महत्वपूर्ण आत्मकथा दर्ज हुई है। वाणी, नई दिल्ली से प्रकाशित सुशीला टाकभौरे की यह आत्मकथा दलित स्त्री के दोहरे संघर्ष को व्यापक फलक पर रेखांकित करती है। यह आत्मकथा बताती है कि उत्पीड़न के मामले में दलित पितृसत्ता किसी मामले में द्विज पितृसत्ता से कमतर नहीं है। सुशीला जी ने पति द्वारा की गई ज्यादतियों, जब तब अपमान करने और पैसे-पैसे के लिये मुहताज कर देने जैसी क्रूरताओं की दहला देने वाली हकीकत सामने रखी है। पितृसत्तात्मक-जातिगत और आर्थिक उत्पीड़न का संश्लिष्ट चित्र खींचती यह आत्मकथा लेखिका की जीजिविषा और संघर्ष का संवेदनात्मक साक्ष्य है। स्थानीयता की रंगत लिये सादगी भरी भाषा में सुशीला जी ने अपने जीवन के उतार-चढ़ावों की कथा को बड़ी संजीदगी के साथ प्रस्तुत किया है। इसमें लेखिका ने आत्मविश्लेषण भी किया है, जिसे मैनेजर पांडेय ने आत्मकथा की उपलब्धि के रूप में देखा है।
एच.एल.दुसाध और उनके साथियों ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी दलितों से जुड़े सामयिक प्रश्नों पर कई पुस्तिकाएं प्रकाशित की हैं। सरकार की आलोचना करने पर कुछ बुद्धिजीवियों की नौकरी से बरखास्तगी को बिहार सरकार द्वारा मीडिया पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिशों के रूप में देखते हुए दिलीप मंडल ने ‘बहुजन ब्रेन बैंक पर हमला’ दुसाध प्रकाशन लखनऊ, पुस्तिका संपादित की है। 15 लेखों में विभिन्न लेखकों ने इन घटनाओं के सामाजिक-राजनैतिक निहितार्थों की पड़ताल की है। इस वर्ष अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन देश भर में बहस का मुद्दा बना रहा। एच.एल.दुसाध और दिलीप मंडल समेत 9 संपादकों की टीम ने जनलोकपाल का लक्ष्य शीर्षक पुस्तिका में अन्ना आन्दोलन को मिले व्यापक जनसमर्थन को जाति के कोण से देखने-समझने का प्रयास किया है। इसी क्रम में उन्होंने ‘जनलोकपाल: समीक्षा एवं सुझाव’ शीर्षक एक और पुस्तिका का प्रकाशन भी किया है। भ्रष्टाचार को सवर्णों की समस्या बताने तथा ‘डाइवर्सिटी’ को भ्रष्टाचार, मुसलमानों की बदहाली, लैंगिक गैरबराबरी और नक्सलवाद तक को मिटाने का एकमात्र उपाय सिद्ध करने के इन प्रयासों में निहित अतिरंजना बहुत साफ दिखाई देती है, लेकिन साथ ही इन पुस्तिकाओं में दलित हितों के लिहाज से बहुत सी विचारणीय उपयोगी बातें भी कही गई हैं। प्रवेश कुमार की दलित अस्मिता की राजनीति, एम.के. मिश्रा एवं कमल दाधीच की गांधी और दलित, नेमिचंद बोयटा की इतिहास के पन्नों में मेहतर वाल्मीकि और चांडाल तथा हनुमंतराव पाटिल एवं दशरथ तुकाराम की दलित साहित्य और वैश्विकता इत्यादि पुस्तकें भी वर्ष 2011 में ही प्रकाशित हुई हैं, किन्तु अनुपलब्धता के कारण उनका विवेचन यहां नहीं किया जा सका है।
बड़े नामों की किंचित गैरमौजूदगी के बावजूद वर्ष 2011 की पुस्तकों ने गुणवत्ता में विकास के क्रम को जारी रखा है। यह एक उपलब्धि है कि ऐसे दलित लेखकों की एक अगली कतार निर्मित होती दिख रही है, जिन्हंे अपनी गुरुतर जिम्मेदारी का बखूबी अहसास है। जीवन से जुड़े गंभीर प्रश्नों पर वैचारिक स्पष्टता के साथ ही अन्य उत्पीड़ित समूहों के प्रति संवेदनशीलता को इन लेखकों की विशेषता के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। यह एक आशाप्रद संकेत Dharmavir ki vrrihadakara aura akramaka alochana pustaka prem chand ki nili ankhe, DA.c. Tej singh ki ambedkarvadi sahitya ki avadharana , DA.c. Shyauraj singh bechain ka kahani sangrah bharose ki bahan mohandas naimisharay ka upanyas jakhm hamare aura DA.c. Tulasiram ki bahuprashamsita atmkatha murdahiya ka prakashana varsha 2010 mem hua| uttejaka paridrrishya aura baड़e lekhakom ki isa sakriyata ki tulana mem patra-patrikaom mem chale chitaputa vivadom ko choड़kara varsha 2011 ka bauddhika paridrrishya apekshakrrita shamta raha hai| isaka artha yaha nahim hai ki isa varsha dalita prashna se sambamdhita pustakem kama matra mem prakashita hui haim ya ki unaka mahatva kama raha hai| isaka artha matra itana hai ki isa varsha apekshakrrita bada vali piढ़i ki bhagidari adhika rahi hai|
