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मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन का एक पहलू – मुक्तिबोध

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मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि कबीर और निर्गुण पन्थ के अन्य कवि तथा दक्षिण के कुछ महाराष्ट्रीय सन्त तुलसीदास जी की अपेक्षा अधिक आधुनिक क्यों लगते हैं? क्या कारण है कि हिन्दी-क्षेत्र में जो सबसे अधिक धार्मिक रूप से कट्टर वर्ग है, उनमें भी तुलसीदासजी इतने लोकप्रिय हैं कि उनकी भावनाओं और वैचारिक अस्त्रों द्वारा, वह वर्ग आज भी आधुनिक दृष्टि और भावनाओं से संघर्ष करता रहता है? समाज के पारिवारिक क्षेत्र में इस कट्टरपन को अब नये पंख भी फूटने लगे हैं। खैर, लेकिन यह इतिहास दूसरा है। मूल प्रश्न जो मैंने उठाया है उसका कुछ-न-कुछ मूल उत्तर तो है ही।
Mere man me bar-bar yaha prashna uthata hai ki kabir aur nirgun panth ke anya kavi tatha dakshin ke kucha maharashtriya sant tulasidas ji ki apeksha adhik adhunika kyo lagate hain? Kya karana hai ki hindi-kshetra mem jo sabase adhika dharmika rupa se kattara varga hai, unamem bhi tulasidasa ji itane lokapriya haim ki unaki bhavanaom aura vaicharika astrom dvara, vaha varga aja bhi adhunik drishti aura bhavanaom se samgharsha karata rahata hai? Samaj ke parivarika kshetra mem isa kattarapana ko aba naye pamkha bhi phutane lage haim| khaira, lekina yaha itihasa dusara hai| mula prashna jo maimne uthaya hai usaka kucha-na-kucha mula uttara to hai hi|

मैं यह समझता हूं कि किसी भी साहित्य का ठीक-ठीक विश्लेषण तब तक नहीं हो सकता जब तक हम उस युग की मूल गतिमान सामाजिक शक्तियों से बनने वाले सांस्कृतिक इतिहास को ठीक-ठीक न जान लें। कबीर हमें आपेक्षिक रूप से आधुनिक क्यों लगते हैं, इस मूल प्रश्न का मूल उत्तर भी उसी सांस्कृतिक इतिहास में कहीं छिपा हुआ है। जहां तक महाराष्ट्र की सन्त-परम्परा का प्रश्न है, यह निर्विवाद है कि मराठी सन्त-कवि, प्रमुखत:, दो वर्गों से आये हैं, एक ब्राह्मण और दूसरे ब्राह्मणेतर। इन दो प्रकार के सन्त-कवियों के मानव-धर्म में बहुत कुछ समानता होते हुए भी, दृष्टि और रुझान का भेद भी था। ब्राह्मणेतर सन्त-कवि की काव्य-भावना अधिक जनतन्त्रात्मक, सर्वांगीण आर मानवीय थी। निचली जातियों की आत्म-प्रस्थापना के उस युग में, कट्टर पुराणपन्थियों ने जो-जो तकलीफें़ इन सन्तों को दी हैं उनसे ज्ञानेश्वर-जैसे प्रचण्ड प्रतिभावन सन्त का जीवन अत्यन्त करुण कष्टमय और भयंकर दृढ़ हो गया। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ ज्ञानेवश्वरी तीन सौ वर्षों तक छिपा रहा। उक्त ग्रन्थ की कीर्ति का इतिहास तो तब से शुरू होता है जब वह पुन: प्राप्त हुआ। यह स्पष्ट ही है कि समाज के कट्टरपन्थियों ने इन सन्तों को अत्यन्त कष्ट दिया। इन कष्टों का क्या कारण था? और ऐसी क्या बात हुई कि जिस कारण निम्न जातियां अपने सन्तों को लेकर राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में कूद पड़ीं?
Maim yaha samajhat hum ki kisi bhi sahitya ka thik-thik vishleshan taba taka nahim ho sakata jaba taka hama usa yuga ki mula gatimana samajika shaktiyom se banane vale samskrritika itihasa ko thika-thika na jana lem| kabira hamem apekshika rupa se adhunika kyom lagate haim, isa mula prashna ka mula uttara bhi usi samskrritika itihasa mem kahim chipa hua hai| jaham taka maharashtra ki santa-parampara ka prashna hai, yaha nirvivada hai ki marathi santa-kavi, pramukhata:, do vargom se aye haim, eka brahmana aura dusare brahmanetara| ina do prakara ke santa-kaviyom ke manava-dharma mem bahuta kucha samanata hote hue bhi, drrishti aura rujhana ka bheda bhi tha| brahmanetara santa-kavi ki kavya-bhavana adhika janatantratmaka, sarvamgina ara manaviya thi| nichali jatiyom ki atma-prasthapana ke usa yuga mem, kattara puranapanthiyom ne jo-jo takaliphem़ ina santom ko di haim unase j~naneshvara-jaise prachanda pratibhavana santa ka jivana atyanta karuna kashtamaya aura bhayamkara drridha़ ho gaya| unaka prasiddha grantha j~nanevashvari tina sau varshom taka chipa raha| ukta grantha ki kirti ka itihasa to taba se shuru hota hai jaba vaha puna: prapta hua| yaha spashta hi hai ki samaja ke kattarapanthiyom ne ina santom ko atyanta kashta diya| ina kashtom ka kya karana tha? Aura aisi kya bata hui ki jisa karana nimna jatiyam apane santom ko lekara rajanaitika, samajika, samskrritika kshetra mem kuda pada़im?

Mushkila yaha hai ki bharata ke samajika-arthika vikasa ke susambaddha itihasa ke lie avashyaka samagri ka bada़a abhava hai| hindu itihasa likhate nahim the, muslima lekhaka ghatanaom ka hi varnana karate the| itihasa-lekhana paryapta adhunika hai| shantiniketana ke tatha anya panditom ne bharata ke samskrritika itihasa ke kshetra mem bahuta anveshana kiye haim| kintu samajika-arthika vikasa ke itihasa ke kshetra mem abhi taka koi mahatvapurna kama nahim hua hai|
Aisi sthiti mem hama kucha sarvasammata tathyom ko hi apake samane prastuta karemge|

मुश्किल यह है कि भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के सुसम्बद्ध इतिहास के लिए आवश्यक सामग्री का बड़ा अभाव है। हिन्दू इतिहास लिखते नहीं थे, मुस्लिम लेखक घटनाओं का ही वर्णन करते थे। इतिहास-लेखन पर्याप्त आधुनिक है। शान्तिनिकेतन के तथा अन्य पण्डितों ने भारत के सांस्कृतिक इतिहास के क्षेत्र में बहुत अन्वेषण किये हैं। किन्तु सामाजिक-आर्थिक विकास के इतिहास के क्षेत्र में अभी तक कोई महत्वपूर्ण काम नहीं हुआ है।
ऐसी स्थिति में हम कुछ सर्वसम्मत तथ्यों को ही आपके सामने प्रस्तुत करेंगे। मुक्तिबोध का लेख
Vaha samaya bhi shighra hi aya| gariba uddhata kisana tatha anya janata ko apana eka aura santa, ramadasa, mila aura eka neta prapta hua, shivaji| isa yuga mem rajanaitika rupa se maharashtra ka janma aura vikasa hua| shivaji ke samasta chapemara yuddhom ke senapati aura sainika, samaja ke shoshita tabakom se aye| age ka itihasa apako maluma hi hai-kisa prakara samantavada tuta nahim, kisanom ki pida़aem vaisi hi rahim, shivaji ke uparanta rajasatta uchcha vamshotpanna brahmanom ke hatha pahumchi, peshavaom (jinhem marathe bhi jana jata raha) ne kisa prakara ke yuddha kiye aura ve angrejon ke viruddha kyom asaphala rahe, ityadi|

(3) uchchavargiyom aura nimnavargiyom ka samgharsha bahuta purana hai| yaha samgharsha ni:sandeha dharmika, samskrritika, samajika kshetra mem anekom rupom mem prakata hua| siddhom

(१) भक्ति-आन्दोलन दक्षिण भारत से आया। समाज की धर्मशाव़ादी वेद-उपनिषद्वादी शक्तियों ने उसे प्रस्तुत नहीं किया, वरन् आलवार सन्तों ने और उनके प्रभाव में रहनेवाले जनसाधारण ने उसका प्रसार किया।

