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मैला आंचल – नित्यानंद तिवारी

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मैला आंचल को प्रकाशित हुए लगभग पचास वर्ष हो रहे हैं। हिन्दी उपन्यास में उसका महत्व एक अनिवार्य और सार्थक कृति के रूप में स्थापित हो चुका है। लेकिन इसका कारण सिर्फ आंचलिकता नहीं है। जैसे पे्रमचंद के उपन्यासों का महत्व सिर्फ उनके जमाने का इतिहास, समाज और घटना का प्रामाणिक दस्तावेज होने में ही नहीं है। मानवीय अनुभूति के गहरे स्रोतों और प्रश्नों से जूझे बिना कोई रचना जीवंत प्रसंग के रूप में इतने दिनों तक बनी नहीं रह सकती।
प्रेमचंद ने सबसे पहले ‘घटना’ की भीतरी दुनिया में प्रवेश कर उसमें निहित संदर्भों, तनावों और टकराहटों को देखा था। उन्होंने ‘घटना’ को कहानी कहने का एक उपकरण नहीं माना, बल्कि घटना के भीतर ही कहानी मौजूद है, इसे देख लिया। और इसीलिये कथा की अंतर्वस्तु और विन्यास की नई प्रस्तावना की। ‘चरित्रों’ को भी घटना ढोनेवाले माध्यम के बजाय घटना की आंतरिक दुनिया में उनकी भूमिका की खोज की। ‘विचारों’ को परिस्थितियों और तनावों-संघर्षों से उभरते हुए पाया, न कि दिमागी-किताबी और परंपरागत दार्शनिक मान्यताओं से। प्रेमचंद की रचनाशीलता पर प्रभाव की अनेक शक्तियां हो सकती हैं, लेकिन उसकी यानी रचनाशीलता का जन्म अपने युग के देश-काल की कोख से ही होता है।
संभवतः आधुनिक युग के हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद सबसे पहले लेखक हैं जिन्होंने ‘घटना’ को कलावस्तु – सौंदर्यात्मक प्रत्यय – के रूप में स्वीकार किया। अधिक स्पष्ट रूप में कहूं तो उन्होंने ‘घटना को विशेष संगठन (व्तहंदपेंजपवद) के रूप में ग्रहण किया। यही कारण है कि प्रेमचंद ने ‘घटना’ को ‘धारणा’ अथवा ‘सौंदर्यात्मक श्रेणी’ (।ेजीमजपब ब्ंजमहवतल) के रूप में स्वीकार किया। संभवतः अभी तक इस पहलू पर अधिक गहराई से विचार नहीं हो सका है।
मैला आंचल के संदर्भ में प्रेमचंद का उल्लेख मैं विशेष आशय से कर रहा हूं। जैसे प्रेमचंद ने अपने से पहले की कथा में व्यवहृत ‘घटना’ का आशय बदलकर कहानी की पूरी दुनिया बदल दी, उसी तरह फणीश्वरनाथ रेणु ने ‘आंचलिकता’ को धारणा में बदलकर कहानी की दूसरी दुनिया का साक्षात्कार कराया। ‘घटना’ देश-काल का सघन विन्यास है तो ‘आंचलिकता’ ‘देश’ का बहुत-बहुत घनीभूत रूप। जैसे प्रेमचंद ने ‘घटना’ की आंतरिक दुनिया में कहानी पाई, उसी तरह रेणु ने ‘देश’ के घनीभूत रूप में विन्यस्त कहानी को पा लिया था। ‘घटना’ (प्रेमचंद में) और ‘अंचल’ (रेणु में) रचनात्मक धारणाएं हैं, उपकरण, माध्यम, तकनीक, शिल्प या पृष्ठभूमि नहीं।
मेरे युवा मित्र आदित्य निगम का एक लेख ‘बहुवचन’ में छपा था – ‘पश्चिमी आधुनिकता एक मनहूस तोहफा’। उसमें उन्होंने ‘देस’ और ‘देश’ का फर्क बताया है। उन्होंने देहरादून में अपने पूरबिया नौकर माताबदल का कथन उद्धृत किया है – (प) ‘बाबूजी, अबके साल हम देस जाइब। पारसाल नाहिं गए रहे ना…’ और (पप) ‘अच्छा नाहिं लागत है हियां परदेस मां।’ फिर उनकी टिप्पणी हैः ‘‘इन दो शब्दों के पीछे छिपी हैं दो अलग दुनियाएं। एक दुनिया उस रोजाना जिए जानेवाले आम इंसान की है और दूसरी है उस राष्ट्रवादी इलीट की, जो हिन्दुस्तान को पश्चिमी राष्ट्रराज्यों की तर्ज पर एक मजबूत और केन्द्रीकृत राष्ट्रराज्य बनाना चाहता है। इन दोनों का तसव्वुर एक दूसरे से बिलकुल जुदा है। ‘देस’ एक जगह है – अपनी जगह। एक जगह जहां माताबदल पलता है, बड़ा होता है और जिसका हवा-पानी उसके रोम-रोम में बस गया होता है। ‘देस’ एक जबान भी है – एक संस्कृति जिसे माताबदल जीता है।… ‘देस’ को इतिहास की जरूरत नहीं होती। वह मिथकों में जी लेता है अलग-अलग फिरकों के अपने अलग-अलग मिथक। उसे इन तमाम फिरकों को एक समरस ईकाई में ढालने की जरूरत भी कभी पेश नहीं आती। लिहाजा मिथकों में जीकर भी वह ‘देश’ की उस जरूरत से आजाद होता है जो इन मिथकों को ऐतिहासिकता प्रदान कर एक राष्ट्रीय इतिहास गढ़ने की ओर ठेलती है।’’
आदित्य निगम से क्षमा मांगते हुए मैंने उन्हीं अंशों को यहां उद्धृत किया है जो फिलहाल मैला आंचल की ‘आंचलिकता’ को परिभाषित करने में मदद करते हैं। (यों इतिहास और राष्ट्रराज्य के संदर्भ में उनके विचार विवादास्पद हो सकते हैं और उन पर बहुत अधिक वैचारिक रगड़ की जरूरत है। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि वे एक बहुत गहरे विचार-विमर्श की प्रस्तावना करते हैं।)