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Rajni tilak Rajani tilak aura rajani anuragi ke sampadakatva mem samkaleen bhartiya dalit mahila lekhan nama se eka pustaka shrrrimkhala svaraja pustaka dilli se prakashita ho rahi hai| abhi isa shrrrimkhala ka pahala hi khamda aya hai, lekina usase isa shrrrimkhala ke sarokarom ka pata chalata hai| dalita aura stri jaise kendriya vimarshom ki maujudagi ke samanantara yaha dalita mahila Andolana jaisie eka tisari dhara ke vikasita hone ka sakshya prastuta karati haim| jati aura jemdara ke savalom ko joड़kara dekhana isa tisari dhara ki ullekhaniya upalabdhi hai| isa pustaka mem vibhinna bharatiya bhashaom ki dalit mahila lekhika ki rachanaem shamila haim| yaha kisi eka vidha taka simita samkalana nahim hai, balki isamem kavita, kahani, atmavrrittamta, midiya mimamsa se lekara dalita mahila rajaniti taka ko isamem jagaha mili hai| eka taraha se ise bharatiya dalita mahila lekhana ki vaividhyapurna duniya ka eka pratinidhika samkalana kaha ja sakata hai|
Shikanze ka dard Shikanje ka dard ke rupa mem isa varsha ke khate mem bhi eka mahatvapurna atmakatha darja hui hai| vani, nai dilli se prakashita sushila takbhaure ki yaha atmakatha dalita stri ke dohare samgharsha ko vyapaka phalaka para rekhamkita karati hai| yaha atmakatha batati hai ki utpiड़na ke mamale mem dalita pitrrisatta kisi mamale mem dvija pitrrisatta se kamatara nahim hai| sushila ji ne pati dvara ki gai jyadatiyom, jaba taba apamana karane aura paise-paise ke liye muhataja kara dene jaisi krurataom ki dahala dene vali hakikata samane rakhi hai| pitrrisattatmaka-jatigata aura Arthika utpiड़na ka samshlishta chitra khimchati yaha atmakatha lekhika ki jijivisha aura samgharsha ka samvedanatmaka sakshya hai| sthaniyata ki ramgata liye sadagi bhari bhasha mem sushila ji ne apane jivana ke utara-chaढ़avom ki katha ko baड़i samjidagi ke satha prastuta kiya hai| isamem lekhika ne atmavishleshana bhi kiya hai, jise mainejara pamdeya ne atmakatha ki upalabdhi ke rupa mem dekha hai|
Echa.ela.dusadha aura unake sathiyom ne hara varsha ki taraha isa varsha bhi dalitom se juड़e samayika prashnom para kai pustikaem prakashita ki haim| sarakara ki alochana karane para kucha buddhijiviyom ki naukari se barakhastagi ko bihara sarakara dvara midiya para niyamtrana sthapita karane ki koshishom ke rupa mem dekhate hue dilipa mamdala ne ‘bahujana brena baimka para hamala’ dusadha prakashana lakhanau, pustika sampadita ki hai| 15 lekhom mem vibhinna lekhakom ne ina ghatanaom ke samajika-rajanaitika nihitarthom ki paड़tala ki hai| isa varsha anna hajare ka bhrashtachara virodhi Andolana desha bhara mem bahasa ka mudda bana raha| echa.ela.dusadha aura dilipa mamdala sameta 9 sampadakom ki tima ne janalokapala ka lakshya shirshaka pustika mem anna Andolana ko mile vyapaka janasamarthana ko jati ke kona se dekhane-samajhane ka prayasa kiya hai| isi krama mem unhomne janlokapala: samiksha evam sujhav’ shirshaka eka aura pustika ka prakashana bhi kiya hai| bhrashtachara ko savarnom ki samasya batane tatha ‘daivarsiti’ ko bhrashtachara, musalaman ki badahali, laimgika gair barabari aura naksalavada taka ko mitane ka ekamatra upaya siddha karane ke ina prayasom mem nihita atiramjana bahuta sapha dikhai deti hai, lekina satha hi ina pustikaom mem dalita hitom ke lihaja se bahuta si vicharaniya upayogi batem bhi kahi gai haim| pravesha kumara ki dalita asmita ki rajaniti, ema.ke. Mishra evam kamal dadhich ki gandhi aura dalit, nemichanda boyata ki itihas ke panno mein mehtar valmiki aura chandal tatha hanumamtarava patila evam dashrath tukaram ki dalit sahitya aura vaishvikata ityadi pustakem bhi varsha 2011 mem hi prakashita hui haim, kintu anupalabdhata ke karana unaka vivechana yaham nahim kiya ja saka hai|
Baड़e namom ki kimchita gairamaujudagi ke bavajuda varsha 2011 ki pustakom ne gunavatta mem vikasa ke krama ko jari rakha hai| yaha eka upalabdhi hai ki aise dalita lekhakom ki eka agali katara nirmita hoti dikha rahi hai, jinhame apani gurutara jimmedari ka bakhubi ahasasa hai| jivana se juड़e gambhira prashnom para vaicharika spashtata ke satha hi anya utpiड़ita samuhom ke prati samvedanashilata ko ina lekhakom ki visheshata ke rupa mem chinhita kiya ja sakata hai| yaha eka ashaprada samketa
है। दलित साहित्य 2011: व्यापक होते सरोकार
निरंजन कुमार सामरिया




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