(२) ग्यारहवीं सदी से महाराष्ट्र की गरीब जनता में भक्ति आन्दोलन का प्रभाव अत्यधिक हुआ। राजनैतिक दृष्टि से, यह जनता हिन्दू-मुस्लिम दोनों प्रकार के सामन्ती उच्चवर्गीयों से पीड़ित रही। सन्तों की व्यापक मानवतावादी वाणी ने उन्हें बल दिया। कीर्तन-गायन ने उनके जीवन में रस-संचार किया। ज्ञानेश्वर, तुकाराम आदि सन्तों ने गरीब किसान और अन्य जनता का मार्ग प्रशस्त किया। इस सांस्कृतिक आत्म-प्रस्थापना के उपरान्त सिर्फ एक और कदम की आवश्यकता थी।

वह समय भी शीघ्र ही आया। गरीब उद्धत किसान तथा अन्य जनता को अपना एक और सन्त, रामदास, मिला और एक नेता प्राप्त हुआ, शिवाजी। इस युग में राजनैतिक रूप से महाराष्ट्र का जन्म और विकास हुआ। शिवाजी के समस्त छापेमार युद्धों के सेनापति और सैनिक, समाज के शोषित तबकों से आये। आगे का इतिहास आपको मालूम ही है-किस प्रकार सामन्तवाद टूटा नहीं, किसानों की पीड़ाएं वैसी ही रहीं, शिवाजी के उपरान्त राजसत्ता उच्च वंशोत्पन्न ब्राह्मणों के हाथ पहुंची, पेशवाओं (जिन्हें मराठे भी जाना जाता रहा) ने किस प्रकार के युद्ध किये और वे अंगेजों के विरूद्ध क्यों असफल रहे, इत्यादि।

(३) उच्चवर्गीयों और निम्नवर्गीयों का संघर्ष बहुत पुराना है। यह संघर्ष नि:सन्देह धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्र में अनेकों रूपों में प्रकट हुआ। सिद्धों और नाथ-सम्प्रदाय के लोगों ने जनसाधारण में अपना पर्याप्त प्रभाव रखा, किन्तु भक्ति-आन्दोलन का जनसाधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ उतना किसी अन्य आन्दोलन का नहीं। पहली बार शूद्रों ने अपने सन्त पैदा किये, अपना साहित्य और अपने गीत सृजित किए। कबीर, रैदास, नाभा सिंपी, सेना नाई, आदि-आदि महापुरुषों ने ईश्वर के नाम पर जातिवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की। समाज के न्यस्त स्वार्थवादी वर्ग के विरुद्ध नया विचारवाद अवश्यंभावी था। वह हुआ, तकलीफें हुई। लेकिन एक बात हो गयी।
शिवाजी स्वयं मराठा क्षत्रिय था, किन्तु भक्ति-आंदोलन से, जाग्रत जनता के कष्टों से, खूब परिचित था, और स्वयं एक कुशल संगठक और वीर सेनाध्यक्ष था। सन्त रामदास, जिसका उसे आशीर्वाद प्राप्त था, स्वयं सनातनी ब्राह्मणवादी था, किन्तु नवीन जाग्रत जनता की शक्ति से खूब परिचित भी था। सन्त से अधिक वह स्वयं एक सामन्ती राष्ट्रवादी नेता था। तब तक कट्टरपंथी शोषक तत्वों में यह भावना पैदा हो गयी थी कि निम्नजातीय सन्तों से भेदभाव अच्छा नहीं है। अब ब्राह्मण-शक्तियां स्वयं उन्हीं सन्तों का कीर्तन-गायन करने लगीं। किन्तु इस कीर्तन-गायन के द्वारा वे उस समाज की रचना को, जो जातिवाद पर आधारित थी, मजबूत करती जा रही थीं। एक प्रकार से उन्होंने अपनी परिस्थिति से समझौता कर लिया था। दूसरे, भक्ति आन्दोलन के प्रधान सन्देश से प्रेरणा प्राप्त करनेवाले लोग ब्राह्मणों में भी होने लगे थे। रामदास, एक प्रकार से, ब्राह्मणों में से आये हुए अन्तिम सन्त हैं, इसके पहले एकनाथ हो चुके थे। कहने का सारांश यह कि नवीन परिस्थिति में यद्यपि युद्ध-सत्ता (राजसत्ता) शोषित और गरीब तबकों से आये सेनाध्यक्षों के पास थी, किन्तु सामाजिक क्षेत्र में पुराने सामन्तवादियों और नये सामन्तवादियों में समझौता हो गया था। नये सामन्तवादी कुनवियों, धनगरों, मराठों और अन्य गरीब जातियों से आये हुए सेनाध्यक्ष थे। इस समझौते का फल यह हुआ कि पेशवा ब्राह्मण हुए, किन्तु युद्ध-सत्ता नवीन सामन्तवादियों के हाथ में रही। kashtom ke parihara ke lie ishvara ki pukara ke piche janata ki bhayanaka du:sthiti chipi hui thi| yaham yaha hamesha dhyana mem rakhana chahie ki yaha bata sadharana janata aura usamem se nikale hue santom ki hai, chahe ve brahmana varga se nikale hom ya brahmanetara varga se| satha hi, yaha bhi smarana rakhana hoga ki shrrrimgara-bhakti ka rupa usi varga mem sarvadhika prachalita hua jaham aisi shrrrimgara-bhavana ke pariposha ke lie paryapta avakasha aura samaya tha, phursata ka samaya| bhakti-andolana ka avirbhava, eka aitihasika-samajika shakti ke rupa mem, janata ke du:khom aura kashtom se hua, yaha nirvivada hai|
Kisi bhi sahitya ko hamem tina drrishtiyom se dekhana chahie| eka to yaha ki vaha kina samajika aura manovaij~nanika shaktiyom se utpanna hai, arthat vaha kina shaktiyom ke karyom ka parinama hai, kina samajika-samskrritika prakriyayom ka amga hai? Dusare yaha ki usaka anta:svarupa kya hai, kina preranaom aura bhavanaom ne usake antarika tatva rupayita kiye haim? Tisare, usake prabhava kya haim, kina samajika shaktiyom ne usaka upayoga ya durupayoga kiya hai aura kyom? Sadharana jana ke kina manasika tatvom ko usane vikasita ya nashta kiya hai?

Tulasidasaji ne sambandha mem isa prakara ke prashna atyanta avashyaka bhi haim| ramacharitamanasakara eka sachche santa the, isamem kisi ko bhi koi sandeha nahim ho sakata| ramacharitamanasa sadharana janata mem bhi utana hi priya raha jitana ki uchchavargiya logom mem| kattarapanthiyom ne apane uddeshyom ke anusara tulasidasaji ka upayoga kiya, jisa prakara aja janasamgha aura hindu mahasabha ne shivaji aura ramadasa ka upayoga kiya| sudharavadiyom ki tatha aja ki bhi eka pidha़i ko tulasidasaji ke vaicharika prabhava se samgharsha karana pada़a, yaha bhi eka bada़a satya hai|

Kintu satha hi yaha bhi dhyana rakhana hoga ki sadharana janata ne rama ko apana tranakarta bhi paya, guha aura nishada ko apani chati se laganevala bhi paya| eka taraha se janasadharana ki bhakti-bhavana ke bhitara samaye hue samana prema ka agraha bhi pura hua, kintu vaha samajika umcha-nicha ko svikara karake hi| rama ke charitra dvara aura tulasidasaji ke adeshom dvara sadachara ka rasta bhi mila| kintu vaha marga kabira ke aura anya nirgunavadiyom ke sadachara ka janavadi rasta nahim tha| sachchai aura imanadari, prema aura sahanubhuti se jyada bada़a takaja tha samajika ritiyom ka palana| (dekhie ramayana mem anusuya dvara sita ko upadesha)| una ritiyom aura adeshom ka palana karate hue, aura usaki sima mem rahakara hi, manushya ke uddhara ka rasta tha| yadyapi yaha kahana kathina hai ki kisa hada taka tulasidasaji ina adeshom ka palana karavana chahate the aura kisa hada taka nahim| yaha to spashta hi hai ki unaka sujhava kisa ora tha| tulasidasaji dvara isa varnashrama dharma ki puna:rsthapana ke anantara hindi sahitya mem phira se koi mahana bhakta-kavi nahim hua to isamem ashcharya nahim|

Ashcharya ki bata yaha hai ki ajakala pragativadi kshetrom mem tulasidasaji ke sambamdha mem jo kucha likha gaya hai, usamem jisa samajika-aitihasika prakriya ke tulasidasaji amga the, usako jana-bujhakara bhulaya gaya hai| pandita ramachandra shukla ki varnashramadharmi jativadagrasta samajikata aura sachche janavada ko eka dusare se aise mila diya gaya hai mano shuklaji (jinake prati hamare mana mem atyanta adara hai) sachchi janavadi samajikata ke pakshapati hom| tulasidasaji ko puratanavadi kaha jayega kabira ki tulana mem, jinake viruddha shuklaji ne chotem ki haim|