‘देस’ यानी ‘आंचलिकता’ (?) मेरे खयाल से उसी तरह एक रचनात्मक स्रोत की पहचान है, धारणा है, जैसे प्रेमचंद के यहां ‘घटना’। दोनों में जीवन की आंतरिक गतिशीलता और उनका अपना ड्रामाई (प्रेमचंद वाले अर्थ में) पहलू और कार्य-व्यापार है। यह एक प्रकार से नई पहचान है। पता नहीं एक तुलना जो मैं करने जा रहा हूं वह उचित है या नहीं, लेकिन यशपाल ने झूठा सच में ‘वतन’ के ढूंढ़ने की पीड़ा और ‘देश’ (भौगोलिक-राजनीतिक संदर्भों से परिभाषित) के उभरने की प्रकिया का जो बयान किया है उसमें रेणु की ‘आंचलिकता’ मिलती-जुलती है। दोनों (‘वतन’ और ‘अंचल’) में विभिन्नताओं को बनाए रखते हुए जीने का एक साझा सांस्कृतिक ढब मौजूद है। दोनों में धर्म और जाति का अतिक्रमण करते हुए समाज के परिभाषित होने संभावना है। मैला आंचल में तो जातिवादी समाज के वर्गवादी समाज में रूपांतरण की प्रक्रिया अनेक उपद्रवकारी शक्तियों से उलझती-लड़ती अपने पूरे वेग के साथ उपस्थित है। राजनीति, धर्म और जाति सबमें जो एक कपट-तर्क वर्चस्ववादी शक्तियों द्वारा उठाया जाता है, उसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। जब सैनिकजी और कालीचरन अपने भाषण में कहते हैं कि ‘जमीन उसकी जो जोते’ तो यह बात सबकी समझ में आ जाती है। लेकिन बाबू और जमींदार लोग कहते हैं – वाह खूब तर्क है। जमीन तो बैल जोतता है तो जमीन बैल की होगी? मैला आंचल धर्म, राजनीति, जाति और आर्थिक स्थितियों के भीतर वास्तविक और कपट-तर्कों की बड़ी गहरी पहचान कराता है। यह गहराई आती है अंचल की घनीभूत अस्तित्वगत उपस्थिति से। इसी कारण मैला आंचल की भूमिका में रेणु ने यह अद्भुत वाक्य लिखा है – ‘कथानक है पूर्णिया’।
कथानुभव और कथा-विन्यास के इतिहास में यह क्रांतिकारी वाक्य (धारणा) है। प्रेमचंद में कथानक है ‘घटना’, तो मैला आंचल में है पूर्णिया (अंचल)। यानी ‘घटना’ और ‘अंचल’ में निहित सजीव और स्पंदित आंतरिक दुनिया।
रेणु ने ‘कथानक’ शब्द का प्रयोग किया है। सब जानते हैं, कथानक कहानी नहीं है, वह कहानी में निहित विभिन्न घटकों का आनुपातिक संगठन है। यानी पूर्णिया (अंचल) स्रोत-सामग्री-भर नहीं है (जैसे प्रेमचंद में ‘घटना’ स्रोत-सामग्री-भर नहीं है) वह एक संगठन है (अर्थात रचनात्मक प्रत्यय)।
संभवतः इसे थोड़ा और स्पष्ट करना अपेक्षित है। कथानकवाला संगठन उसी लेखक के लिये आवश्यक होता है जो मनुष्य या व्यक्ति को समाज के साथ अनिवार्यतः जुड़ा हुआ मानता है। नागार्जुन ने रेणु के बारे में लिखा है, ‘सामाजिक घनिष्ठता रेणु को कभी गुफानिबद्ध नहीं होने देती थी।’ और प्रेमचंद की सामाजिक घनिष्ठता पर तो कोई टिप्पणी करने की जरूरत ही नहीं। क्या ठीक इसी अर्थ में हम जैनेन्द्र, अज्ञेय या इलाचंद्र जोशी की समाज-घनिष्ठता को रेखांकित कर सकते हैं? इस संदर्भ में भवंती में अज्ञेयजी का एक बहुत महत्वपूर्ण वाक्य है – ‘व्यक्ति समाज से नहीं, समाज में स्वतंत्र है।’ इसका आशय यही तो हो सकता है कि व्यकि अपने अस्तित्व के संदर्भ में समाज से स्वतंत्र नहीं हो सकता, लेकिन अपनी सार्थकता के लिये वह समाज पर अनिवार्यतः निर्भर नहीं है। लेकिन प्रेमचंद और रेणु दोनों के लिये मनुष्य/व्यक्ति अपनी सार्थकता के लिये, स्वतंत्रता के लिये ‘समाज से’ और ‘समाज में’ दोनों मोर्चों पर लड़ता है, जबकि उद्धृत रचनाकार अंतर्जीवन के ऐसे हलके में जाते हैं जहां मनुष्य/व्यक्ति की सार्थकता और स्वतंत्रता के लिये वे ऐसे संघर्ष बिन्दुओं का चुनाव करते हैं, जो केवल आनुषंगिक स्तर पर ‘समाज से’ और ‘समाज में’ टकराते हैं। यह एक कारण हो सकता है जिससे समाज का ढांचा नहीं, समाज (जो प्रकृति या पर्यावरण की तरह है) ही मनुष्य के सार्थक जीवन में पृष्ठभूमि से अधिक सक्रिय भूमिका में नहीं हो सकता। यह समाज और समाज के ढांचे का अवमूल्यन है। क्या कह सकते हैं कि कथानक या कथानक के ढांचे का अवमूल्यन इसी विचार-सूत्र से जुड़ा हुआ है? मै निर्मल वर्मा के इस विचार से पूर्णतः सहमत हूं कि ‘प्रेमचंदीय कथानक और वर्णनप्रणाली को रेणु ने तोड़ा।’ बाकियों को तोड़ने की जरूरत ही नहीं, क्योंकि समाज का ढांचा कोई भी हो, वह व्यक्ति/मनुष्य की सार्थकता में कोई भूमिका निभाता ही नहीं। कथानक व्यक्ति/मनुष्य या चरित्र को भूमिका देता है।
