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जो नामवर सिंह ‘साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका’ लिखकर रामविलासजी की उक्त मान्यताओं का प्रतिवाद कर रहे थे, आज वही उन मान्यताओं को दोहरा रहे हैं। नामवरजी ही नहीं प्रगतिशील आंदोलन की चर्चा करने वाले अधिकांश विद्वान चाहे वह रेखा अवस्थी हों, कर्णसिंह चैहान हों या सहारा आयोजन में शामिल रवींद्र त्रिपाठी और विश्वनाथ त्रिपाठी हों, रामविलासजी के हवाले से ही प्रगतिशील आंदोलन को समझते-समझाते हैं।प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रीय सहारा ने उस पर द्विअंकीय (5 तथा 12 नवंबर) ‘महाबहस’ का आयोजन किया। इस आयोजन को ‘महाबहस’ कहना कहीं से उचित नहीं लगता, क्योंकि बहस जैसी कोई चीज ही वहां नहीं दिखती। वह दक्षिणपंथी, उत्तर आधुनिकतावादी, समाजवादी और मार्क्सवादी लेखकों द्वारा की गई वैविध्यपूर्ण टिप्पणियों का पिटारा बनकर रह गया है। जाहिर है कि स्वयं संपादक की कोई प्रतिबद्धता न तो प्रगतिशील आंदोलन के प्रति है और न ही गंभीर बौद्धिक विमर्श के प्रति।
यहां इस आयोजन में शामिल कृष्णदत्त पालीवाल सरीखे ऐसे परम ज्ञानियों के प्रलाप की चर्चा गैर जरूरी होगी, जो अपनी विचारधारा को खुलेआम स्वीकार नहीं कर सकते, इसलिए उत्तर आधुनिकता का लबादा ओढ़कर मार्क्सवाद को कोसते हैं; जो आधार और अधिरचना का ‘अ’ भी नहीं जानते, लेकिन ग्राम्शी से लेकर फ्रेडरिक जेमिसन तक को एक फंूक में उड़ा देने का दंभ पालते हैं। वे बड़े उत्साह से देरिदा के ‘मार्क्स के प्रेत’ का नाम लेते हैं, बिना यह जाने कि उससे देरिदा का आशय क्या था। अर्थहीन वाक्यों में यूरोपीय नामों को गूंथकर पाठकों को आतंकित करने के लिए की गई ‘नेम ड्रापिंग’ पर इससे अधिक क्या कहा जा सकता है कि ऐसे विद्वानों को एलेन सोकल की पुस्तक ‘इंटेलेक्चुअल इंपोश्चर’ पढ़नी चाहिए, हो सकता है कि उत्तर आधुनिकता का बुखार कुछ नीचे उतरे।
वैसे शिकायत दक्षिण पंथियों से नहीं है, वे तो वही कर रहे हैं, जो उन्हें करना चाहिए। शिकायत तो उनसे है, जो प्रगतिशील आंदोलन के रहनुमा माने जाते हैं। प्रलेस के 75वें स्थापना दिवस पर अपने लखनऊ भाषण में नामवर सिंह ने आरक्षण के विरोध में जो प्रवचन दिया उसका दलित बुद्धिजीवियों ने पर्याप्त प्रतिवाद किया है। लेकिन आगे चलकर नामवरजी ने प्रगतिषील लेखक संघ के बारे में जो कुछ कहा उससे खुद ‘प्रगातिषील’ आलोचकों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी यह बात बेचैन करने वाली है। सहारा के 5 नवंबर के अंक में प्रकाशित नामवरजी के वक्तव्य का शीर्षक है ‘संगठन की मोहताज नहीं प्रगतिशीलता’। शीर्षक ही नहीं, पूरा वक्तव्य चैंकाने वाला है। नामवरजी ने प्रगतिशील आंदोलन की भूमिका पर ही प्रश्नचिõ लगाते हुए कहा है कि हिन्दी की पूरी साहित्यिक परम्परा ‘स्वतः स्फूर्त प्रगतिशील’ रही है, प्रगतिशील लेखक संघ न भी होता तो हिंदी साहित्य पर कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ता। यूं तो नामवरजी के मौखिक प्रवचनों से आहत होना नादानी है, क्योंकि खुद नामवरजी अपनी मान्यताओं को इतनी गंभीरता से नहीं लेते हैं और न ही उन पर टिके रहने का उनका कोई आग्रह होता है। लेकिन उक्त वक्तव्य पर असहमति दर्ज कराना इसलिए जरूरी लगता है क्योंकि नामवरजी अभी भी एक सत्ता प्रतिष्ठान बने हुए हैं और इसी वजह से बहुत से लोग उन्हें हिंदी साहित्य के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। अतः उनके हवाले से ही हिंदी साहित्य के बारे में कोई राय कायम करते हैं।
