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आदिवासी जीवन संघर्ष और परिवर्तन की चुनौतियां

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उड़ीसा के कंध आदिवासी समुदाय में एक कथा प्रचलित है कि ‘‘पुराने जमाने में राजा छोटा भाई था और परजा यानी प्रजा बड़ा भाई थी। बड़ा भाई घुड़सवारी के लिए चाबुक की कमाची तोड़ने जा रहा था कि इतने में ही छोटा भाई आकर घोड़े की पीठ पर जम गया। उस दिन से छोटा भाई राजा है-ठग भाई कहीं का।’’ मतलब यह कि जिन संसाधनों पर बड़े भाई यानी जनता का हक था, उनपर छोटे भाई यानी राजा ने कब्जा कर लिया और कमाची तोड़ने के लिए गया बड़ा भाई (यानी श्रम करने वाला जन) हमेशा के लिए अपने अधिकारों से वंचित हो गया। घोड़े पर चढ़ बैठा छोटा भाई (यानी विलासिता करने वाला राजा) सम्माननीय हो गया। यह भारतीय समाज की उस मूल संरचना से निकली कथा है जिसमें कि श्रम करने वाले को हिकारत की निगाह से देखा जाता है और श्रम न करने व विलासिता करने वाले को सम्मान की निगाह से। राजा और प्रजा, शोषक और शोषित, आदिवासी और दिकू के बीच का द्वंद्व व संघर्ष दरअसल इसी मूल संरचना के कारण उपजता है।
आदिवासी समाज के जीवन संघर्ष और परिवर्तन की चुनौतियों पर बात करते समय हमारे सामने पूरे विश्व में बिखरे पड़े तमाम आदिवासी समुदाय हैं- अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्षरत। तथाकथित मुख्यधारा की संस्कृति और सभ्यता ने उनके सामने दो ही रास्ते छोड़े हैं कि या तो वे अपनी अस्मिता, अपना इतिहास, अपनी परंपरा को मिटाकर ‘मुख्यधारा’ की वर्चस्ववादी संस्कृति को स्वीकार कर लें (यानी उसमें अपना निम्नतम दरजा स्वीकार कर लें) या फिर भौतिक रूप से पृथ्वी नामक इस ग्रह से अपना अस्तित्व मिट जाने के लिए अभिशप्त हो जाएं-पेरू के माची ग्वेंकाओं या झारखंड के बिरहोर, शबर, कोरबा, असुर या राजस्थान के सहरिया आदिवासी जनजातियों की तरह जिनकी संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। हद तो यह है कि वैश्वीकरण के इस दौर में बाजार की मांग पर आदिवासियों की नुमाइश तक हो रही है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के जारवा और आंजे समुदाय को चिड़ियाघर में बंद वन्य जंतुओं की तरह पर्यटन और विस्मय की ‘वस्तु’ बना दिया गया है- उनको केले और बिस्कुट देकर उनके साथ फोटो खिंचवाये जाते हैं। ‘विकास’ और बाजार का अद्भुत समन्वय है यह। इन दमित अस्मिताओं और राष्ट्रीयताओं को खत्म करने के लिए मानव इतिहास की सबसे बड़ी साजिशें बुनी जा रही हैं। ‘मुख्यधारा’ के इतिहास को अपराजेय और सार्वभौमिक बताकर इतिहास के खात्मे की घोषणा की जा रही है और इसकी आड़ में ‘मुख्यधारा’ की राजनीतिक और आर्थिक ताकतें आंतरिक उपनिवेश स्थापित करके आदिवासियों के संसाधनों की खुली लूट कर रही हैं। इस विकट स्थिति में एक ही रास्ता बचता है जिसे कभी ‘‘हूल’’ कहा गया तो कभी ‘‘उलगुलान’’ यानी कि अपने अधिकारों के लिए सशक्त प्रतिरोध। ‘मुख्यधारा’ के ‘सर्वमान्य’ बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों द्वारा बार-बार नकारे जाने के बावजूद यह ‘‘उलगुलान’’ फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी राख में से उठ खड़ा होता है।