प्रेमचंद को ‘घटना’ में मनुष्य की भूमिका दिखी और रेणु को ‘अंचल’ में। प्रेमचंद भी ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं और रेणु भी। लेकिन व्यक्ति रेणु और उनकी रचना को जो विवरण नागार्जुन ने दिया है, क्या वह प्रेमचंद में है? देखिएः रेणु को ‘‘मैथिली और भोजपुरी के पचासों लोकगीत याद थे। सारंगा सदाबृज, लोरिक आदि लंबी-लंबी लोकगाथाएं गाते हुए रेणु को जिन्होंने एक-आध बार भी सुना है, वे उन्हें कभी नहीं भूल सकेंगे। लोकगीत, लोकलय, लोककला आदि जितने भी तत्व लोक-जीवन को समग्रता प्रदान करते हैं, उन सभी का समन्वित प्रतीक थे फणीश्वरनाथ रेणु।’’
क्या आदित्य निगम के माताबदलवाले ‘देस’ की प्रतीति इसमें नहीं मिलती? और क्या वही प्रेमचंद के ‘ग्रामीण जीवन’ को रेणु के ‘अंचल’ से अलग नहीं करती? और क्या इसे समाज के बारे में प्रेमचंद से भिन्न नई धारणा नहीं कह सकते? अगर ऐसा हो तो रेणु प्रेमचंद की ‘कथानक’-संरचना को तोड़ेंगे ही। निर्मल वर्मा को फिर याद किया जा सकता है जिन्होंने सबसे पहले लिखा कि प्रेमचंद के कथावर्णन, विकास, के ढांचे को रेणु ने एपीसोड्स में परिवर्तित कर दिया। नागार्जुन लिखते हैं, ‘‘ढेर के ढेर प्राणवतं शब्द-चित्र हमें गुदगुदाते भी हैं और ग्रामीण जीवन की विसंगतियों की तरफ भी हमारा ध्यान खींचते चलते हैं। छोटी-छोटी खुशियां, तुनुकमिजाजी के छोटे-छोटे क्षण, राग-द्वेष के उलझे हुए धागों की छोटी-बड़ी गुत्थियां, रूप-रस-गंध-स्पर्श और नाद के छिटपुट चमत्कार… और जाने क्या-क्या व्यंजनाएं छलकी पड़ती हैं रेणु की कथाकृतियों में!’’
प्रेमचंद ‘घटना’ में निहित भीतरी ड्रामाई तत्वों की व्यंजना नहीं करते, उसके रेशे-रेशे को देखते हैं और वर्णन करते हैं – रेणु ‘अंचल’ के भीतर के ‘ड्रामा’ को व्यंजित करते हैं।
यह सब कहने का मेरा मतलब इस समय सिर्फ इतना है कि प्रेमचंद ‘घटना’ के भीतर समाज में निहित ड्रामा की पहचान पहली बार करते हैं, तो रेणु ‘अंचल’ के भीतर चल रहे ड्रामा के साथ समाज को नए सिरे से पहचानने की पहली बार रचनात्मक कोशिश करते हैं। न प्रेमचंद को दस्तावेजी लेखक कहकर निपटाया जा सकता है और न रेणु को आंचलिक विवरणकार कहकर।
दोनों ठेठ भारतीय संदर्भ में मनुष्य की आधुनिक छवि और उसकी सक्रिय-सार्थक भूमिका खोजने-देने का गहरा सर्जनात्मक प्रयत्न करते हैं। देानों पदमावत की अंतिम पंक्ति को सजीव करते लगते हैं – ‘जो यह पढ़ै कहानी, हम संवरै दुई बोल।’
2
मैला आंचल पढ़ते समय प्रेमचंद की याद न आए, यह असंभव है। मुझे होरी और बामनदास की मृत्यु याद आ रही है। गोबर और कालीचरन का जीने के लिये बच रहना याद आता है। क्यों?
इन दोनों उपन्यासों में इन पात्रों का मरना और जीना भारतीय जीवन और समाज की मार्मिक और संभावना-गर्भित घटना है। होरी और बामनदास-जैसे ईमानदार निष्कपट चरित्र शायद ही दूसरे मिलें। लेकिन परिस्थितियों के जितने क्रूर आघात से इनकी मृत्यु होती है, वैसी मृत्यु शायद ही किसी औपन्यासिक चरित्र को नसीब हुई हो। स्वाभाविक या अस्वाभाविक मृत्यु तो सबकी निश्चित है, लेकिन होरी और बावनदास – जैसे साधारण व्यक्तियों की इतनी असाधारण और सार्थक मृत्यु इतिहास और समाज द्वारा प्रस्तावित प्रसंग के कारण ही संभव है।
होरी और बावनदास के चरित्र में जो गहरा मानवीय सरोकार है, अमानवीय संदर्भों के विरुद्ध जूझते रहने या उनसे पीड़ित और दुखी हो सकने की जो संवेदनशीलता है, वह उनकी अंतर्वर्ती विशेषता है। दोनों का जीना इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करता है कि उस अंतर्वर्ती सरोकार और संवेदनशीलता को बचाए रख सकना निरंतर कठिन होता जा रहा है। होरी और बावनदास दोनों की मृत्यु आधुनिक भारतीय समाज और राजनीति में असाधारण रूप से मानवीय अंतर्वस्तु के टूटने की पीड़ा साक्षात्कार कराती है। यह पीड़ा और दुःख विशेष रूप से विचार करने योग्य है। दोनों का जीवन इस बात का प्रमाण है कि अनुभूति का विधान बिखरता जा रहा है और अंततः टूट जाता है। क्यों टूटता है? वे भीतर से तो मानवीय सार और संवेदन से भरे हुए चरित्र हैं, लेकिन उस सार और संवेदन को संगठित करनेवाला विधान जरूर जर्जर या निर्बल हो चुका है। उसका मरना मानवीय सार-संवेदन का उद्घाटन है, किन्तु उसे सम्हालनेवाले संगठन के विधान और विचारधारा की अयोग्यता का पक्का प्रमाण भी। होरी जिस समाज से और बावनादास जिस राजनीति से अपने