यह दिलचस्प है कि आज नामवरजी भी वही सब कह रहे हैं, जो अपने अंतिम वर्षों में रामविलासजी कहने लगे थे। परंपरा की स्वघोषित प्रगतिशीलता का रामविलासजी से बड़ा मार्क्सवादी हिमायती और कौन हुआ है! वे भी कहते थे कि विलायत में पढ़े-लिखे कुछ अंग्रेजीदां मध्यवर्गीय नौजवानों ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना करके कोई तीर नहीं मार दिया, यथार्थवादी प्रवृत्तियां हिंदी में पहले से ही विकसित हो रहीं थीं। विडंबना यह है कि 1986 में प्रलेस की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर
विश्वनाथ त्रिपाठी ने प्रगतिशीलता को प्रलेस से जोड़ने का विरोध किया है। उनका कहना है कि ‘‘प्रगतिशील साहित्य धारा को प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना और उद्देश्यों या समाजवादी विचारधारा से बांधकर देखना इस साहित्य और उसकी आलोचना को सीमित कर देना है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य नहीं थे, ये समाजवादी भी नहीं थे, फिर भी वे हिंदी के सर्वश्रेष्ठ प्रगतिशील आलोचक हैं।’’ आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी श्रेष्ठ आलोचक हैं, इसमें संदेह नहीं, लेकिन वे प्रगतिशील आलोचक हैं या नहीं, इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि ‘प्रगतिशील’ से आपका आशय क्या है!
इस प्रसंग में याद रखना चाहिए कि शब्द हमेशा अपने व्युत्पत्तिपरक या शाब्दिक अर्थ का ही वहन नहीं करते, कई बार एक ऐतिहासिक प्रक्रिया में उनका अर्थ बदल जाता है और वे विशिष्ट पारिभाषिक अर्थ के वाचक बन जाते हैं- इसी प्रक्रिया में विशिष्ट ऐतिहासिक घटनाओं-परिघटनाओं और वस्तुओं का नामकरण संभव हो पाता है। उदाहरण के लिए कभी दलित शब्द किसी भी किस्म के दलन-उत्पीड़न के लिए प्रयुक्त होता था, लेकिन दलित आंदोलन ने उसे एक विशिष्ट अर्थ प्रदान किया है। आज कोई यह कहे कि दलित शब्द को जातिगत उत्पीड़न से जोड़कर देखना, उसके अर्थ को सीमित करना है, तो इससे उसके ज्ञान का नहीं बल्कि उसकी नीयत का ही पता चलेगा। इसी तरह प्रगतिशील आंदोलन ने भी प्रगतिशीलता को जन-पक्षधर क्रांतिकारी दृष्टिकोण के रूप में पुनर्परिभाषित किया था। प्रगतिशील आंदोलन के संदर्भ में प्रगतिशीलता का यही अर्थ प्रचलित है। फिर विश्वनाथ त्रिपाठी उसे इतना उदार क्यों बना रहे हैं? ताकि उसमें आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी को फिट किया जा सके! उदारता के इस छद्म का अनावरण उस समय हो जाता है, जब वे एक ही पंक्ति के बाद यह लिखते हैं कि ‘‘प्रगतिशील आलोचना ने मार्क्सवाद या समाजवादी विचारधारा से प्रेरणा प्राप्त की। शिवदान सिंह चैहान, प्रकाशचंद गुप्त ने हिंदी में प्रगतिशील आलोचना की नींव रखी।’’ अगर नींव ही इन्होंने रखी तो इनके पहले वाले प्रगतिशील कैसे हो गए? अगर प्रगतिशील आलोचना मार्क्सवाद से प्रेरित थी तो शुक्ल और द्विवेदी जी को प्रगतिशील आलोचक का तमगा पहनाने का क्या औचित्य है?