Dusare, jo loga shoshita nimnavargiya jatiyom ke sahityika aura samskrritika samdesha mem dilachaspi rakhate haim, aura usa sandesha ke pragatishila tatvom ke prati adara rakhate haim, ve loga to yaha jarura dekhemge ki janata ki samajika mukti ko kisa hada taka kisane sahara diya aura tulasidasaji ka usamem kitana yoga raha| chahe shri ramavilasa sharma-jaise ‘marksavadi` alochaka hamem ‘valgara marksavadi` ya burjva kahem, yaha bata nissandeha hai ki samajashai़ya drrishti se madhyayugina bharata ki samajika, samskrritika, aitihasika shaktiyom ke vishleshana ke bina, tulasidasaji ke sahitya ke anta:svarupa ka sakshatkara nahim kiya ja sakata| jaham taka ramacharitamanasa ki kavyagata saphalataom ka prashna hai, hama unake sammukha kevala isalie natamastaka nahim haim ki usamem shreshtha kala ke darshana hote haim, balki isalie ki usamem ukta manava-charitra ke, bhavya aura manohara vyaktitva-satta ke, bhi darshana hote haim|

उधर सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में निम्नवर्गीय भक्तिर्माग के जनवादी संदेश के दांत उखाड़ लिये गये। उन सन्तों को सर्ववर्गीय मान्यता प्राप्त हुई, किन्तु उनके सन्देश के मूल स्वरूप पर कुठारघात किया गया, और जातिवादी पुराणधर्म पुन: नि:शंक भाव से प्रतिष्ठित हुआ।

(४) उत्तर भारत में निर्गुणवादी भक्ति-आन्दोलन में शोषित जनता का सबसे बड़ा हाथ था। कबीर, रैदास, आदि सन्तों की बानियों का सन्देश, तत्कालीन मानों के अनुसार, बहुत अधिक क्रांन्तिकारी था। यह आकस्मिकता न थी कि चण्डीदास कह उठता है :
शुनह मानुष भाई
शबार ऊपरे मानुष शतो
ताहार उपरे नाई।
इस मनुष्य-सत्य की घोषणा के क्रांतिकारी अभिप्राय कबीर में प्रकट हुए। कुरीतियों, धार्मिक अन्धविश्वासों और जातिवाद के विरुद्ध कबीर ने आवाज उठायी। वह फैली। निम्न जातियों में आत्मविश्वास पैदा हुआ। उनमें आत्म-गौरव का भाव हुआ। समाज की शासक-सत्ता को यह कब अच्छा लगता? निर्गुण मत के विरुद्ध सगुण मत का प्रारम्भिक प्रसार और विकास उच्चवंशियों में हुआ। निर्गुण मत के विरुद्ध सगुणमत का संघर्ष निम्न वर्गों के विरुद्ध उच्चवंशी संस्कारशील अभिरूचिवालों का संघर्ष था। सगुण मत विजयी हुआ। उसका प्रारम्भिक विकास कृष्णभक्ति के रूप में हुआ। यह कृष्णभक्ति कई अर्थों में निम्नवर्गीय भक्ति-आन्दोलन से प्रभावित थी। उच्चवर्गीयों का एक भावुक तबका भक्ति-आन्दोलन से हमेशा प्रभावित होता रहा, चाहे वह दक्षिण भारत में हो या उत्तर भारत में। इस कृष्णभक्ति में जातिवाद के विरुद्ध कई बातें थीं। वह एक प्रकार से भावावेशी व्यक्तिवाद था। इसी कारण, महाराष्ट्र में, निर्गुण मत के बजाय निम्न-वर्ग में, सगुण मत ही अधिक फैला। सन्त तुकाराम का बिठोबा एक सार्वजनिक कृष्ण था। कृष्णभक्तिवाली मीरा ‘लोकलाज` छोड़ चुकी थी। सूर कृष्ण-प्रेम में विभोर थे। निम्नवर्गीयों में कृष्णभक्ति के प्रचार के लिए पर्याप्त अवकाश था, जैसा महाराष्ट्र की सन्त परम्परा का इतिहास बतलाता है। उत्तर भारत में कृष्णभक्ति-शाखा का निर्गुण मत के विरुद्ध जैसा संघर्ष हुआ वैसा महाराष्ट्र में नहीं रहा। महाराष्ट्र में कृष्ण की श्रृंगार-भक्ति नहीं थी, न भ्रमरगीतों का जोर था। कृष्ण एक तारणकर्ता देवता था, जो अपने भक्तों का उद्धार करता था, चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो। महाराष्ट्रीय सगुण कृष्णभक्ति में श्रृंगारभावना, और निर्गुण भक्ति, इन दो के बीच कोई संघर्ष नहीं था। उधर उत्तर भारत में, नन्ददास वगैरह कृष्णभक्तिवादी सन्तों की निर्गुण मत-विरोधी भावना स्पष्ट ही है। और ये सब लोग उच्चकुलोद्भव थे। यद्यपि उत्तर भारतीय कृष्णभक्ति वाले कवि उच्चवंशीय थे, और निर्गुण मत से उनका सीधा संघर्ष भी था, किन्तु हिन्दू समाज के मूलाधार यानी वर्णाश्रम-धर्म के विरोधियों ने जातिवाद-विरोधी विचारों पर सीधी चोट नहीं की थी। किन्तु उत्तर भारतीय भक्ति आन्दोलन पर उनका प्रभाव निर्णायक रहा।
Kya yaha eka mahatvapurna tathya nahim hai ki ramabhakti-shakha ke antargata, eka bhi prabhavashali aura mahatpurna kavi nimnajatiya shudra vargom se nahim aya? Kya yaha eka mahatvapurna tathya nahim hai ki krrishnabhakti-shakha ke antargata rasakhana aura rahima-jaise hrridayavana musalamana kavi barabara rahe aye, kintu ramabhakti-shakha ke antargata eka bhi musalamana aura shudra kavi prabhavashali aura mahatvapurna rupa se apani kavyatmaka pratibha vishada nahim kara saka? Jaba ki yaha eka svata: siddha bata hai ki nirguna-shakha ke antargata aise logom ko achcha sthana prapta tha|
Nishkarsha yaha ki jo bhakti-amdolana janasadharana se shuru hua aura jisamem samajika kattarapana ke viruddha janasadharana ki samskrritika asha-akamkshaem bolati thim, usaka ‘manushya-satya` bolata tha, usi bhakti-andolana ko uchchavargiyom ne age chalakara apani taraha bana liya, aura usase samajhauta karake, phira usa para apana prabhava kayama karake, aura anantara janata ke apane tatvom ko unamem se nikalakara, unhomne usa
Para apana pura prabhutva sthapita kara liya|

Aura isa prakara, uchchavamshi uchchajatiya vargom ka-samaja ke samchalaka shasaka vargom ka-dharmika-samskrritika kshetra mem purna prabhutva sthapita ho jane para, sahityika kshetra mem una vargom ke pradhana bhava-shrrrimgara-vilasa-ka prabhavashali vikasa hua, aura bhakti-kavya ki pradhanata jati rahi| kya karana hai ki tulasidasa bhakti-andolana ke pradhana (hindi kshetra mem) antima kavi the? Samskrritika-sahityika kshetra mem yaha parivartana bhakti-andealana ki shithilata ko dyotita karata hai| kintu yaha andolana isa kshetra mem shithila kyom hua?

Isai mata ka bhi yahi hala hua| isa ka mata janasadharana mem phaila to yahudi dhanika vargom ne usaka virodha kiya, romana shasakom ne usaka virodha kiya| kintu jaba vaha janata ka apana dharma banane laga, to dhanika yahudi aura romana loga bhi usako svikara karane lage| roma shasaka isai hue aura semta paॉla ne usi bhavuka premamulaka dharma ko kanuni shikamjom mem jakada़ liya, popa janata se phisa lekara papom aura aparadhom ke lie kshamapatra vitarita karane laga|