अंतर्जगत के लिये प्रेरणा, रस और मूल्य पाते हैं, वे दानों ही परंपरागत हैं। उनके विश्वास की गहराई, निष्कपटता और ईमानदारी बड़ी प्रभावी है। लेकिन उस प्रभाव की शक्ति कहां है? प्रतिफलित न हो पाने में ही तो? बाधक शक्तियां कौन-सी हैं? सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक (भी) शक्तियां ही तो हैं। वे लोग ही जो बाधक हैं जो मनुष्य के स्तर पर अपना व्यक्तित्व खो चुके हैं और संगठन की मानवीय प्रेरणा को सोखकर उसे गिरोह में बदल चुके हैं। इस गिरोह से पार पाने की योग्यता न होरी में है और न बावनादास में। होरी की तो न ऐसी स्थिति है और न बौद्धिक योग्यता, लेकिन बावनदास की स्थिति ऐसी जरूर है (वह अकेले है, उसकी गृहस्थी नहीं है) कि वह अपने अकेलेपन की सुविधा से आत्मा की गहराई में उतरकर मनुष्य की सार्थकता के सनातन प्रश्न से जूझ सकता। लेकिन उसके पास ऐसी तथाकथित बौद्धिक योग्यता नहीं है। ये दोनों नितांत साधारण मनुष्य हैं। इनके पास भौतिक, आध्यात्मिक या बौद्धिक कोई ऐसी योग्यता नहीं है जिसका सहारा लेकर जीवन, समाज और राजनीति में उभरी हुई परिस्थितियों से तालमेल बिठाकर जी सकें। होरी तालमेल बिठाने की कोशिश बहुत करता है, लेकिन जितना तालमेल बिठाता है उतना ही वह उलझता और मौत के करीब पहुंचता जाता है। इस प्रकार होरी और बावनदास ऐसे साधारण मनुष्य हैं जिनके पास अपनी आदमियत के अलावा कोई और ताकत नहीं है। उनकी इस आदमियत की सर्वाधिक गहरी छाप उनके जीवन में कम, उनके मरने में अधिक है, क्योंकि जीने के लिये उनके पास कोई रास्ता नहीं है। उनका मरना अच्छा नहीं है, लेकिन अनिवार्य है। उनकी आदमियत में एक सार्वभौम योग्यता है, साथ ऐतिहासिक अयोग्यता भी। होरी मूल रूप से भावना पर विश्वास करता है और बावनादास वैयक्तिक चरित्र पर। दोनों चीजें अच्छी हैं, लेकिन जिस समाज और राजनीति से वे घिरे हुए हैं उनसे इन दोनों योग्यताओं के सहारे बहुत दूर तक या निर्णायक स्तर तक लड़ा नहीं जा सकता।
उनका जीना इसलिये बहुत सारवान नहीं है कि उसमें भावुकता है और मरना इसलिये अधिक सारवान है कि मानव-जीवन में उभरी अमानवीय शक्तियों की क्रूरता अपने भरपूर प्रहार के साथ खुल जाती है। अंतिम रूप से स्पष्ट हो जाता है कि भावना की अपेक्षा विवेक अधिक संभावनागर्भित योग्यता है। उनका जीना चाहे जितना यातनाप्रद हो, लेकिन दृष्टि मृत्यु में ही है। उनकी मृत्यु आलोक का विस्फोट है। उनके सारे जीवन को उनकी मृत्यु ही अर्थ से आलोकित करती है। इस प्रकार उनकी मृत्यु बौद्धिक स्तर पर मनुष्य के लिये सृजनशील संभावनाओं से भरी हुई है। जीते हुए उनके क्रिया-व्यापार सीमित दूरी तक समाज और राजनीति के दबावों का मुकाबला कर पाते हैं, लेकिन उनकी मृत्यु उस मानवीय शक्ति का पुंज हो उठती है जो मानवता और मनुष्य के सवालों को हमेशा सृजनशील केन्द्रों पर सक्रिय करती रहती है।
इस प्रकार होरी और बावनदास दोनों की मृत्यु में सिर्फ तत्कालीन समाज या राजनीति या अंचल-मात्र नहीं है। उनकी मृत्यु समय के आयाम में प्रवेश करती है। दुःख को करुणा की शक्तियों से आगे समझ और दृष्टि में विकसित करती है। मैं पहले कह चुका हूं कि आधुनिक हिन्दी साहित्य में इन दो पात्रों की मृत्यु से अधिक प्रभावी और सार्थक मृत्यु दूसरी नहीं है। (कुछ दूरी तक ताई (बूंद और समुद्र) की मृत्यु की तुलना जरूर की जा सकती है।)
इस मृत्यु को उस विवेक के रूप में ग्रहण करना चाहिए जो कभी भी मानव-विरोधी शक्तियों के दबाव में भ्रष्ट नहीं किया जा सकता और जो हमेशा यथास्थितिपरक परिस्थितियों, शक्तियों, विचारधाराओं और मानसिकताओं में दखल देते हुए परिवर्तन की संभावनाओं के साथ होता है।
तो क्या गोदान और मैला आंचल में किसी ऐसे मानव-विवेक की प्रस्तावना है जो तत्वदार्शनिक सार्वभौम के मुकाबले ऐतिहासिक-सामाजिक सार्वर्भाम को खड़ा करे? वह है। इसीलिये तत्कालीन समाज या विशिष्ट अंचल की प्रतिच्छवि खोजने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनमें आधुनिक मनुष्य की वास्तविक छवि की खोज की जाय।