रामविलासजी से विश्वनाथ त्रिपाठी का फर्क यह है कि वे हजारी प्रसाद द्विवेदी को भी प्रगतिशील घोषित कर रहे हैं, लेकिन पद्धति उनकी भी डाॅ. शर्मा वाली ही है। संयोग नहीं है कि विश्वनाथ त्रिपाठी और रवींद्र त्रिपाठी दोनों ही आलोचकों ने मुक्त कंठ से रामविलासजी की प्रसंशा की है और उन्हीं की तरह आरंभिक प्रगतिशील आलोचना में संकीर्णतावाद के मौजूद होने की शिकायत की है। इशारा प्रलेस के आरंभिक घोषणापत्रों और शिवदान सिंह चैहान, रांगेय राघव सरीखे आलोचकों की ओर है। रामविलासजी और उनके अनुयायी यह बताने का कष्ट नहीं करते कि तुलसीदास की आलोचना करना परंपरा के अवमूल्यन का पर्यायवाची कैसे हो जाता है, न ही वे यह बताते हैं कि उक्त ‘संकीर्णतावाद’ जिस प्रवृत्ति से टकरा रहा था, उसका नाम ‘परंपरावाद’ था।
आज इसे याद करने की जहमत कोई नहीं उठाता कि भक्तिकालीन और रीतिकालीन साहित्य के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाना अगर ‘संकीर्णतावाद’ था तो यह ‘संकीर्णतावाद’ सबसे प्रखर रूप में उक्त घोषणापत्रों एवं आलोचकों के लेखन में नहीं, बल्कि प्रलेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष पद से दिए गए प्रेमचंद के ‘साहित्य का उद्देश्य’ शीर्षक भाषण में प्रकट हुआ था। अपने भाषण में प्रेमचंद ने प्राचीन साहित्य की प्रशंसा में एक वाक्य भी नहीं कहा, उल्टे श्रृंगार के साथ-साथ भक्ति को भी पतनशीलता का लक्षण बताते हुए लिखा कि ‘‘साहित्य अपने काल का प्रतिबिंब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदय को स्पंदित करते हैं, वहीं साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं। ऐसे पतन के काल में लोग या तो आशिकी करते हैं या अध्यात्म और वैराग्य में मन रमाते हैं। जब साहित्य पर संसार की नश्वरता का रंग चढ़ा हो और उसका एक-एक शब्द नैराश्य में डूबा हो, समय की प्रतिकूलता के रोने से भरा हो और श्रृंगारिक भावों का प्रतिबिंब बना हो, तो समझ लीजिए जाति जड़ता और ह्रास के पंजे में फंस चुकी है और उसमें उद्योग और संघर्ष का बल बाकी नहीं रहा। उसने ऊंचे लक्ष्यों की ओर से आंखें बंद कर ली हैं और उसमें दुनिया को देखने-समझने की शक्ति लुप्त हो गई है।’’ प्रेमचंद जिस प्रलेस की अध्यक्षता कर रहे थे, उसकी तथाकथित संकीर्णता का पता उन्हें भली-भांति था। वे उसकी अगुवाई कर रहे थे, कर्म से भी और वचन से भी। प्रेमचंद का उक्त भाषण इसका प्रमाण है। ‘संकीर्णतावाद’ की आलोचना का साहस हो तो प्रेमचंद की आलोचना करके दिखाइए। तुलसीदास के आलोचकों की निंदा करने के लिए ‘संकीर्णतावाद’ का सहारा लेना बौद्धिक बेइमानी है। रांगेय राघव तुलसीदास की आलोचना करें तो ‘संकीर्णतावाद’ है और रामविलासजी रीतिकाल की एकांगी भत्र्सना करें तो वह ‘परंपरा का मूल्यांकन’ है?
यह आलोचकों का हिंदू संस्कार है, जो तुलसीदास की आलोचना सुनकर आहत हो जाता है। स्वाभाविक है कि इस संस्कार की परिणति ऐसे हिंदीवाद में होती है, जो ‘हिंदी जाति’ के नाम पर एक तरफ तो जन भाषाओं को और दूसरी ओर उर्दू को हिंदी का मातहत बताता है। अपने बयान में त्रिपाठी जी ने लिखा है कि ‘‘हिंदी महाजाति है क्योंकि इसमें अवधी, भोजपुरी, पर्वतीय आदि जातीयताओं का समावेश है। उर्दू-हिंदी दो भाषाएं नहीं हैं। जैसे इस क्षेत्र में रहने वाले हिंदू, मुसलमान आदि भिन्न जातियां नहीं हैं।… उर्दू हिंदी से (भिन्न?) भाषा नहीं बल्कि विशिष्ट साहित्य की शैली है।’’ व्याकरणिक दृष्टि से हिंदी और उर्दू में बुनियादी समानताएं हैं, इसीलिए उन्हें दो अलग-अलग भाषाएं मानना अनुचित है, शब्दावली और लिपि की भिन्नता के कारण उन्हें एक ही भाषा की दो विशिष्ट शैलियां मानना ही उचित है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह निकलता है कि उर्दू हिंदी की एक साहित्यिक शैली है? क्यों न पलटकर हिंदी को ही उर्दू की शैली मान लिया जाए! क्या जिस हिंदी का हम प्रयोग करते हैं, उसका अस्तित्व उर्दू से ज्यादा प्राचीन है? ‘हिंदी जाति’ और ‘हिंदी प्रदेश’ जैसे आत्ममुग्ध प्रयोग अधिकांश मार्क्सवादियों के लेखन में धड़ल्ले से मिलते हैं। जरा पूछिए कि इसे ‘उर्दू प्रदेश’ या ‘उर्दू जाति’ कहकर पुकारें तो कैसा लगता है? अगर उर्दू हिंदी की ही एक साहित्यिक शैली है तो ‘हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास’ में इस शैली पर त्रिपाठी जी ने कितने पृष्ठ लिखे हैं? उत्तर है एक भी नहीं!