एक बार भक्ति-आन्दोलन में ब्राह्मणों का प्रभाव जम जाने पर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा में कोई देर नहीं थी। ये घोषणा तुलसीदासजी ने की थी। निर्गुण मत में निम्नजातीय धार्मिक जनवाद का पूरा जोर था, उसका क्रान्तिकारी सन्देश था। कृष्णभक्ति में वह बिल्कुल कम हो गया किन्तु फिर भी निम्नजातीय प्रभाव अभी भी पर्याप्त था। तुलसीदास ने भी निम्नजातीय भक्ति स्वीकार की, किन्तु उसको अपना सामाजिक दायरा बतला दिया। निर्गुण मतवाद के जनोन्मुख रूप और उसकी क्रान्तिकारी जातिवाद-विरोधी भूमिका के विरुद्ध तुलसीदासजी ने पुराण-मतवादी स्वरूप प्रस्तुत किया। निर्गुण-मतवादियों का ईश्वर एक था, किन्तु अब तुलसीदासजी ने मनोजगत् में परब्रह्म के निर्गुण-स्वरूप के बावजूद सगुण ईश्वर ने सारा समाज और उसकी व्यवस्था-जो जातिवाद, वर्णाश्रम धर्म पर आधारित थी-उत्पन्न की। राम निषाद और गुह का आलिंगन कर सकते थे, किन्तु निषाद और गुह ब्राह्मण का अपमान कैसे कर सकते थे। दार्शनिक क्षेत्र का निर्गुण मत जब व्यावहारिक रूप से ज्ञानमार्गी भक्तिमार्ग बना, तो उसमें पुराण-मतवाद को स्थान नहीं था। कृष्णभक्ति के द्वारा पौराणिक कथाएं घुसीं, पुराणों ने रामभक्ति के रूप में आगे चलकर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा की।

साधारण जनों के लिए कबीर का सदाचारवाद तुलसी के सन्देश से अधिक क्रान्तिकारी था। तुलसी को भक्ति का यह मूल तत्व तो स्वीकार करना ही पड़ा कि राम के सामने सब बराबर हैं, किन्तु चूंकि राम ही ने सारा समाज उत्पन्न किया है, इसलिए वर्णाश्रम धर्म और जातिवाद को तो मानना ही होगा। पं. रामचन्द्र शुक्ल जो निर्गुण मत को कोसते हैं, वह यों ही नहीं। इसके पीछे उनकी सारी पुराण-मतवादी चेतना बोलती है।

क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि रामभक्ति-शाखा के अन्तर्गत, एक भी प्रभावशाली और महत्पूर्ण कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया? क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि कृष्णभक्ति-शाखा के अन्तर्गत रसखान और रहीम-जैसे हृदयवान मुसलमान कवि बराबर रहे आये, किन्तु रामभक्ति-शाखा के अन्तर्गत एक भी मुसलमान और शूद्र कवि प्रभावशाली और महत्वपूर्ण रूप से अपनी काव्यात्मक प्रतिभा विशद नहीं कर सका? जब कि यह एक स्वत: सिद्ध बात है कि निर्गुण-शाखा के अन्तर्गत ऐसे लोगों को अच्छा स्थान प्राप्त था।
निष्कर्ष यह कि जो भक्ति-आंदोलन जनसाधारण से शुरू हुआ और जिसमें सामाजिक कट्टरपन के विरुद्ध जनसाधारण की सांस्कृतिक आशा-आकांक्षाएं बोलती थीं, उसका ‘मनुष्य-सत्य` बोलता था, उसी भक्ति-आन्दोलन को उच्चवर्गीयों ने आगे चलकर अपनी तरह बना लिया, और उससे समझौता करके, फिर उस पर अपना प्रभाव कायम करके, और अनन्तर जनता के अपने तत्वों को उनमें से निकालकर, उन्होंने उस
पर अपना पूरा प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

और इस प्रकार, उच्चवंशी उच्चजातीय वर्गों का-समाज के संचालक शासक वर्गों का-धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में पूर्ण प्रभुत्व स्थापित हो जाने पर, साहित्यिक क्षेत्र में उन वर्गों के प्रधान भाव-श्रृंगार-विलास-का प्रभावशाली विकास हुआ, और भक्ति-काव्य की प्रधानता जाती रही। क्या कारण है कि तुलसीदास भक्ति-आन्दोलन के प्रधान (हिन्दी क्षेत्र में) अन्तिम कवि थे? सांस्कृतिक-साहित्यिक क्षेत्र में यह परिवर्तन भक्ति-आन्देालन की शिथिलता को द्योतित करता है। किन्तु यह आन्दोलन इस क्षेत्र में शिथिल क्यों हुआ?

ईसाई मत का भी यही हाल हुआ। ईसा का मत जनसाधारण में फैला तो यहूदी धनिक वर्गों ने उसका विरोध किया, रोमन शासकों ने उसका विरोध किया। किन्तु जब वह जनता का अपना धर्म बनने लगा, तो धनिक यहूदी और रोमन लोग भी उसको स्वीकार करने लगे। रोम शासक ईसाई हुए और सेंट पॉल ने उसी भावुक प्रेममूलक धर्म को कानूनी शिकंजों में जकड़ लिया, पोप जनता से फीस लेकर पापों और अपराधों के लिए क्षमापत्र वितरित करने लगा।

यदि हम धर्मों के इतिहास को देखें, तो यह जरूर पायेंगे कि तत्कालीन जनता की दुरवस्था के विरुद्ध उसने घोषणा की, जनता को एकता और समानता के सूत्र में बांधने की कोशिश की। किन्तु ज्यों-ज्यों उस धर्म में पुराने शासकों की प्रवृत्ति वाले लोग घुसते गये और उनका प्रभाव जमता गया, उतना-उतना गरीब जनता का पक्ष न केवल कमजोर होता गया, वरन् उसको अन्त में उच्चवर्गों की दासता-धार्मिक दासता-भी फिर से ग्रहण करनी पड़ी।
क्या कारण है कि निर्गुण-भक्तिमार्गी जातिवाद-विरोधी आन्दोलन सफल नहीं हो सका? उसका मूल कारण यह है कि भारत में पुरानी समाज-रचना को समाप्त करनेवाली पूंजीवादी क्रांतिकारी शक्तियां उन दिनों विकसित नहीं हुई थीं। भारतीय स्वदेशी पूंजीवाद की प्रधान भौतिक-वास्तविक भूमिका विदेशी पूंजीवादी साम्राज्यवाद ने बनायी। स्वदेशी पूंजीवाद के विकास के साथ ही भारतीय राष्ट्रवाद का अभ्युदय और सुधारवाद का जन्म हुआ, और उसने सामन्ती समाज-रचना के मूल आर्थिक आधार, यानी पेशेवर जातियों द्वारा सामाजिक उत्पादन की प्रणाली समाप्त कर दी। गांवों की पंचायती व्यवस्था टूट गयी। ग्रामों की आर्थिक आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी।

भक्ति-काल की मूल भावना साधारण जनता के कष्ट और पीड़ा से उत्पन्न है। यद्यपि पण्डित हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कहना ठीक है कि भक्ति की धारा बहुत पहले से उद्गत होती रही, और उसकी पूर्वभूमिका बहुत पूर्व से तैयार होती रही। किन्तु उनके द्वारा निकाला गया यह तर्क ठीक नहीं मालूम होता है कि भक्ति-आन्दोलन का एक मूल कारण जनता का कष्ट है। किन्तु पण्डित शुक्ल ने इन कष्टों के मुस्लिम-विरोध और हिन्दू-राज सत्ता के पक्षपाती जो अभिप्राय निकाले हैं, वे उचित नहीं मालूम होते। असल बात यह है कि मुसलमान सन्त-मत भी उसी तरह कट्टरपन्थियों के विरुद्ध था, जितना कि भक्ति-मार्ग। दोनों एक-दूसरे से प्रभावित भी थे। किन्तु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भक्ति-भावना की तीव्र आर्द्रता और सारे दु:खों और कष्टों के परिहार के लिए ईश्वर की पुकार के पीछे जनता की भयानक दु:स्थिति छिपी हुई थी। यहां यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि यह बात साधारण जनता और उसमें से निकले हुए सन्तों की है, चाहे वे ब्राह्मण वर्ग से निकले हों या ब्राह्मणेतर वर्ग से। साथ ही, यह भी स्मरण रखना होगा कि श्रृंगार-भक्ति का रूप उसी वर्ग में सर्वाधिक प्रचलित हुआ जहां ऐसी श्रृंगार-भावना के परिपोष के लिए पर्याप्त अवकाश और समय था, फुर्सत का समय। भक्ति-आन्दोलन का आविर्भाव, एक ऐतिहासिक-सामाजिक शक्ति के रूप में, जनता के दु:खों और कष्टों से हुआ, यह निर्विवाद है।
किसी भी साहित्य को हमें तीन दृष्टियों से देखना चाहिए। एक तो यह कि वह किन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक शक्तियों से उत्पन्न है, अर्थात् वह किन शक्तियों के कार्यों का परिणाम है, किन सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रियायों का अंग है? दूसरे यह कि उसका अन्त:स्वरूप क्या है, किन प्रेरणाओं और भावनाओं ने उसके आन्तरिक तत्व रूपायित किये हैं? तीसरे, उसके प्रभाव क्या हैं, किन सामाजिक शक्तियों ने उसका उपयोग या दुरूपयोग किया है और क्यों? साधारण जन के किन मानसिक तत्वों को उसने विकसित या नष्ट किया है?
(1) bhakti-andolana dakshina bharata se aya| samaja ki dharmashtravaadi ved-upanishadvadi shaktiyom ne use prastuta nahim kiya, varan alavara santom ne aura unake prabhava mem rahanevale janasadharana ne usaka prasara kiya|