विजयदेव नारायण साही ने गोदान पर लिखते हुए कहा है – ‘‘प्रो. मेहता और मालती प्रेमचंद के लिये नए प्रकार के चरित्र हैं। उन्हें प्रेमचंद ने अथाह स्नेह देने की कोशिश की है, लेकिन वे जीवित नहीं हो सके हैं – जिस तरह होरी, धनिया, सिलिया, गोबर जीवित चरित्र हैं। लेकिन प्रेमचंद यह जानते हैं कि वे ही भावी मनुष्य हैं, उन्हंे जीवित होना पड़ेगा।’’ यानी बौद्धिकता जिससे व्यक्तित्व की प्रधान विशेषता हो वही आधुनिक युग का वास्तविक मनुष्य हो सकता है। क्या यहां प्रश्न खड़ा किया जा सकता है कि मेहता को जीवित होने की ज्यादा जरूरत है या गोबर को? कालीचरन को जीवित रहने की ज्यादा जरूरत है या डाॅ. प्रशांत को? जाहिर है, मरना तो किसी को नहीं है, लेकिन मानव-जीवन के केन्द्र में कार्य के स्तर पर किसकी भूमिका अधिक निर्णायक है इतना तो निश्चित है कि मेहता या डाॅ. प्रशांत की बौद्धिकता को परिभाषित होना पड़ेगा गोबर और कालीचरन से ही। प्रयोगशाला, चाहे वह वैज्ञानिक की हो या चिंतकों-बौद्धिकों के मष्तिष्क की, वह तो निर्जीव और तथाकथित सूक्ष्म, गहरी, दार्शनिक बुद्धि ही पैदा करेगी। हिन्दी उपन्यासों के बौद्धिक पात्रों पर एक निगाह दौड़ाने-भर से पता चल जाता है कि चाहे वे प्रोफेसर मेहता हों या बाद के अन्य चिंतनशील पात्र, उनमें से अधिकांश या तो प्रेम और सेवा में मनुष्य की सार्थकता देख लेते हैं या ‘मनुष्यों’ के सवाल को सतही मानकर अपने भीतर के ‘मनुष्य’ के सवाल को गहरा और वास्तविक प्रश्न स्वीकार कर लेते हैं। दोनों ही रूपों में होरी और बावनदास की मृत्यु उनके लिये बहुत कुछ बेमानी हो जाती है। दोनों की मृत्यु उस क्रांतिकारी मनुष्य के पैदा होने की अनिर्वायता व्यक्त करती है जो प्रेम, सेवा और अस्मिता के प्रश्नों से अधिक बड़ा प्रश्न सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, दार्शनिक (भी) शक्तियों से जकड़े हुए मनुष्यों को मुक्त करने से संबद्ध है। क्या इस मुक्ति से किनारा काटकर आधुनिक मनुष्य की छवि ज्यादा गहरी और ज्यादा वास्तविक होगी? मेहता-जैसे बौद्धिक पात्रों की विशेषता यह है कि उन्हें अपेक्षाकृत सुविधाजनक विकल्प मिल जाता है। लेकिन होरी, बावनदास, गोबर, कालीचरन ऐसे विकल्पों को पा ही नहीं सकते। उनके पास अमानवीय शक्तियों, संसथाओं और विचारों से टकराते हुए मरने और ने के अलावा कोई दूसरा रासता ही नहीं हैं गोबर को अगर होरी की मौत नहीं मरनी है तो समाज को बदले या कालीचरन को अगर बावनदास की मौत नहीं मरनी है तो समाज को बदले। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक संस्थाओं को तोड़े और बदले बिना वे जी नहीं सकते। उनके लिये कोई शरणस्थल नहीं है। उनका ग्रामीण, अपढ़ और साधारण होना इसलिये अधिक मूल्यवान हो जाता है कि वे मनुष्य के गहरे और सूक्ष्म प्रश्नों के विषय में किसी छद्म बौद्धिकता का शिकार होने के सर्वथा अयोग्य हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने बाणभट्ट की आत्मकथा में बाण के मुंह से कहलाया है कि उस-जैसे अदने आदमी के हाथ में इतिहास-विधाता ने राज्यों की कुंजी सौंप दी है। क्या उसी तरह कहा जा सकता है कि इतिहास ने कालीचरन – जैसे अदने और साधारण आदमी के हाथ में आधुनिक युग के वास्तविक मनुष्य की कुंजी सौंप दी है?
क्या पढ़े-लिखे लोगों के दिमाग से निकली हुई बौद्धिकता आधुनिक युग के वास्तविक मनुष्य की परिभाषा करेगी या आधुनिक युग के मनुष्यों की वास्तविक बौद्धिकता की परिभाषा कालीचरन करेगा, जो वास्तविकता के बीचोबीच है?
3
लगभग सभी महत्वपूर्ण आलोचकों ने मैला आंचल को शहरी कथाओं के सामने रखकर उसकी ताजगी और जीवंतता की सराहना की है, लेकिन साथ ही उसमें प्रौढ़ता का अभाव भी देखा है। किंतु उसकी ताजगी और जीवंतता सिर्फ दृश्य की नहीं है, दृष्टि की भी है। उस दृष्टि का आभास मिलते ही मैला आंचल स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य की सर्वाधिक प्रौढ़ रचना भी लगेगी। मैला आंचल की ताजगी और जीवंतता यदि सिर्फ दृश्यों तक सीमित होती तो आज कोई उसका नामलेवा न होता। उसमें विषयवस्तु (ब्वदजमदज) की ताजगी और जीवंतता है। विषयवस्तु यानी व्याक्ति और संस्थाओं (सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि) के बीच उभरनेवाले नए संबंध की व्याकुलता, उत्साह, अंधकार और प्रकाश। मैला आंचल में विषयवस्तु अपनी संपूर्ण प्रक्रिया में है। यह व्यक्ति और समाज के परिवर्तन के बीच से कुछ परिणामी लक्षणों को लेकर भाषा के खेल से मनुष्य को आत्मसाक्षात्कार नहीं कराता। यह दृश्य की ताजगी और जीवंतता-मात्र से संभव नहीं है, दृश्य को भेदनेवाली गहरी अंतदृष्टि से संभव है।
क्या इस अंतर्दृष्टि को प्रौढ़ नहीं कहा जा सकता?