ऐसा ही गर्व त्रिपाठी जी ने प्रलेस के संबंध में भी व्यक्त किया है ‘‘प्रगतिशील लेखक संघ देश का एकमात्र अखिल भारतीय लेखक (संगठन?) है जिसमें देश की सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व है। वह देश का सर्वाधिक दीर्घजीवी लेखक संगठन भी है।’’ प्रलेस अखिल भारतीय भी है और दीर्घजीवी भी, लेकिन क्या सचमुच उसमें देश की सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व है? देश में न जाने कितनी आदिवासी भाषाएं हैं, जिसमें लिखित साहित्य तक मौजूद नहीं हैं, प्रतिनिधित्व क्या खाक होगा? यह ऐसी आत्मकेंद्रिकता है, जिसमें अपनी चिंताएं राष्ट्रीय समस्या के रूप में दिखती है और अपना संगठन सबका प्रतिनिधि नजर आने लगता है।
प्रगतिशील लेखक संघ की दीर्घजीविता के बारे में बात करते समय एक सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। जलेस और जसम की तुलना में प्रलेस निःसंदेह पुराना है, लेकिन यह 1936 वाला प्रलेस नहीं है! 1936 वाला प्रलेस भले ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से संचालित होता रहा हो, लेकिन तब वह अविभाजित थी, एकमात्र कम्युनिस्ट पार्टी। इतना ही नहीं उस समय प्रलेस की परिकल्पना एक संयुक्त मोर्चे के रूप में की गई थी, इसीलिए विभिन्न राजनैतिक संगठनों से जुड़े लेखकों का सक्रिय समर्थन भी उसे प्राप्त था। संयुक्त मोर्चे की बजाय एक पार्टी फ्रंट में बदलने की कोशिशों ने उसके विघटन में बड़ी भूमिका निभाई। वर्तमान प्रलेस संयुक्त मोर्चे को कौन कहे, सभी मार्क्सवादी लेखकों का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह मात्र एक कम्युनिस्ट पार्टी का पार्टी फ्रंट है। अगर संकीर्णतावाद पर बात करनी है तो 1948 की लाइन पर बात करनी होगी, उसमें रामविलासजी की भूमिका पर बात करनी होगी और वर्तमान प्रलेस की संकीर्णतावादी नीतियों पर भी बात करनी होगी।
सन् 36 में स्थापित प्रलेस किसी एक पार्टी की मौरूसी नहीं है, वह उन सभी लेखकों के लिए विरासत है जो साहित्य की जन-पक्षधरता और उसकी सामाजिक भूमिका में विश्वास करते हैं। उसे वर्तमान प्रलेस से न अलगाने का परिणाम यह होगा कि एक तो उसकी उपलब्धियों को वर्तमान प्रलेस के कर्ता-धर्ता अपना बताकर उसका श्रेय लेंगे। दूसरी ओर अपनी निष्क्रियता, कट्टरता तथा अन्य समस्याओं की जिम्मेदारी बड़ी आसानी से उस पर थोप देंगे, जैसा नामवरजी ने किया है। मठाधीश की तरह वर्षों प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर कुंडली मारकर बैठने के बाद आज नामवर सिंह बड़े निद्र्वंद्व भाव से कह रहे हैं कि ‘‘प्रेमचंद अगर प्रलेस में नहीं गए होते तो भी प्रगतिशील होते और वही सब लिखते जो लिखा है। उस समय तक लगभग वे अपना सारा लेखन कर चुके थे। प्रलेस नहीं होता तो भी नागार्जुन, केदार, मुक्तिबोध वही लिखते जो उन्होंने लिखा है। इसलिए जहां तक लेखन और रचनात्मकता का सवाल है, प्रलेस अगर नहीं भी होता तो भी हमारे यहां का बहुलांश श्रेष्ठ साहित्य वैसा ही होता, जैसा कि आज है।’’ इस अद्भुत कथन पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा ‘जोर देकर’ की गई गुंजायमान घोषणा को याद करें ‘‘अगर भारत में इस्लाम न भी आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।’’ नामवर सिंह ने ‘बारह आना’ वाली शब्दावली का इस्तेमाल नहीं किया, अन्यथा पैरोडी की पोल खुल जाती। द्विवेदी जी की उदात्त शैली की पैरोडी तैयार कर देने से कोई फतवा ऐतिहासिक सत्य नहीं बन जाता! विडंबना यह है कि द्विवेदी इस्लाम की भूमिका को घटाकर आंक रहे थे और उनके मार्क्सवादी शिष्य ने प्रगतिशील आंदोलन की भूमिका को ही खारिज कर दिया।