(2) gyarahavim sadi se maharashtra ki gariba janata mem bhakti andolana ka prabhava atyadhika hua| rajanaitika drrishti se, yaha janata hindu-muslima donom prakara ke samanti uchchavargiyom se pida़ita rahi| santom ki vyapaka manavatavadi vani ne unhem bala diya| kirtana-gayana ne unake jivana mem rasa-samchara kiya| j~naneshvara, tukarama adi santom ne gariba kisana aura anya janata ka marga prashasta kiya| isa samskrritika atma-prasthapana ke uparanta sirpha eka aura kadama ki avashyakata thi|

aura natha-sampradaya ke logom ne janasadharana mem apana paryapta prabhava rakha, kintu bhakti-andolana ka janasadharana para jitana vyapaka prabhava hua utana kisi anya andolana ka nahim| pahali bara shudrom ne apane santa paida kiye, apana sahitya aura apane gita srrijita kie| kabira, raidasa, nabha simpi, sena nai, adi-adi mahapurushom ne ishvara ke nama para jativada ke viruddha avaja bulamda ki| samaja ke nyasta svarthavadi varga ke viruddha naya vicharavada avashyambhavi tha| vaha hua, takaliphem hui| lekina eka bata ho gayi|
Shivaji svayam maratha kshatriya tha, kintu bhakti-amdolana se, jagrata janata ke kashtom se, khuba parichita tha, aura svayam eka kushala samgathaka aura vira senadhyaksha tha| santa ramadasa, jisaka use ashirvada prapta tha, svayam sanatani brahmanavadi tha, kintu navina jagrata janata ki shakti se khuba parichita bhi tha| santa se adhika vaha svayam eka samanti rashtravadi neta tha| taba taka kattarapamthi shoshaka tatvom mem yaha bhavana paida ho gayi thi ki nimnajatiya santom se bhedabhava achcha nahim hai| aba brahmana-shaktiyam svayam unhim santom ka kirtana-gayana karane lagim| kintu isa kirtana-gayana ke dvara ve usa samaja ki rachana ko, jo jativada para adharita thi, majabuta karati ja rahi thim| eka prakara se unhomne apani paristhiti se samajhauta kara liya tha| dusare, bhakti andolana ke pradhana sandesha se prerana prapta karanevale loga brahmanom mem bhi hone lage the| ramadasa, eka prakara se, brahmanom mem se aye hue antima santa haim, isake pahale ekanatha ho chuke the| kahane ka saramsha yaha ki navina paristhiti mem yadyapi yuddha-satta (rajasatta) shoshita aura gariba tabakom se aye senadhyakshom ke pasa thi, kintu samajika kshetra mem purane samantavadiyom aura naye samantavadiyom mem samajhauta ho gaya tha| naye samantavadi kunaviyom, dhanagarom, marathom aura anya gariba jatiyom se aye hue senadhyaksha the| isa samajhaute ka phala yaha hua ki peshava brahmana hue, kintu yuddha-satta navina samantavadiyom ke hatha mem rahi|

तुलसीदासजी ने सम्बन्ध में इस प्रकार के प्रश्न अत्यन्त आवश्यक भी हैं। रामचरितमानसकार एक सच्चे सन्त थे, इसमें किसी को भी कोई सन्देह नहीं हो सकता। रामचरितमानस साधारण जनता में भी उतना ही प्रिय रहा जितना कि उच्चवर्गीय लोगों में। कट्टरपन्थियों ने अपने उद्देश्यों के अनुसार तुलसीदासजी का उपयोग किया, जिस प्रकार आज जनसंघ और हिन्दू महासभा ने शिवाजी और रामदास का उपयोग किया। सुधारवादियों की तथा आज की भी एक पीढ़ी को तुलसीदासजी के वैचारिक प्रभाव से संघर्ष करना पड़ा, यह भी एक बड़ा सत्य है।

किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि साधारण जनता ने राम को अपना त्राणकर्ता भी पाया, गुह और निषाद को अपनी छाती से लगानेवाला भी पाया। एक तरह से जनसाधारण की भक्ति-भावना के भीतर समाये हुए समान प्रेम का आग्रह भी पूरा हुआ, किन्तु वह सामाजिक ऊंच-नीच को स्वीकार करके ही। राम के चरित्र द्वारा और तुलसीदासजी के आदेशों द्वारा सदाचार का रास्ता भी मिला। किन्तु वह मार्ग कबीर के और अन्य निर्गुणवादियों के सदाचार का जनवादी रास्ता नहीं था। सच्चाई और ईमानदारी, प्रेम और सहानुभूति से ज्यादा बड़ा तकाजा था सामाजिक रीतियों का पालन। (देखिए रामायण में अनुसूया द्वारा सीता को उपदेश)। उन रीतियों और आदेशों का पालन करते हुए, और उसकी सीमा में रहकर ही, मनुष्य के उद्धार का रास्ता था। यद्यपि यह कहना कठिन है कि किस हद तक तुलसीदासजी इन आदेशों का पालन करवाना चाहते थे और किस हद तक नहीं। यह तो स्पष्ट ही है कि उनका सुझाव किस ओर था। तुलसीदासजी द्वारा इस वर्णाश्रम धर्म की पुन:र्स्थापना के अनन्तर हिन्दी साहित्य में फिर से कोई महान भक्त-कवि नहीं हुआ तो इसमें आश्चर्य नहीं।

आश्चर्य की बात यह है कि आजकल प्रगतिवादी क्षेत्रों में तुलसीदासजी के सम्बंध में जो कुछ लिखा गया है, उसमें जिस सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के तुलसीदासजी अंग थे, उसको जान-बूझकर भुलाया गया है। पण्डित रामचन्द्र शुक्ल की वर्णाश्रमधर्मी जातिवादग्रस्त सामाजिकता और सच्चे जनवाद को एक दूसरे से ऐसे मिला दिया गया है मानो शुक्लजी (जिनके प्रति हमारे मन में अत्यन्त आदर है) सच्ची जनवादी सामाजिकता के पक्षपाती हों। तुलसीदासजी को पुरातनवादी कहा जायेगा कबीर की तुलना में, जिनके विरुद्ध शुक्लजी ने चोटें की हैं।

(1) nimnavargiya bhakti-bhavana eka samajika paristhiti mem utpanna hui aura dusari samajika sthiti mem parinata hui| maharashtra mem usane eka rashtriya jati khada़i kara di, sikha eka navina jati bana gaye| ina jatiyom ne tatkalina sarvottama shasaka vargom se morcha liya| bhaktikalina santom ke bina maharashtriya bhavana ki kalpana nahim ki ja sakati, na sikha guruom ke bina sikha jati ki| saramsha yaha ki bhakti bhavana ke rajanaitika garbhitartha the| ye rajanaitika garbhitartha tatkalina samamti shoshaka vargom aura unaki vicharadhara ke samarthakom ke viruddha the|

(2) isa bhakti-andolana ke prarambhika charana mem nimnavargiya tatva sarvadhika sakshama aura prabhavashali the| dakshina bharata ke kattarapamthi tatva, jo ki tatkalina hindu samanti vargom ke samarthaka the, isa nimnavargiya samskrritika janachetana ke ekadama viruddha the| ve una para taraha-taraha ke utyachara bhi karate rahe| muslima tatvom se mara khakara bhi, hindu samanti varga unase samajhauta karane ki vivashta svikara kara, unase eka prakara se mile hue the| uttara bharata mem hinduom ke kai vargom ka pesha hi muslima vargom ki seva karana tha| akabara hi pahala shasaka tha, jisane tatkalina tathyom ke adhara para khulakara hindu samantom ka svagata kiya|