डाॅ.प्रशांत मेरीगंज गए थे मलेरिया पर रिसर्च करने, लेकिन वे वैज्ञानिक ही नहीं, आदमी भी थे। उन्हें वहां तरह-तरह की चीजें, दृश्य और स्थितियां दिखाई पड़ने लगती हैं।
‘‘डाॅक्टर पर यहां की मिट्टी का मोह सवार हो गया है। उसे लगता है, मानो वह युग-युग से इस धरती को पहचानता है।…
‘‘आम के पेड़ों को देखने से पहले उसकी आंखे इंसान के उन टिकोलों पर पड़ती हैं जिन्हें आमों की गुठलियों के सूखे गूदे की रोटी पर जिंदा रहना है…. और ऐसे इंसान? भूखे अतृप्त इंसानों की आत्मा कभी भ्रष्ट नहीं हो या कभी विद्रोह नहीं करे, ऐसी आशा करनी ही बेवकूफी है। डाॅक्टर यहां की गरीबी ओैर बेबसी को देखकर आश्चर्यित होता है।…
‘‘कफ से जकड़े हुए दोनों फेफड़े, ओढ़ने को वस्त्र नहीं, सोने को चटाई नहीं, पुआल भी नहीं! भीगी हुई धरती पर लेटा न्युमोनिया का रोगी मरता नहीं, जी जाता है। …कैसे?
‘‘यहां विटामिनों की किस्में उनके अलग-अलग गुण और आवश्यकता पर लंबी-चैड़ी फेहरिस्त बनाकर बंटवानेवालों की बुद्धि पर तरस खाने से क्या फायदा? मच्छरों की तस्वीरें, इससे बचने के उपायों को पोस्टरों पर चित्रित करके अथवा मैजिक लालटेन से तस्वीरें दिखाकर मलेरिया की विभीषिका को रोकनेवाले किस देश के लोग थे?….
‘बेजमीन आदमी, आदमी नहीं जानवर है!’’
… … …
डाॅक्टर का रिसर्च पूरा हो गया, एकदम कंपलीट। वह बड़ा डाॅक्टर बन गया। डाॅक्टर ने रोग की जड़ पकड़ ली है…?
‘‘गरीबी और जहालत इस रोग के दो कीटाणु हैं।
… … …
‘‘दरार पड़ी दीवार! यह गिरेगी! इसे गिरने दो। यह समाज कब तक टिका रह सकेगा?’’
डाॅ. प्रशांत मलेरिया पर रिसर्च नहीं कर सके, लेकिन उस बौद्धिकता और विवेक को उनके ठोस प्रसंगों सहित जरूर अर्जित कर पाए जिसके जरिये इस समाज को बदलना है। डाॅक्टर को मेरीगंज की जमीन से मोह हो गया है। यहां के लोगों की गरीबी और जहालत उसके खून में पैठ गई है। वह वैज्ञानिक की तटस्थता के साथ चैन से नहीं रह सकता। व्यवस्था के प्रचारतंत्र में लिप्त, सुविधा, सत्ता और अधिकार का बेशर्म उपभोग करनेवाले लोगों से यह सवाल पूछने की योग्यता उसने हासिल कर ली है कि ‘ये किस देश के लोग हैं?’’ इस सवाल के साथ ही वह एक नए मानवीय संबंध में प्रवेश करता है जो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक-दार्शनिक यानी जीवन के सभी पहलुओं में एकसाथ चमक उठता है। वह साफ देखता है कि सामाजिक वर्गों और समुदायों के बीच का अंतर वास्तविक है और कोइ्र भी विचार इस वास्तविकता को ढांक-तोपकर मनुष्य की समानता की धारणा को ठोस रूप में प्रस्तुत नहीं कर सका। इस वास्तविक अंतर को मिटानेवाला संघर्ष ही मनुष्य की समानता की धारणा को ठोस रूप दे सकता है। इसी बिन्दु पर मैला आंचल की आंचलिकता की सारवान भूमिका है। व्यक्ति और समाज के संबंधों में उभरनेवाले हर तरह के तनावों और संघर्षों में विश्वसनीयता, प्रामाणिकता और वास्तविकता उस अंचल की ठोस स्थिति से पैदा हुई है। यानी वह परिवेश या पृष्ठभूमि नहीं, रचनाशील केन्द्र है जहां से मैला आंचल के लेखक की बौद्धिकता भी परिभाषित हुई है। रेणु बौद्धिक स्तर पर सारवान लेखक इसलिये हैं कि अंचल से उभरनेवाली चुनौतियों को वे बराबर विद्यमान बौद्धिक विन्यासों से टकराते चलते हैं। यही कारण है कि अन्य वामपंथी लेखकों की तुलना में रेणु की बौद्धिकता सैद्धांतिक न होकर सृजनशील है। मैला आंचल का कोई भी प्रसंग समाज की प्रक्रिया के भीतर से इतना अलग नहीं किया गया है कि लेखक अपनी बौद्धिक योग्यता का इस्तेमाल करके उसे अनुभव का स्वतंत्र क्षेत्र बना दे। हर प्रसंग इतनी दूर तक अलगाया गया है कि वह सामाजिक प्रक्रिया में दखल देने की योग्यता हासिल कर ले। इसी अर्थ में मैला आंचल की विषयवस्तु को मैंने संपूर्ण प्रक्रिया में होना कहा है।