विशिष्ट कथाकार संजीव (मैं उनके लिए प्रख्यात या प्रसिद्ध शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा-क्योंकि ये शब्द उनकी विनम्र जीवन शैली और कार्यप्रणाली के अनुकूल नहीं) का उपन्यास ‘पांव तले की दूब’ झारखंड के आदिवासियों के अस्तित्व और अस्मिता के इर्द-गिर्द विकसित और गुंफित है। उपन्यास का नाम ही आदिवासियों की स्थिति को स्पष्ट कर देता है। पांव तले की दूब जिसे हम बिलकुल सहजता और बिना किसी संकोच के कुचलते हुए चले जाते हैं और इस कुचलने का कोई अपराधबोध भी नहीं होता। संकट तब खड़ा होता है जब कभी यह दूब हमारे पांवों को चुभ जाती है और हमारे मुलायम चेहरे पर उभरे विचलन के साथ ही उसके ‘होने’ का भी एहसास होता है। उपन्यास की कथा का केंद्र सुदीप्त नाम का एक नौजवान है। मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आया यह नौजवान झारखंड आंदोलन का एक समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ता बनता है। ऐतिहासिक धनकटनी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। लेकिन झारखंड आंदोलन की विफलता और पथभ्रष्टता उसको अकेलेपन और अवसाद में डाल देती है। वह लौट जाता है और फिर एनटीपीसी में इंजीनियर की हैसियत से अपने कार्यक्षेत्र में वापस लौटता है। लौटकर वह पाता है कि स्थितियां और भी उलझ गई हैं। जैसे जैसे आंदोलन बेईमान और क्षीण हो रहा है, वैसे वैसे आदिवासियों का शोषण करनेवाली व्यवस्था मजबूत हो रही है। वह प्रतिरोध करता है लेकिन अंततः पलायन का रास्ता अख्तियार कर लेता है और अज्ञातवास में चला जाता है। आखिरकार पंचपहाड़ नामक उस जगह पर असफलता के बोझ से लदा और सच्चाई की तलाश करता नायक सुदीप्त आत्महत्या कर लेता है। उपन्यास की कथा कहने वाले दो लोग हैं- एक सुदीप्त स्वयं और दूसरा उसका मित्र समीर जो कि मुंबई से निकलने वाली एक पत्रिका का संपादक है जो उसकी चिट्ठी पर उसकी तलाश में पंचपहाड़ आता है और उसे वहां अंधेरी गुफा में सुदीप्त के आत्मकथ्य मिलते हैं और गुफा के ऊपर उसका कंकाल।
मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आये संवेदनशील नौजवान सुदीप्त के पलायन के चारों ओर बिखरा पड़ा है झारखंड के आदिवासी समुदायों का सच। सुदीप्त के पलायन के पीछे जहां एक ओर मध्यवर्ग की ‘पलायन प्रवृत्ति’ की पृष्ठभूमि है, वहीं दूसरी ओर झारखंड में आदिवासी आंदोलनों और झारखंड-राज्य के आंदोलन का विकृत होता स्वरूप। झारखंड के आदिवासी समुदायों की अस्मिता, उनकी पहचान, उनकी राष्ट्रीयता उपन्यास के केंद्र में है। सुदीप्त कहता है कि, ‘‘झारखंड एक शोषित राष्ट्रीयता का सवाल है।’’ एक ऐसी राष्ट्रीयता जिसकी अपनी धार्मिक व्यवस्था है, जीने का अपना ढंग है, अपनी परंपरा और अपना इतिहास है लेकिन चूंकि वह धार्मिक व्यवस्था, जीने का ढंग, परंपरा और इतिहास सत्ता और साम्राज्य को स्वीकृत नहीं है इसलिए वह शोषित होने के लिए अभिशप्त है। जब इस शोषण के विरुद्ध बगावत का स्वर बुलंद होता है तो लड़ाई ‘‘आदमी और आदमखोर व्यवस्था के बीच हो जाती है। वह व्यवस्था, जो सत्ता अपने हित में बुनती जा रही है।’’ दमित राष्ट्रीयता का यह सवाल सायास, संस्कृति और जीने के अधिकार की रक्षा से जुड़ जाता है। ‘पांव तले की दूब’ में यह सवाल हमें इस स्तर पर चुभता है कि क्या हम मुख्यधारा की संस्कृति के दंभ में कुछ लोगों को धरती से हमेशा हमेशा के लिए खत्म करने की साजिश को चुपचाप देखते रहेंगे। ‘‘किसी समुदाय की संस्कृति उसके जीवन के पूरे दायरे (देश-काल) में अर्जित मूल्य-बोध की पूंजी होती है और उसके लिए पहचान (अस्मिता, आइडेंटिटी) के संकट का सवाल तब आता है जब वह देखता है कि उस पर आक्रमण हो रहे हैं, जब उसकी पहचान के विघटित होने का भय उसे आतंकित करता है।’’ झारखंड इस संकट के पहचान का एक नमूना है। झारखंड की दमित राष्ट्रीयता को लगातार कुचला और दबाया जा रहा है और उस पर ‘मुख्यधारा’ की सभ्यता-संस्कृति का निरंतर हमला भी हो रहा है। इस हमले के कारण आदिवासियों की संस्कृति लगातार विकृत होती जा रही है।
आदिवासी समुदायों में बड़े पैमाने पर महाजनी कुप्रथा प्रवेश पा रही है। आदिवासी इस महाजनी के घनचक्कर में लगातार गरीब-दर-गरीब होते जा रहे हैं और उसी क्रम में अपनी प्राकृतिक संपदाओं से महरूम भी। यह महाजनी गांव के स्तर से लेकर अंतर-राष्ट्रीय स्तर तक जारी है। इसके अलावा, ‘मुख्यधारा’ की सामाजिक संरचना (जाति-व्यवस्था) जो कि वर्चस्व पर आधारित वर्ण-व्यवस्था से निर्मित है, धीरे-धीरे आदिवासी समुदाय में अपनी जड़ जमा रही है। इसको लाने में वही ताकतें काम कर रही हैं जो भारत को बहुलवादी देश से एक ‘हिंदू राष्ट्र’ में तब्दील कर देने को बेताब हैं। वीर भारत तलवार लिखते हैं-‘‘आज झारखंडी संस्कृति के विकास की राह में सामाजिक दृष्टि से सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवाद है। यह न केवल विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा है, बल्कि झारखंड की विभिन्न जातियों की जातीय पहचान को तोड़ने और विकृत करने तथा यहां की जातीय संस्कृति के महान जनतांत्रिक मूल्यों को नष्ट करने की मुख्य जिम्मेदारी भी इसी ब्राह्मणवाद पर है। झारखंडी संस्कृति और ब्राह्मणवादी संस्कृति बुनियादी तौर पर एक-दूसरे की विरोधी हैं। झारखंडी संस्कृति बुनियादी तौर पर समाज के सभी सदस्यों की समानता पर, जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित संस्कृति रही है, जबकि ब्राह्मणवादी संस्कृति बुनियादी तौर पर मनुष्यों की सामाजिक समानता की विरोधी, जनतंत्रविरोधी संस्कृति रही है। झारखंडी संस्कृति शोषितों की संस्कृति है, जबकि ब्राह्मणवादी संस्कृति शोषकों की संस्कृति है।’’ शोषकों की इस ब्राह्मणवादी संस्कृति के फैलते प्रभाव ने आदिवासी समुदायों के स्वभाव एवं चरित्र को बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भोगवादी ब्राह्मणवाद ने आदिवासियों में दलाली और बिकाऊ प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है जोकि आदिवासी संस्कृति के स्वभाव के विपरीत है। उपन्यास की एक पात्र शीला केरकेट्टा इसी प्रवृत्ति की प्रतिनिधि है। उसके अंदर अपनी आदिवासी अस्मिता को घृणित समझकर त्यागने और मुख्यधारा की अस्मिता को स्वीकार करने का इतना तीव्र मोह है कि वह इस परिवर्तन को अपनी भाव-भंगिमा तक में उतार लेती है। वह उन आदिवासी चेहरों का प्रतिनिधि चेहरा है जिन्होंने आदिवासी अस्मिता का सौदा करके लुटेरों और शोषितों की संस्कृति में अपने लिए जगह बनाई है। आज झारखंड को देखने पर ऐसे अनगिनत चेहरे दिख जाएंगे। वर्ण-व्यवस्था के पांव फैलाने से आदिवासी समुदायों में जाति तंत्र विकसित हो रहा है और एक ही कबीले में ऊंच-नीच की भावना और सामाजिक श्रेणी विकसित हो रही है। कबीलों का जनतंत्र समाप्त हो रहा है। महिलाओं की सामाजिक आर्थिक स्थिति में लगातार गिरावट हो रही है। चूंकि ब्राह्मणवाद महिलाओं की ‘मर्यादासम्मत’ गुलामी को वैध ठहराता है सो, उसके हमले के कारण लगातार आदिवासी समुदायों में, खासकर मुंडाओं में महिलाओं की स्वतंत्रता को हिकारत की निगाह से देखा जा रहा है और उनकी गुलामी को वैधता प्रदान की जा रही है।
‘पांव तले की दूब’ में उपन्यासकार ने झारखंड में विकास बनाम विस्थापन की अमानवीय और वीभत्स तस्वीर उकेरी है। सुदीप्त जब एक एक्टिविस्ट के रूप में बाघमुंडी पहुंचता है तो पाता है कि ‘‘आदिवासियों को जिनकी जमीन पर ये कारखाने लग रहे हैं, उन्हें टोटली डिप्राइव किया जा रहा है- इस संपत्ति में उनकी भागीदारी तो खत्म की ही जा रही है, उन्हें जमीन से भी बेदखल किया जा रहा है, मुआवजा भी अफसरों के पेट में।’’ और दोबारा जब वह एनटीपीसी में नौकरी करने लौटता है तो देखता है कि ‘‘वर्षों पहले यहां ‘डोकरी’ और ‘मकरा’ नाम के दो गांव हुआ करते थे। किसी ने फूंक मारकर उड़ा दिया उन्हें। कहां गए वे विस्थापित लोग? उड़ी हुई गर्द की तरह जहां-तहां थिरा रहे होंगे लोग।’’ विस्थापन का यह दर्द आज भी बदस्तूर है। विकास के इस अ-मानवीय माॅडल ने आदिवासियों से उनके प्राकृतिक संसाधनों को तो छीना ही है, उन्हें उनके बुनियादी अधिकारों से भी वंचित कर दिया है। काॅरपोरेट विकास यानी लूट के नाम पर पूरे झारखंड को बेचा जा रहा है। आदिवासियों से उनकी जमीन छीनी जा रही है और उन्हें विस्थापित होकर मरने के लिए मजबूर किया जा रहा है। मानव-सभ्यता के इतिहास में यह सबसे बड़ी लूट और जघन्यतम कार्यवाही है। उपन्यास का एक पात्र फिलिप जो कि आदिवासियों के बीच से उभरा एक सशक्त प्रतिरोधी चरित्र है, उसके बारे में सुदीप्त कहता है कि ‘‘उसका वश चले तो वह लोगों को अर्ध-कंकालों में तब्दील कर छोड़े। दुनिया का सबसे वीभत्स, मगर सबसे बड़ा यथार्थवादी चित्रकार होता फिलिप।’’ फिलिप इस काॅरपोरेट लूट का विरोध करता है। ‘‘मुझे मत रोकिये सर! फिलिप उत्तेजना में बुरी तरह हांफ रहा था, ‘ये जंगल हमारे होते तो हमारी सुनी जाती। ये जंगल हमारे होते तो इसे सुक्खू सिंह न कटवा पाते, न ही सरदार इसे बाहर भेज पाते। हमारे होते तो, रोकने पर पुलिस हमीं को न पीटती। यह पूरा झारखंड अभयारण्य है सर! अभयारण्य इन सालों का और हम इनकी खुराक!’ वह बोल रहा था और पसीने से नहाये उसके खूंखार चेहरे पर लपटें चिलक रही थीं, मानों वह अंदर से जल रहा हो।’’ इतनी संभावनाओं से भरा फिलिप अपने संसाधनों की लूट के खिलाफ जान दे देता है। वह खुद जंगल में आग लगा देता है और उस आग में स्वयं भी जल मरता है। फिलिप के अंदर और बाहर लगी आग का गवाह 19 अप्रैल 1985 को संथाल परगना में हुआ कुख्यात ‘बांझी कांड’ है। सूदखोर महाजनों, भ्रष्ट अफसरों और आदिवासियों के संसाधनों की लूट के खिलाफ विरोध कर रहे लोगों पर एक घिनौनी साजिश के तहत पुलिस ने गोली चलाई। कुल 15 आदिवासी मारे गये जिसमें पूर्व सांसद और आदिवासी नेता फादर एंथोनी मुर्मू भी शामिल थे। इस जघन्यतम गोलीकांड के बावजूद सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी। न तो इस गोलीकांड की जांच कराई गई और न ही स्थितियों में सुधार का कोई प्रयास किया गया। भारत सरकार के अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयुक्त ने अपनी सत्ताइसवीं रपट में सरकार की आदिवासी उन्नयन दृष्टि पर सवालिया निशान लगाया। ‘‘आदिवासी क्षेत्र और आदिवासी जनजातियों के विकास की योजनाओं को बनाने और लागू करने में राज्य सरकारें आदिवासी विकास परिषदों को भागीदार नहीं बना रही हैं। इसका परिणाम है कि संविधान द्वारा परिषदों को सौंपे गये कार्यों की उपलब्धि वांछित स्तर तक नहीं हुई है। आजादी के बाद भारत में आदिवासियों के पिछड़ेपन का प्रमुख कारण, सरकार की घोषित नीतियों और वर्चस्व रखने वाली जनसंख्या के हितों में निहित टकराव है।’’ आज भी झारखंड इस वर्ग-संघर्ष और टकराव का साक्षी है। Panv Tale Ki Doob by Sanjeev
‘पांव तले की दूब’ आदिवासी समाज की आंतरिक समस्याओं की भी जांच-परख करता है। आदिवासी समाज की कुप्रथायेें मसलन, अंधविश्वास (जैसे डायन घोषित करके महिलाओं को मार डालने की प्रथा या झाड़-फूंक) और शराबखोरी पर भी उपन्यासकार ने सख्त टिप्पणी की है। आदिवासी समुदायों की ये कुप्रथायें समाप्त करने के लिए लगन और उनके प्रति ईमानदारी से कार्य करने की जरूरत है न कि इनके नाम पर ब्राह्मणवाद की रूढ़ियों और अंधविश्वासों को लाद देने की। ‘पांव तले की दूब’ विशिष्ट इसलिए भी है कि यह समस्याओं और जीवन-संघर्ष का सटीक विश्लेषण और मार्मिक चित्रण करने के साथ ही परिवर्तन की चुनौतियों का भी जायजा लेता है। सुदीप्त का पलायन सहज पलायन नहीं है। एक अर्थ में वह भ्रष्ट और बिके हुए आंदोलनों का सहज व्यक्तिगत प्रतिकार भी है। नेतृत्व की जटिल समस्याओं को उठाता यह उपन्यास बेईमान नेतृत्व के दुष्परिणामों को तथा व्यवस्था के अ-मानवीय, क्रूर, हिंसक चेहरे और उसके वर्ग-चरित्र को ठोस तरीके से