Uttarapradesha tatha dilli ke asa-pasa ke kshetrom mem hindu samanti tatva musalamana samanti tatvom se chitakakara nahim raha sake| luta-pata, nocha-khasota ke usa yuga mem janata ki arthika-samaajika du:sthiti gambhira thi| nimnavargiya jatiyom ke santom ki nirguna-vani ka, tatkalina manom ke anusara, kramntikari sudharavadi svara, apani samajika sthiti ke viruddha kshobha aura apane lie adhika manavochita paristhiti ki avashyakata batalata tha| bhaktikala ki nimnavargiya chetana ke samskrritika stara apane-apane santa paida karane lage| hindu-muslima samanti tatvom ke shoshana-shasana aura kattarapamthi drridha़ta se prerita hindu-muslima janata bhakti-marga para chala pada़i thi, chahe vaha kisi bhi nama se kyom na ho| nimnavargiya bhakti-marga nirguna-bhakti ke rupa mem prasphutita hua| isa nirguna-bhakti mem tatkalina samantavada-virodhi tatva sarvadhika the| kintu tatkalina samaja-rachana ke kattara pakshapati tatvom mem se bahutere bhakti-amdolana ke prabhava mem a gaye the| inamem se bahuta-se bhadra samanti parivarom mem se the nirguna bhakti ki udaravadi aura sudharavadi samskrritika vicharadhara ka una para bhari prabhava hua| una para bhi prabhava to hua, kintu age chalakara unhomne bhi bhakti-andolana ko prabhavita kiya| apane kattarapanthi puranamatavadi samskarom se prerita hokara, uttara bharata ki krrishnabhakti, bhavaveshavadi atmavada ko liye hue, nirguna mata ke viruddha samgharsha karane lagi| ina saguna mata mem uchchavargiya tatvom ka paryapta se adhika samavesha tha| kintu phira bhi isa saguna shrrrimgarapradhana bhakti ki itani himmata nahim thi ki vaha jati-virodhi sudharavadi vani ke viruddha pratyaksha aura prakata rupa se varnashrama dharma ke sarvabhauma auchitya ki ghoshana kare| krrishnabhaktivadi sura adi santa-kavi inhim vargom se aye the| ina kaviyom ne bhramaragitom dvara nirguna mata se samgharsha kiya aura sagunavada ki prasthapana ki| varnashrama dharma ki puna:rsthapana ke lie sirpha eka hi kadama age badha़na jaruri tha| tulasidasaji ke adamya vyaktitva ne isa karya ko pura kara diya| isa prakara bhakti-andolana, jisa para prarambha mem nimnajatiyom ka sarvadhika jora tha, usa para aba brahmanavada puri taraha cha gaya aura sudharavada ke viruddha purana matavada ki vijaya hui| isamem dilli ke asa-pasa ke kshetra tatha uttarapradesha ke hindu-muslima samanti tatva eka the| yadyapi hindu musalamanom ke adhina the, kintu du:kha aura kheda se hi kyom na sahi, yaha vivashata unhomne svikara kara li thi| ina hindu samanta tatvom ki samskrritika kshetra mem aba puri vijaya ho gayi thi|

(3) maharashtra mem isa prakriya ne kucha aura rupa liya| jana-santom ne apratyaksha rupa se maharashtra ko jagrata aura sacheta kiya, ramadasa aura shivaji ne pratyaksha rupa se navina rashtriya jati ko janma diya| kintu taba taka brahmanavadiyom aura janata ke varga se aye hue prabhavashali senadhyakshom aura santom mem eka-dusare ke lie kaphi udarata batalayi jane lagi| shivaji ke uparanta, janata ke gariba vargom se aye hue senadhyakshom aura netaom ne naye samanti gharane sthapita kiya| natija yaha hua ki peshavaom ke kala mem brahmanavada phira joradara ho gaya| kahane ka saramsha yaha ki maharashtra mem vahi hala hua jo uttarapradesha mem| antara yaha tha ki nimnajatiya samskrritika chetana jise pala-pala para kattarapamtha se mukabala karana pada़a tha, vaha uttara bharata se adhika dirghakala taka rahi| peshavaom ke kala mem donom ki sthiti barabara-barabara rahi| kintu age chalakara, amgreji rajaniti ke jamane mem, purane samgharshom ki yadem duharayi gayim, aura ‘brahmana-brahmanetaravada` ka punarjanma aura vikasa hua| aura isa samaya bhi lagabhaga vahi sthiti hai| pharka itana hi hai ki nimnajatiyom ke pichada़e hue loga shidyulakasta phedareshana mem hai, aura agragami loga kamgresa, pejemntsa ainda varkarsa parti, kamyunista parti tatha anya vamapakshi dalom mem shamila ho gaye haim| akhira jaba inhim jatiyom mem se purane jamane mem santa a sakate the, age chalakara senadhyaksha nikala sakate the, to aba rajanaitika vicharaka aura neta kyom nahim nikala sakate?

(4) samantavadi kala mem ina jatiyom ko saphalata prapta nahim ho sakati thi, jaba taka ki pumjivadi samaja-rachana samanti samaja-rachana ko samapta na kara deti| kintu sachchi arthika-samajika samanata taba taka prapta nahim ho sakati, jaba taka ki samaja arthika-samajika adhara para vargahina na ho jaye|

(5) kisi bhi sahitya ka vastavika vishleshana hama taba taka nahim kara sakate, jaba taka ki hama una gatimana samajika shaktiyom ko nahim samajhate, jinhomne manovaij~nanika-samskrritika dharatala para atmaprakatikarana kiya hai| kabira, tulasidasa adi samtom ke adhyayana ke lie yaha sarvadhika avashyaka hai| maim isa ora pragativadi kshetra ka dhyana akarshita karana chahata hum|

दूसरे, जो लोग शोषित निम्नवर्गीय जातियों के साहित्यिक और सांस्कृतिक संदेश में दिलचस्पी रखते हैं, और उस सन्देश के प्रगतिशील तत्वों के प्रति आदर रखते हैं, वे लोग तो यह जरूर देखेंगे कि जनता की सामाजिक मुक्ति को किस हद तक किसने सहारा दिया और तुलसीदासजी का उसमें कितना योग रहा। चाहे श्री रामविलास शर्मा-जैसे ‘मार्क्सवादी` आलोचक हमें ‘वल्गर मार्क्सवादी` या बूर्ज्वा कहें, यह बात निस्सन्देह है कि समाजशाी़य दृष्टि से मध्ययुगीन भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक शक्तियों के विश्लेषण के बिना, तुलसीदासजी के साहित्य के अन्त:स्वरूप क साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। जहां तक रामचरितमानस की काव्यगत सफलताओं का प्रश्न है, हम उनके सम्मुख केवल इसलिए नतमस्तक नहीं हैं कि उसमें श्रेष्ठ कला के दर्शन होते हैं, बल्कि इसलिए कि उसमें उक्त मानव-चरित्र के, भव्य और मनोहर व्यक्तित्व-सत्ता के, भी दर्शन होते हैं।
तुलसीदासजी की रामायण पढ़ते हुए, हम एक अत्यन्त महान् व्यक्तित्व की छाया में रहकर अपने मन और हृदय का आप-ही-आप विस्तार करने लगते हैं और जब हम कबीर आदि महान् जनोन्मुख कवियों का सन्देश देखते हैं, तो हम उनके रहस्यवाद से भी मुंह मोड़ना चाहते हें। हम उस रहस्यवाद के समाजशाी़य अध्ययन में दिलचस्पी रखते हैं, और यह कहना चाहते हैं कि निर्गुण मत की सीमाएं तत्कालीन विचारधारा की सीमाएं थीं, जनता का पक्ष लेकर जहां तक जाया जा सकता था, वहां तक जाना हुआ। निम्नजातीय वर्गों के इस सांस्कृतिक योग की अपनी सीमाएं थीं। ये सीमाएं उन वर्गों की राजनैतिक चेतना की सीमाएं थीं। आधुनिक अर्थों में, वे वर्ग कभी जागरूक सामाजिक-राजनैतिक-संघर्ष-पथ पर अग्रसर नहीं हुए। इसका कारण क्या है, यह विषय यहां अप्रस्तुत है। केवल इतना ही कहना उपयुक्त होगा कि संघर्षहीनता के अभाव का मूल कारण भारत की सामन्तयुगीन सामाजिक-आर्थिक रचना में है। दूसरे, जहां ये संघर्ष करते-से दिखायी दिये, वहां उन्होंने एक नये सामान्ती शासक वर्ग को ही दृढ़ किया, जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ है।

प्रस्तुत विचारों के प्रधान निष्कर्ष ये हैं :

(१) निम्नवर्गीय भक्ति-भावना एक सामाजिक परिस्थिति में उत्पन्न हुई और दूसरी सामाजिक स्थिति में परिणत हुई। महाराष्ट्र में उसने एक राष्ट्रीय जाति खड़ी कर दी, सिख एक नवीन जाति बन गये। इन जातियों ने तत्कालीन सर्वोत्तम शासक वर्गों से मोर्चा लिया। भक्तिकालीन सन्तों के बिना महाराष्ट्रीय भावना की कल्पना नहीं की जा सकती, न सिख गुरुओं के बिना सिख जाति की। सारांश यह कि भक्ति भावना के राजनैतिक गर्भितार्थ थे। ये राजनैतिक गर्भितार्थ तत्कालीन सामंती शोषक वर्गों और उनकी विचारधारा के समर्थकों के विरुद्ध थे।