इसे थोड़ा और खोलना होगा। उदाहरण के लिये नदी के द्वीप को लें, जो मैला आंचल से सिर्फ तीन साल पहले प्रकाश में आया। काल की दृष्टि से ये दोनों रचनाएं लगभग साथ की ही मानी जाएगी। अज्ञेय समेत अनेक आलोचक भी उसे समग्र मानवीय अवस्थिति की चिंतावाली रचना मानते हैं। किंतु रेखा किसी एक क्षण की तृप्त यौनानुभूति को सनातन अनुभूति बना लेने में जो अकेलापन चुनती है उसकी पहंुच कितनी दूर तक है? एक सीमित अर्थ में नैतिक-दार्शनिक पहलुओं के अतिरिक्त उसकी कोई गति नहीं है। इसमें जीवन में आए बदलाव के एक-आध परिणामी लक्षणों के आधार पर भाषा के माध्यम से खूबसूरत किंतु छद्म विचारों की बुनावट कर ली गई है। आधुनिक युग में नारी का व्यक्तित्व स्वतंत्र हुआ है, उसमें इतना ही सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन कैसे और क्यों स्वतंत्र हुआ और स्वतंत्र होने के बाद उसकी कौन-सी जिम्मेदारियां और समस्याएं है इसका कहीं कोई चिन्ह भी उपन्यास में नहीं मिलेगा। सामाजिक प्रक्रिया में उभरे एक निष्कर्ष को अलग कर लिया गया है और एक स्वतंत्र दुनिया रच ली गई है। कह सकते हैं, नदी के द्वीप की विषयवस्तु स्वतंत्र और परिणामी है। मैला आंचल की विषयवस्तु सापेक्ष और प्रक्रियाधर्मी है। इस प्रकार मैला आंचल अपनी विषयवस्तु की जीवनधर्मी प्रक्रिया, पद्धति और दृष्टि के कारण प्रौढ़ और संभावनागर्भित रचना है।
इस प्रकार मैला आंचल अपनी विषयवस्तु की जीवनधर्मी प्रक्रिया, पद्धति और दृष्टि के कारण प्रौढ़ और संभावनागर्भित रचना है।
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मैला आंचल की कुछ और महत्वपूर्ण विशेषताएं जिन पर अब तक विचार नहीं हुआ है। उसकी ठेठ देशीयता (आंचलिकता) विश्वनागरिकतावादी विचारधारा के सामने चुनौती की तरह खड़ी है। वह चाहे जितनी पिछड़ी हुई हो, उसकी जड़ें हैं, परंपरा है, सांस्कृतिक समृद्धि है और इन्हीं कारणों से वह सजीव तथा भिन्न है। यह भिन्नता ठोस मानवीय वास्तविकता है। मैला आंचल की आंचलिकता स्वाधीन-आंदोलन की संतान है। स्वाधीनता-आंदोलन मुख्य रूप से राजनीतिक होते हुए भी सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों में अलग-अलग तरह के लोगों द्वारा अपनी-अपनी तरह लड़ा जा रहा था। मेरीगंज के लोग भी पूरी लड़ाई लड़ रहे हैं सभी क्षेत्रों में अपनी तरह से। उन्हें मानवतावादी होने के लिये अनिवार्यतः परिवर्तन और क्रांतिकारी प्रक्रिया के भीतर से गुजरना ही है। स्वाधीतना-आंदोलन यदि राष्ट्रवादी और मानवतावादी है तो मैला आंचल की आंचलिकता में भी स्वातंत्र्योत्तर राष्ट्रवाद और मानवतावाद के नए प्रसंग, आवेग और उद्वेग की प्रस्तावना है।
स्वाधीनता आंदोलन और मैला आंचल की आंचलिकता – दोनों में वंशानुगत – जैसी पहचान के आंतरिक लक्षण हैं। दोनों में बराबरी के लिये किए जानेवाले संघर्ष के बिना, मानवतावादी और क्रंातिकारी हुए बिना उदारवादी होना असंभव है। यहां रंगभूमि के प्रभुसेवक और सोफिया-विनय का स्मरण किया जा सकता है। इंग्लैंड में बैठे प्रभुसेवकजी स्वाधीनता-आंदोलन को विश्वमानवतावाद के विरुद्ध एक संकीर्ण और मानव-विरोधी कार्य मानते हैं। सोफिया और विनय उनके अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व में विश्वासघात की झलक पा लेते हैं और निर्ममतापूर्वक उसे अस्वीकार कर देते हैं। उसी तरह अनेक आधुनिकतावादी लेखक और आलोचक ऐसे हैं जो मैला आंचल की आंचलिकता को समग्र मानवीय अवस्थिति के सामने संकीर्ण और सतही भी मानते हैं। फिर से उल्लेख आवश्यक है कि सूक्ष्म, गहरी और समग्र मानवीय अनुभूति के संदर्भ में जाने जानेवाले उपन्यास मनुष्य की बराबरी के लिये किए जानेवाले संघर्श के प्रति उदासीन होकर मानवतावादी और विद्रोह के खतरे उठाए बिना न जाने कैसे उदारवादी मान लिये जाते हैं। मैला आंचल की आंचलिकता इस समग्र मानवीय अवस्थिति की गहराई पर (जो विश्वनागरिक के रूप में प्रभावशाली देशों की कुछ ऊपरी जीवन-शैली, रीतियों तथा सतही गुणों की नकल से ‘एक तरह’ से दिखने में गौरवान्वित होती है) बहुत बड़ा और भारी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।
मैला आंचल की अंतर्वस्तु और आंचलिकता में यह तर्क निहित है कि विशेष रूप से देशीय हुए बिना सार्वभौम होना और सामुहिक जीवन में सक्रिय सहभागिता के बिना मानव-अंतरात्मा की तलाश करना बंजर है, बौद्धिक पाखंड है।