विश्लेषित करता है। इस आरोप के बावजूद कि सुदीप्त का पलायन किसी योद्धा की पहचान नहीं है, उपन्यास हमें ‘माझी हड़ाम’ के कंधों पर बैठे सूरज से आने वाले नेतृत्त्व की आहट भी दे देता है जो थक तो गया है लेकिन अभी भी साबुत है, सुरक्षित है। अतिरेकों, रूमानियत और पूर्वाग्रहों से विलग एक आंदोलनकारी की संवेदनाओं की कथा है ‘पांव तले की दूब’ जो दबाई जाती है, उठ खड़ी होती है। Review by Abhishek Kumar Yadav
‘पांव तले की दूब’ झारखंड राज्य बनने के पहले लिखा गया था लेकिन आज झारखंड राज्य बनने के बाद समस्याएं ज्यों की त्यों पड़ी हुई हैं। बल्कि उनमें बढ़ोत्तरी ही हुई है। आज हमारे सामने भी वे समस्याएं हैं जो उपन्यास के नायक सुदीप्त के सामने थीं। ‘‘यह अस्मिता जिसे तुम प्यार करते थे, प्रतिगामी शक्तियों की रखैल न बन जाए-यही तुम्हारे आघात का केंद्रीय बिंदु है न?’’ झारखंड राज्य बनने के दस साल बाद यह समस्या हमारे सामने और भी विकराल तरीके से मुंह बाये खड़ी है। झारखंडी अस्मिता की खुलेआम दलाली चल रही है और साथ-ही-साथ काॅरपोरेट लूट का नंगा नाच चल रहा है। आदिवासियों की आदिम संपत्ति जल-जंगल-जमीन को सत्ता के ठेकेदार लगातार काॅरपोरेट हाथों में सौंप रहे हैं और आदिवासियों को अ-मानवीय परिस्थितियों में उन्हीं दो विकल्पों के साथ छोड़ दिया गया है कि या तो वे खत्म हो जाएं या दिकुओं की वर्चस्ववादी शोषक सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा बन जाएं। आशा का स्रोत बस वह संघर्ष है जो आदिवासी अपने बलिदान की बिना पर लड़ रहे हैं, और अन्याय व शोषण के इस पहाड़ का हटाना असंभव भी नहीं है- ‘‘आप हटा सकते हैं- लगातार कोशिश से। खोदते खोदते एक पीढ़ी बरबाद हो सकती है, दूसरी भी, हो सकता है तीसरी भी — लेकिन पहाड़ हट कर रहेगा अगर खोदना जारी रहा तो —।’’
आदिवासी जीवन-संघर्ष और परिवर्तन की चुनौतियां
(संदर्भ – संजीव का उपन्यास पांव तले की दूब )अभिषेक कुमार यादव
Adivasi Jeevan Sangharsh Aur Parivartan Ki Chunautiyan




  1. gondraja sanghgondraja sangh12-29-2013

    jago adivashiyo jago

  2. Niket bhaiva naikNiket bhaiva naik05-05-2016

    Bahut hi accha lek likha hai aapne
    Padte wakt aankhon SE pahi aaya
    Qnki main bhi ek adivashi hu……..
    Hame to bachpan SE apane purvaj eklavya, naghya katkari
    Mahadu katkari ……ki kahaniya batate the
    Lekin apane to pure bhart ke adivasiyonke bare me
    Bataya main aapka abhari Hun…
    Main apane samaj ko aage lene ki jarur koshish krunga
    Shikaha hi ek matra shatra hai Jo hamko apne hakk
    Hamko dila sakta aur eske liye main padhunga aur padaunga
    Man to krta hai aapse baut sari bate Kru lekin KR nahi sakta
    Main apaka abhari hoon …

    • AnonymousAnonymous10-04-2016

      I’m speechless

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