(२) इस भक्ति-आन्दोलन के प्रारम्भिक चरण में निम्नवर्गीय तत्व सर्वाधिक सक्षम और प्रभावशाली थे। दक्षिण भारत के कट्टरपंथी तत्व, जो कि तत्कालीन हिन्दू सामन्ती वर्गों के समर्थक थे, इस निम्नवर्गीय सांस्कृतिक जनचेतना के एकदम विरुद्ध थे। वे उन पर तरह-तरह के उत्याचार भी करते रहे। मुस्लिम तत्वों से मार खाकर भी, हिन्दू सामन्ती वर्ग उनसे समझौता करने की विवश्ता स्वीकार कर, उनसे एक प्रकार से मिले हुए थे। उत्तर भारत में हिन्दुओं के कई वर्गों का पेशा ही मुस्लिम वर्गों की सेवा करना था। अकबर ही पहला शासक था, जिसने तत्कालीन तथ्यों के आधार पर खुलकर हिन्दू सामन्तों का स्वागत किया।

उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में हिन्दू सामन्ती तत्व मुसलमान सामन्ती तत्वों से छिटककर नहीं रह सके। लूट-पाट, नोच-खसोट के उस युग में जनता की आर्थिक-सामााजिक दु:स्थिति गंभीर थी। निम्नवर्गीय जातियों के सन्तों की निर्गुण-वाणी का, तत्कालीन मानों के अनुसार, क्रांन्तिकारी सुधारवादी स्वर, अपनी सामाजिक स्थिति के विरुद्ध क्षोभ और अपने लिए अधिक मानवोचित परिस्थिति की आवश्यकता बतलाता था। भक्तिकाल की निम्नवर्गीय चेतना के सांस्कृतिक स्तर अपने-अपने सन्त पैदा करने लगे। हिन्दू-मुस्लिम सामन्ती तत्वों के शोषण-शासन और कट्टरपंथी दृढ़ता से प्रेरित हिन्दू-मुस्लिम जनता भक्ति-मार्ग पर चल पड़ी थी, चाहे वह किसी भी नाम से क्यों न हो। निम्नवर्गीय भक्ति-मार्ग निर्गुण-भक्ति के रूप में प्रस्फुटित हुआ। इस निर्गुण-भक्ति में तत्कालीन सामन्तवाद-विरोधी तत्व सर्वाधिक थे। किन्तु तत्कालीन समाज-रचना के कट्टर पक्षपाती तत्वों में से बहुतेरे भक्ति-आंदोलन के प्रभाव में आ गये थे। इनमें से बहुत-से भद्र सामन्ती परिवारों में से थे निर्गुण भक्ति की उदारवादी और सुधारवादी सांस्कृतिक विचारधारा का उन पर भारी प्रभाव हुआ। उन पर भी प्रभाव तो हुआ, किन्तु आगे चलकर उन्होंने भी भक्ति-आन्दोलन को प्रभावित किया। अपने कट्टरपन्थी पुराणमतवादी संस्कारों से प्रेरित होकर, उत्तर भारत की कृष्णभक्ति, भावावेशवादी आत्मवाद को लिये हुए, निर्गुण मत के विरुद्ध संघर्ष करने लगी। इन सगुण मत में उच्चवर्गीय तत्वों का पर्याप्त से अधिक समावेश था। किन्तु फिर भी इस सगुण श्रृंगारप्रधान भक्ति की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह जाति-विरोधी सुधारवादी वाणी के विरूद्ध प्रत्यक्ष और प्रकट रूप से वर्णाश्रम धर्म के सार्वभौम औचित्य की घोषणा करे। कृष्णभक्तिवादी सूर आदि सन्त-कवि इन्हीं वर्गों से आये थे। इन कवियों ने भ्रमरगीतों द्वारा निर्गुण मत से संघर्ष किया और सगुणवाद की प्रस्थापना की। वर्णाश्रम धर्म की पुन:र्स्थापना के लिए सिर्फ एक ही कदम आगे बढ़ना जरूरी था। तुलसीदासजी के अदम्य व्यक्तित्व ने इस कार्य को पूरा कर दिया। इस प्रकार भक्ति-आन्दोलन, जिस पर प्रारंभ में निम्नजातियों का सर्वाधिक जोर था, उस पर अब ब्राह्मणवाद पूरी तरह छा गया और सुधारवाद के विरुद्ध पुराण मतवाद की विजय हुई। इसमें दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र तथा उत्तरप्रदेश के हिन्दू-मुस्लिम सामन्ती तत्व एक थे। यद्यपि हिन्दू मुसलमानों के अधीन थे, किन्तु दु:ख और खेद से ही क्यों न सही, यह विवशता उन्होंने स्वीकार कर ली थी। इन हिन्दू सामन्त तत्वों की सांस्कृतिक क्षेत्र में अब पूरी विजय हो गयी थी।

(३) महाराष्ट्र में इस प्रक्रिया ने कुछ और रूप लिया। जन-सन्तों ने अप्रत्यक्ष रूप से महाराष्ट्र को जाग्रत और सचेत किया, रामदास और शिवाजी ने प्रत्यक्ष रूप से नवीन राष्ट्रीय जाति को जन्म दिया। किन्तु तब तक ब्राह्मणवादियों और जनता के वर्ग से आये हुए प्रभावशाली सेनाध्यक्षों और सन्तों में एक-दूसरे के लिए काफी उदारता बतलायी जाने लगी। शिवाजी के उपरान्त, जनता के गरीब वर्गों से आये हुए सेनाध्यक्षों और नेताओं ने नये सामन्ती घराने स्थापित किय। नतीजा यह हुआ कि पेशवाओं के काल में ब्राह्मणवाद फिर जोरदार हो गया। कहने का सारांश यह कि महाराष्ट्र में वही हाल हुआ जो उत्तरप्रदेश में। अन्तर यह था कि निम्नजातीय सांस्कृतिक चेतना जिसे पल-पल पर कट्टरपंथ से मुकाबला करना पड़ा था, वह उत्तर भारत से अधिक दीर्घकाल तक रही। पेशवाओं के काल में दोनों की स्थिति बराबर-बराबर रही। किन्तु आगे चलकर, अंग्रेजी राजनीति के जमाने में, पुराने संघर्षों की यादें दुहरायी गयीं, और ‘ब्राह्मण-ब्राह्मणेतरवाद` का पुनर्जन्म और विकास हुआ। और इस समय भी लगभग वही स्थिति है। फर्क इतना ही है कि निम्नजातियों के पिछड़े हुए लोग शिड्यूलकास्ट फेडरेशन में है, और अग्रगामी लोग कांग्रेस, पेजेंन्ट्स ऐण्ड वर्कर्स पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी तथा अन्य वामपक्षी दलों में शामिल हो गये हैं। आखिर जब इन्हीं जातियों में से पुराने जमाने में सन्त आ सकते थे, आगे चलकर सेनाध्यक्ष निकल सकते थे, तो अब राजनैतिक विचारक और नेता क्यों नहीं निकल सकते?

(४) सामन्तवादी काल में इन जातियों को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती थी, जब तक कि पूंजीवादी समाज-रचना सामन्ती समाज-रचना को समाप्त न कर देती। किन्तु सच्ची आर्थिक-सामाजिक समानता तब तक प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक कि समाज आर्थिक-सामाजिक आधार पर वर्गहीन न हो जाये।

(५) किसी भी साहित्य का वास्तविक विश्लेषण हम तब तक नहीं कर सकते, जब तक कि हम उन गतिमान सामाजिक शक्तियों को नहीं समझते, जिन्होंने मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक धरातल पर आत्मप्रकटीकरण किया है। कबीर, तुलसीदास आदि संतों के अध्ययन के लिए यह सर्वाधिक आवश्यक है। मैं इस ओर प्रगतिवादी क्षेत्र का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

Tulasidasaji ki ramayana padha़te hue, hama eka atyanta mahan vyaktitva ki chaya mem rahakara apane mana aura hrridaya ka apa-hi-apa vistara karane lagate haim aura jaba hama kabira adi mahan janonmukha kaviyom ka sandesha dekhate haim, to hama unake rahasyavada se bhi mumha moda़na chahate hem| hama usa rahasyavada ke samajashai़ya adhyayana mem dilachaspi rakhate haim, aura yaha kahana chahate haim ki nirguna mata ki simaem tatkalina vicharadhara ki simaem thim, janata ka paksha lekara jaham taka jaya ja sakata tha, vaham taka jana hua| nimnajatiya vargom ke isa samskrritika yoga ki apani simaem thim| ye simaem una vargom ki rajanaitika chetana ki simaem thim| adhunika arthom mem, ve varga kabhi jagaruka samajika-rajanaitika-samgharsha-patha para agrasara nahim hue| isaka karana kya hai, yaha vishaya yaham aprastuta hai| kevala itana hi kahana upayukta hoga ki samgharshahinata ke abhava ka mula karana bharata ki samantayugina samajika-arthika rachana mem hai| dusare, jaham ye samgharsha karate-se dikhayi diye, vaham unhomne eka naye samanti shasaka varga ko hi drridha़ kiya, jaisa ki maharashtra mem hua hai|