प्रगतिशील आंदोलन न होता तो अन्यों का क्या होता, यह तो बाद की बात है, सवाल है कि खुद नामवरजी कहां होते? क्या वे मार्क्सवादी आलोचक होते? अगर होते तो प्रलेस के बिना क्या उन्हें वहीं प्रतिष्ठा हासिल होती, जो उन्हें हुई? मार्क्सवादी आलोचना को यह प्रतिष्ठा किसने दिलाई? लेखकों की आस्था और उनके संगठित प्रयत्न ने! क्या वह संभव थी प्रलेस के बिना? द्विवेदी जी के वक्तव्य को सम्मान मिला तो इसलिए कि उसके पीछे फिर भी एक ऐतिहासिक विश्लेषण मौजूद था, नामवरजी के बयान के पीछे क्या है? उनके बयान के पीछे प्रलेस का कोई वस्तुगत मूल्यांकन नहीं, बल्कि अध्यक्ष के रूप में अपनी कारगुजारियों को प्रलेस के सिर पर मढ़ देने का कौशल छुपा हुआ है। आज प्रलेस अपने सकारात्मक रूप में अधिक से अधिक लेखकों की ‘ट्रेड यूनियन’ कहा जा सकता है, वह लेखकों को कोई ऊर्जा, कोई प्रेरणा दे सकने में असमर्थ है। क्या इसमें उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष और ‘मार्क्सवादी आलोचना के शिखर पुरुष’ की कोई भूमिका नहीं है? वर्तमान प्रलेस में नामवरजी की भूमिका का विस्तृत अध्ययन तो नहीं हुआ है, किंतु अपनी टिप्पणी में वरिष्ठ कथाकार ज्ञान रंजन ने मार्मिक शब्दों में प्रलेस के प्रति अपनी निष्ठा जताते हुए उसकी दुर्गति में नामवरजी के योगदान को बड़ी कसक के साथ याद किया है।
नामवरजी का कथन एक खास अर्थ में बिल्कुल सही है। पार्टी से जुड़ाव के आधार पर लेखकों की बाड़ेबंदी करने वाला ऐसा प्रलेस ऐसा न भी हो तो हिंदी साहित्य पर कोई बुनियादी प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन यही बात सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध और व्यापक आधार पर संयुक्त मोर्चे के रूप में गठित प्रगतिशील लेखक संघ के लिए नहीं कही जा सकती। आज के प्रलेस को देखकर कोई अनुमान भी नहीं कर सकता कि ब्रिटिश दमन के सम्मुख एकाकी और असहाय खड़े साहित्यकार को उसकी संगठित शक्ति और सामाजिक-राजनैतिक बदलाव में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका का उसे अहसास करा देना कितना ऊर्जावान और प्रेरक रहा होगा। सन् 36 वाले प्रलेस की ताकत इसमें नहीं देखनी चाहिए कि उसने कितने लोगों को प्रलेस का सदस्य बनाया, बल्कि इसमें देखनी चाहिए कि उसने समता मूलक समाज के स्वप्न को कितने लेखकों के लिए काम्य बना दिया। उसने राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रश्न को समाजवाद के स्वप्न के साथ जोड़ दिया। यह स्वप्न सभी के मन में था, चाहे वे कम्युनिस्ट लेखक हों, चाहे कांग्रेसी हों या फिर सोशलिस्ट! आज डा. आनंद कुमार पूछ रहे हैं कि ‘‘क्या प्रलेस लेखकों ने कभी कोई कहानी, कविता, नाटक चमरोटी, चेरी या अन्य किसी दलित बस्ती को केंद्र में रखकर लिखी है। लगता तो नहीं है।’’ जैसे कि उनकी राजनीति से जुड़े हुए लेखक कभी प्रलेस के अंग थे ही नहीं ! जाहिर है कि आनंद कुमार को साहित्य में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं है, अन्यथा उन्हें ‘अनटचेबल’, ‘बलचनमा’, ‘हरिजन गाथा’ और ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ जैसी रचनाओं के बारे में पता होता। दलित और स्त्री प्रश्न पर संवेदनशीलता के साथ पर्याप्त ध्यान न देने, उनकी समस्या को ‘वर्ग’ के भीतर ही विचारणीय मानने के लिए प्रगतिशील आंदोलन की आलोचना बिल्कुल की जानी चाहिए, लेकिन आंख मूंदकर उनके योगदान को खारिज कर देना अपनी अज्ञानता का परिचय देना है।
प्रलेस की स्थापना के बाद प्रेमचंद लंबे समय तक जीवित नहीं रह सके, इसलिए नामवरजी कल्पना कर सकते हैं कि वे प्रलेस में न जाते तब भी वही लिखते, जो उन्होंने लिखा। यानी प्रलेस में शामिल होने का प्रेमचंद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्या इसका आशय यह लगाया जाए कि प्रेमचंद अपने समय के सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों से अछूते थे, या यह कि गांधी से तो वे प्रभावित हो सकते थे, लेकिन मार्क्सवाद से नहीं? पूछा जा सकता है कि प्रेमचंद प्रलेस में न जाते तो भी अपना वह ऐतिहासिक भाषण दे पाते, जिसमें उन्होंने साहित्य की कसौटी बदलने का आह्वान किया था? और क्या इस आह्वान ने हिंदी लेखकों पर कोई प्रभाव नहीं डाला होगा? प्रगतिशील आंदोलन के दौरान लेखकों द्वारा लोकजीवन की भाषा के सर्जनात्मक प्रयोग की चर्चा करते हुए मैनेजर पांडेय ने प्रेमचंद के आह्वान के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने ठीक लिखा है कि साहित्य को जन-जीवन से जोड़ने की प्रक्रिया में ‘‘प्रगतिशील रचनाकार इन प्रयोगों से सुंदरता की वह अभिजन कसौटी ही बदल रहे थे।’’ निःसंदेह प्रलेस के पहले भी प्रगतिशीलता मौजूद थी, लेकिन वह प्रगतिशीलता न सिर्फ अपनी प्रकृति में भिन्न थी, बल्कि वह किसी लेखक का व्यक्तिगत चयन हुआ करती थी। प्रगतिशील आंदोलन ने जनता से प्रतिबद्धता को साहित्यकार का अपरिहार्य नैतिक दायित्व बना दिया।
प्रगतिशील आन्दोलन ने भारतीय साहित्य में युगांतर स्थापित किया। वह सचेत और संगठित रूप से चलाया गया पहला अखिल भारतीय सांस्कृतिक आन्दोलन है। राजेन्द्र यादव ने ठीक रेखांकित किया है कि प्रगतिशील आन्दोलन में न सिर्फ विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों को आपस में जोड़ा, बल्कि उन्हें एक अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ भी उपलब्ध कराया। उसने साहित्य जगत में अभिजात वर्ग के प्रति मौजूद आकर्षण को निर्णायक चुनौती दी। उसने घोषित किया कि वंचित-उत्पीड़ित मानवता का पक्षधर हुए बिना कोई रचना प्रगतिशील नहीं हो सकती। प्रगतिशील आन्दोलन का महत्व दस-बीस नामी लेखकों को पैदा करने तक सीमित नहीं है। उसका महत्व लाखों-करोड़ों बेजुबान भारतवासियों की आवाज बन जाने में निहित है। उसका महत्व हजारों लोक गायकों और लोक कलाकारों को पैदा करने में निहित है।