जमीन की बंदोबस्ती के समय कालीचरन एक नेता के रूप में उभरता है। क्या उसका नेता के रूप में उभरना एक प्रामाणिक और वास्तविक ‘व्यक्ति मनुष्य’ का उभरना भी है? जमीन की लड़ाई के दौरान स्वाभाविक प्रक्रिया में जातिवादी समाज वर्गवादी समाज में रूपांतरित होने लगता है। इस प्रक्रिया में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चेतनाएं एक-दूसरे में घुली-मिली हैं। मैला आंचल में यह पूरी प्रक्रिया सैद्धांतिक न होकर अनिवार्य भावबोध और गहरी अनुभूति लगती है। क्या कारण है? संभवतः यह कि समस्या ठोस और वास्तविक है और हर व्यक्ति उससे गहराई से जुड़ा है। सभी अपने हित को पहचानने लगते हैं। उसी क्रम में वे कुछ लोगों से जुड़ते हैं, कुछ के विरुद्ध होते हैं। परंपरागत सामाजिक संबंधों के विन्यास स्वाभाविक प्रक्रिया में टूटने लगता है। नए सामूहिक जीवन के विन्यास उभरने लगते हैं। हर व्यक्ति उसमें सक्रिय हो उठता है। सामुहिक जीवन में इस सक्रिय सहभागिता के बीच कालीचरन और डाॅ. प्रशांत के आंतरिक वैयक्तिक तत्व का संगठन होता है। उनके आंतरिक और बाह्य जीवन में अनिवार्य संबंध है, विच्छेद नहीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि जिन उपन्यासों को व्यक्ति-प्रधान कहा जाता है उनमें व्यक्ति का आंतरिक तत्व एक समाज-विच्छिन्न प्राइवेट जोन है और समाज पब्लिक जोन। दोनों एक-दूसरे के क्षेत्र और मामलों में दखल नहीं देते। दोनों एक-दूसरे के संदर्भ में होते हैं, संबंध में नहीं। मैला आंचल में व्यक्ति और समाज एक-दूसरे में दखल देते हैं और एक-दूसरे के लिये नए-नए तनाव और दुख पैदा करते हैं। अपने आंतरिक और मानवीय सार को वे इसी प्रक्रिया में अर्जित करते हैं।
तो क्या व्यक्ति की धारणा के विषय में भी मैला आंचल का योगदान विचार करने योग्य है? क्या कालीचरन और डाॅ.प्रशांत ऐसे सुसंगठित व्यक्ति हैं जो स्वातंत्र्योत्तर भारतीय सामुहिक जीवन को कुछ सारवान अर्थ प्रदान कर सकते हैं?
दर्शन के विद्वान डाॅ.देवराज ने पथ की खोज में आधुनिक भारतीय मनुष्य के एक विशिष्ट उभयतोपाश का जिक्र किया है। चंद्रनाथ साधना से कहता है: ‘‘कम्यूनिस्टों के आर्थिक आदर्श मुझे आकर्षित करते हैं… लेकिन मैं अनात्मवादी नहीं हूं।’’ यह उभयतोपाश नकली नहीं है, लेकिन वैयक्ति प्रतिभा से इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता। इस तरह के उभयतोपाशों को सिर्फ इतिहास जज्ब कर पचा सकता है। क्या मैला आंचल में यह उभयतोपाश घुल नहीं गया है?
मैला आंचल में डाॅ.प्रशांत तहसीलदार से विद्यापति नाच देखने की इच्छा प्रकट करता है। उसके सामने नाच होता है। नाच-गान नौटंकी शैली में होता है। एक पात्र विद्यापति के श्रृंगारी गीत बड़ी तन्मयता से गाता है। उसके समानांतर दूसरा पात्र, जो जोकर जैसी भूमिका में है, विकटा (विपत्तिगाथा) गाता है –
थारी बेंचि पटवारी के देलिये
लोटा बेंचि चैकीदारी
बाकी थोड़ेक लिखाई जे लिहलें
कलम देलक धुराई रे धिरजा।
आखिर…
कहे कबीर सुनो भाई साधो
सब दिन करी बेगारी
खंजड़ी बजाके गीत गवैछी
फटकनाथ गिरधारी रे धिरजा
डाॅक्टर तहसीलदार से पूछता है: ‘‘गीत तो विद्यापति का गाता है, विकटै की रचना किसने की है?’’ तहसीलदार का उत्तर है – ‘‘इसकी रचना के लिये भी कोई तुलसीदास और बाल्मीकि की जरूरत है? खेतों में काम करते हुए तुक पर तुक मिलाकर गढ़ लेता है।’’
‘‘डाॅक्टर सोचता है – विद्यापति की चर्चा होते ही कविवर दिनकर का एक प्रश्न बरबस सामने आ खड़ा हो जाता है – ‘विद्यापति कवि के गान कहां?’ बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का उत्तर दिया जिंदगी भर बेगारी खटनेवाले, अपढ़ गंवार और अर्द्धनग्नों ने!’’
क्या उसी तरह चंद्रनाथ के उभयतोपाश का कोई हल कालीचरन में मिलता है?
मैला आंचल में वह अद्वितीय योग्यता है, जो परंपरा-आधुनिकता, व्यक्ति-समाज, इतिहास और सार्वभौम (कोई भी शक्ति और विचार) जिस तरह से और जिस बिंदु पर जीवन में होते हैं, ठीक उसी तरह से और उसी बिन्दु पर उन्हें धारण कर लेती है। इसीलिये इन सभी पक्षों के भीतर जो विवेक-अविवेक, वास्तव-अवास्तव, गंभीरता-छिछलापन और सरोकार-वितृष्णा तथा उपहास के स्तर होते हैं, रेणु उन सबका बड़ा सार्थक उपयोग करते हैं। रेणु आधुनिक मनुष्य के बिंब को सही-सही तो पहचानते ही हैं, उससे आगे बढ़कर उस बिंब के साथ रचने की भी उनमंे अपार योग्यता है।
गंभीर और वास्तविक के बीच मजाक और व्यंग्य तथा मजाक और व्यंग्य के बीच गंभीर और वास्तविक को जिस अनिवार्य और सही बिंदु पर रेणु खोंस देते हैं उससे अर्थ नहीं, अर्थों को अनुगुंजित प्रदेश उभर आता है। परिप्रेक्ष्य और संतुलन को खोए बिना इस कला का ऐसा दक्ष प्रयोग अप्रतिम है। इसी कारण अर्थ और अनुभव की जटिलता का जो रचनात्मक साक्ष्य मैला आंचल में है, शायद ही किसी अन्य उपन्यास में मिले कसौटी 15 (संपादक – नंदकिशोर नवल) में पृष्ठ 181-191 पर प्रकाशित




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