Prastuta vicharom ke pradhana nishkarsha ye haim :

Udhara samajika-samskrritika kshetra mem nimnavargiya bhaktirmaga ke janavadi samdesha ke damta ukhada़ liye gaye| una santom ko sarvavargiya manyata prapta hui, kintu unake sandesha ke mula svarupa para kutharaghata kiya gaya, aura jativadi puranadharma puna: ni:shamka bhava se pratishthita hua|

(4) uttara bharata mem nirgunavadi bhakti – andolana mem shoshita janata ka sabase bada़a hatha tha| kabira, raidas , adi santo ki baniyom ka sandesh, tatkalina manom ke anusara, bahuta adhika kramntikari tha| yaha akasmikata na thi ki chandidasa kaha uthata hai :
Shunaha manusha bhai
Shabara upare manusha shato
Tahara upare nai|
Isa manushya-satya ki ghoshana ke kramtikari abhipraya kabira mem prakata hue| kuritiyom, dharmika andhavishvasom aura jativada ke viruddha kabira ne avaja uthayi| vaha phaili| nimna jatiyom mem atmavishvasa paida hua| unamem atma-gaurava ka bhava hua| samaja ki shasaka-satta ko yaha kaba achcha lagata? Nirguna mata ke viruddha saguna mata ka prarambhika prasara aura vikasa uchchavamshiyom mem hua| nirguna mata ke viruddha sagunamata ka samgharsha nimna vargom ke viruddha uchchavamshi samskarashila abhiruchivalom ka samgharsha tha| saguna mata vijayi hua| usaka prarambhika vikasa krrishnabhakti ke rupa mem hua| yaha krrishnabhakti kai arthom mem nimnavargiya bhakti-andolana se prabhavita thi| uchchavargiyom ka eka bhavuka tabaka bhakti-andolana se hamesha prabhavita hota raha, chahe vaha dakshina bharata mem ho ya uttara bharata mem| isa krrishnabhakti mem jativada ke viruddha kai batem thim| vaha eka prakara se bhavaveshi vyaktivada tha| isi karana, maharashtra mem, nirguna mata ke bajaya nimna-varga mem, saguna mata hi adhika phaila| santa tukarama ka bithoba eka sarvajanika krrishna tha| krrishnabhaktivali mira ‘lokalaja` choda़ chuki thi| sura krrishna-prema mem vibhora the| nimnavargiyom mem krrishnabhakti ke prachara ke lie paryapta avakasha tha, jaisa maharashtra ki santa parampara ka itihasa batalata hai| uttara bharata mem krrishnabhakti-shakha ka nirguna mata ke viruddha jaisa samgharsha hua vaisa maharashtra mem nahim raha| maharashtra mem krrishna ki shrrrimgara-bhakti nahim thi, na bhramaragitom ka jora tha| krrishna eka taranakarta devata tha, jo apane bhaktom ka uddhara karata tha, chahe vaha kisi bhi jati ka kyom na ho| maharashtriya saguna krrishnabhakti mem shrrrimgarabhavana, aura nirguna bhakti, ina do ke bicha koi samgharsha nahim tha| udhara uttara bharata mem, nandadasa vagairaha krrishnabhaktivadi santom ki nirguna mata-virodhi bhavana spashta hi hai| aura ye saba loga uchchakulodbhava the| yadyapi uttara bharatiya krrishnabhakti vale kavi uchchavamshiya the, aura nirguna mata se unaka sidha samgharsha bhi tha, kintu hindu samaja ke muladhara yani varnashrama-dharma ke virodhiyom ne jativada-virodhi vicharom para sidhi chota nahim ki thi| kintu uttara bharatiya bhakti andolana para unaka prabhava nirnayaka raha|

Eka bara bhakti-andolana mem brahmanom ka prabhava jama jane para varnashrama dharma ki punarvijaya ki ghoshana mem koi dera nahim thi| ye ghoshana tulasidasaji ne ki thi| nirguna mata mem nimnajatiya dharmika janavada ka pura jora tha, usaka krantikari sandesha tha| krrishnabhakti mem vaha bilkula kama ho gaya kintu phira bhi nimnajatiya prabhava abhi bhi paryapta tha| tulasidasa ne bhi nimnajatiya bhakti svikara ki, kintu usako apana samajika dayara batala diya| nirguna matavada ke janonmukha rupa aura usaki krantikari jativada-virodhi bhumika ke viruddha tulasidasaji ne purana-matavadi svarupa prastuta kiya| nirguna-matavadiyom ka ishvara eka tha, kintu aba tulasidasaji ne manojagat mem parabrahma ke nirguna-svarupa ke bavajuda saguna ishvara ne sara samaja aura usaki vyavastha-jo jativada, varnashrama dharma para adharita thi-utpanna ki| rama nishada aura guha ka alimgana kara sakate the, kintu nishada aura guha brahmana ka apamana kaise kara sakate the| darshanika kshetra ka nirguna mata jaba vyavaharika rupa se j~nanamargi bhaktimarga bana, to usamem purana-matavada ko sthana nahim tha| krrishnabhakti ke dvara pauranika kathaem ghusim, puranom ne ramabhakti ke rupa mem age chalakara varnashrama dharma ki punarvijaya ki ghoshana ki|

Sadharana janom ke lie kabira ka sadacharavada tulasi ke sandesha se adhika krantikari tha| tulasi ko bhakti ka yaha mula tatva to svikara karana hi pada़a ki rama ke samane saba barabara haim, kintu chumki rama hi ne sara samaja utpanna kiya hai, isalie varnashrama dharma aura jativada ko to manana hi hoga| pam. Ramachandra shukla jo nirguna mata ko kosate haim, vaha yom hi nahim| isake piche unaki sari purana-matavadi chetana bolati hai Article for Muktibodh

Yadi hama dharmom ke itihasa ko dekhem, to yaha jarura payemge ki tatkalina janata ki duravastha ke viruddha usane ghoshana ki, janata ko ekata aura samanata ke sutra mem bamdhane ki koshisha ki| kintu jyom-jyom usa dharma mem purane shasakom ki pravrritti vale loga ghusate gaye aura unaka prabhava jamata gaya, utana-utana gariba janata ka paksha na kevala kamajora hota gaya, varan usako anta mem uchchavargom ki dasata-dharmika dasata-bhi phira se grahana karani pada़i|
Kya karana hai ki nirguna-bhaktimargi jativada-virodhi andolana saphala nahim ho saka? Usaka mula karana yaha hai ki bharata mem purani samaja-rachana ko samapta karanevali pumjivadi kramtikari shaktiyam una dinom vikasita nahim hui thim| bharatiya svadeshi pumjivada ki pradhana bhautika-vastavika bhumika videshi pumjivadi samrajyavada ne banayi| svadeshi pumjivada ke vikasa ke satha hi bharatiya rashtravada ka abhyudaya aura sudharavada ka janma hua, aura usane samanti samaja-rachana ke mula arthika adhara, yani peshevara jatiyom dvara samajika utpadana ki pranali samapta kara di| gamvom ki pamchayati vyavastha tuta gayi| gramom ki arthika atmanirbharata samapta ho gayi|

Bhakti-kala ki mula bhavana sadharana janata ke kashta aura pida़a se utpanna hai| yadyapi pandita hajariprasada dvivedi ka yaha kahana thika hai ki bhakti ki dhara bahuta pahale se udgata hoti rahi, aura usaki purvabhumika bahuta purva se taiyara hoti rahi| kintu unake dvara nikala gaya yaha tarka thika nahim maluma hota hai ki bhakti-andolana ka eka mula karana janata ka kashta hai| kintu pandita shukla ne ina kashtom ke muslima-virodha aura hindu-raja satta ke pakshapati jo abhipraya nikale haim, ve uchita nahim maluma hote| asala bata yaha hai ki musalamana santa-mata bhi usi taraha kattarapanthiyom ke viruddha tha, jitana ki bhakti-marga| donom eka-dusare se prabhavita bhi the| kintu isa bata se inakara nahim kiya ja sakata ki bhakti-bhavana ki tivra ardrata aura sare du:khom aura




  1. Jamuna TayengJamuna Tayeng01-30-2013

    मुक्तिबोध का यह आर्टिकल पढ़ कर बहुत अच्छा लगा… आज दलित विमर्श जैसे नए सवाल बहुत पहले से ही भक्ति आन्दोलन में संत कवियों की रचनाओ में बीज रूप में मिलते हैं.. आशा है इसी तरह हमें और भी नए-नए आर्टिकल आएँगे.

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