जिस तरह भक्ति आन्दोलन न होता सैकड़ों दलित रचनाकारों को जुबान न मिलती। उसी तरह प्रगतिशील आन्दोलन न होता तो जन-मन को झकझोर कर जगा देने वाले वे निम्नवर्गीय कलाकार भी न हुए होते। आज हिन्दी का आम पाठक अगर उन रचनाकारों से अपरिचित है, तो इसलिये नहीं कि वे कुछ कम महत्वपूर्ण थे, बल्कि इसलिये कि हिन्दी में आलोचना और इतिहास लेखन की अभिजात-व्यक्तिवादी पद्धति केवल बड़े नामों और बड़े प्रकाशनों से प्रकाशित-प्रचारित रचनाओं पर ही अपनी कृपा दृष्टि डालती है। जिन लोगों के लिये दलित प्रश्न का अस्तित्व केवल आठ-दस दलित आत्मकथाओं तक सीमित है, वे जरूर प्रगतिशील आन्दोलन की सार्थकता पर सवाल उठा सकते हैं; लेकिन ऐसे लोगों को जानना चाहिए कि साठ के दशक में ही दलित प्रश्न को सशक्त ढंग से उठाने वाली एक पूरी पीढ़ी तैयार हो चुकी थी। उनके लेखन के केन्द्र में अस्मिता के नहीं, बल्कि अस्तित्व के सवाल थे और इसीलिये इस तरह के फतवे उन्होंने कभी नहीं दिये कि सिर्फ दलित ही दलित समस्या पर लिख सकता है। एक आन्दोलन और संगठन के रूप में प्रलेस जरूर खत्म हो गया लेकिन उसकी प्रेरणाएं नहीं मरी। राजेन्द्र यादव ने विमर्श प्रभावित समकालीन रचनाशीलता को उचित ही प्रगतिशील साहित्य के विस्तार के रूप में देखा है।
डा. नामवर सिंह ने उदारता की सभी हदें तोड़ते हुए हिंदी साहित्य की पूरी परंपरा को ही प्रगतिशील बता दिया है, मानो हिंदू परंपरा और जातिगत-जेंडरगत पूर्वाग्रहों से हिंदी साहित्य का दूर-दूर तक कोई वास्ता ही न रहा हो। सबसे ज्यादा आपत्तिजनक तो यह है कि इसके लिए उन्होंने प्रेमचंद को माध्यम बनाया है। वे कहते हैं कि ‘‘हमें यह समझना चाहिए कि हिंदी साहित्य की परंपरा गैर सांप्रदायिक और स्वतः स्फूर्त प्रगतिशील रही है। शायद इसीलिए प्रेमचंद ने कहा कि लेखक स्वभावतः प्रगतिशील होता है।’’ प्रेमचंद ने निःसंदेह कलाकार को स्वभावतः प्रगतिशील कहा था, लेकिन उनके दो टूक भाषण में कहीं उस ‘शायद’ के लिए गुंजाइश नहीं थी, जिसे नामवरजी ने उन्हें विकृत करने के लिए अपनी ओर से जोड़ा है। प्रेमचंद ने अपने भाषण में न तो हिंदी साहित्य को गैर सांप्रदायिक बताया था, न ही स्वतः स्फूर्त प्रगतिशील। इसके उलट उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘हमने जिस युग को अभी पार किया है, उसे जीवन से कोई मतलब न था। हमारे साहित्यकार कल्पना की एक सृष्टि खड़ी करके उसमें मनमाने तिलिस्म बांधा करते थे।’’ अगर पूर्ववर्ती साहित्य के बारे में प्रेमचंद की यह धारणा थी तो उन्होंने कलाकार को स्वभावतः प्रगतिशील क्यों कहा?
इस विरोधाभास का समाधान तभी होगा, जब प्रेमचंद के भाषण को उसकी संपूर्णता में देखें। कला की अभिजात वर्गीय धारणा पर प्रहार करते हुए उसी भाषण में प्रेमचंद ने कहा कि ‘‘कला नाम था, और अब भी है, संकुचित रूप-पूजा का, शब्द-योजना का, भाव निबंधन का। उसके लिए कोई आदर्श नहीं है, जीवन का केाई ऊंचा उद्देश्य नहीं है- भक्ति, वैराग्य, अध्यात्म और दुनिया से किनाराकशी उसकी सबसे ऊंची कल्पनाएं हैं। हमारे उस कलाकार के विचार से जीवन का चरम लक्ष्य यही है। उसकी दृष्टि अभी इतनी व्यापक नहीं कि जीवन-संग्राम में सौंदर्य का परमोत्कर्ष देखे।’’ ऐसी कला और कलाकार को प्रेमचंद ने प्रगतिशील नहीं कहा था। इसके विरुद्ध प्रेमचंद ने सौंदर्य की कसौटी को बदलने का प्रस्ताव किया, समाज को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध जन पक्षधर कला की वैकल्पिक धारणा प्रस्तावित की। कला की इस वैकल्पिक धारणा में कलाकार की भी एक आदर्श वैकल्पिक छवि अंतर्निहित है। उन्होंने कहा कि ‘‘जो आदमी सच्चा कलाकार है, वह स्वार्थमय जीवन का प्रेमी नहीं हो सकता।’’ इस सच्चे कलाकार को ही उन्होंने स्वभावतः कलाकार कहा था, धन और यश के लिए चाटुकारिता करने वाले झूठे कलाकार को नहीं।
हिंदी साहित्य की तथाकथित स्वतः स्फूर्त प्रगतिशीलता के पक्ष में नामवरजी ने एक और तर्क दिया है ‘‘जिस साहित्य में कबीर जैसा भक्त कवि हुआ हो उस साहित्य की प्रगतिशीलता किसी प्रलेस के कारण पैदा नहीं हुई है।’’ अद्भुत इतिहासबोध है नामवरजी का, कबीर की प्रगतिशीलता और प्रलेस की प्रगतिशीलता एक जैसी हो गई है! इससे तो ऐसा लगता है कि यदि कबीर चाहते तो प्रलेस बना सकते थे, लेकिन उसकी व्यर्थतता समझकर ही उन्होंने यह विचार त्याग दिया होगा। जिस साहित्य (भाषा?) में कबीर हो गए, उसकी प्रगतिशीलता स्वयंसिद्ध हो गई? क्या उसी ‘साहित्य’ (!) में रीतिकाल नहीं हुआ, तुलसीदास नहीं हुए और मुसलमान स्त्रियों की दुर्दशा को शिवाजी की वीरता के प्रमाण की तरह बखानने वाले भूषण नहीं हुए? क्या जिस भाषा और देश ने मार्क्स को जन्म दिया, उसी ने हिटलर को पैदा नहीं किया था!
द्विवेदी जी की शैली का अनुसरण करते हुए नामवरजी ने प्रगतिशील आंदोलन को प्रगतिशील परंपरा का स्वाभाविक विकास बताने की चेष्टा की है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘प्रगतिशील लेख संघ की स्थापना ने हिंदी साहित्य की चली आ रही स्वाभाविक परंपरा को और त्वरित किया। प्रगतिशील लेखक संघ ने प्रगतिशीलता को जन्म नहीं दिया, बल्कि उसने हाथ लगाकर क्रमशः प्रगतिशीलता की ओर उन्मुख धारा को और गति दी।’’ अर्थात केवल मात्रात्मक परिवर्तन किया, कोई युगान्तर स्थापित नहीं किया। यहां प्रलेस की 50वीं वर्षगांठ पर प्रकाशित नामवरजी के ही निबंध ‘साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका’ का एक अंश उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं किया जा सकता। यथार्थवाद और प्रलेस के बारे में रामविलासजी की मान्यताओं को प्रस्तुत करने के बाद नामवर सिंह ने लिखा था कि ‘‘यथार्थवाद संबंधी इस धारणा से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि प्रगतिशील आंदोलन न भी आरंभ होता तो हिंदी साहित्य में यथार्थवाद का विकास होता ही। स्थिति यह है कि सन् 36 से पहले यथार्थवाद के साथ यथार्थवाद-विरोधी प्रवृत्तियां भी कई थीं और उनमें से कुछ यथार्थवाद का आभास भी देती थीं, क्योंकि यथार्थ को देखने की दृष्टि में विविधता थी। साहित्यिक प्रवृत्तियों के इस जटिल संघर्ष को न देखकर यथार्थवाद के स्वतः स्फूर्त विकास की कल्पना करना इतिहास की सीधी-सरल विकासवादी दृष्टि है, जिसका प्रगतिवाद से कोई संबंध नहीं है।’’
तो क्या प्रलेस की स्थापना ने इस परिदृश्य पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव डाला? नामवरजी ने अगले ही पैरा में इसका उत्तर देते हुए लिखा था कि ‘‘वस्तुतः सन् 36 के बाद का हिंदी साहित्य प्रगतिशील आंदोलन के सचेत और संगठित हस्तक्षेप का फल था और उसे हम चाहें तो वाल्टर बेन्यामिन के शब्दों में ‘इतिहास के नैरंतर्य में विस्फोट’ की संज्ञा दे सकते हैं। उस समय साहित्य में ‘प्रगति’ से प्रगतिशील लेखकों का यही आशय था। समाज और संस्कृति के समान ही साहित्य भी संकट के दौर से गुजर रहा था। विकास की गति रुद्ध थी। आवश्यकता थी सृजन की शक्तियों के उन्मोचन की। यह उन्मोचन ही प्रगति है।’’ आज समय बदल गया है, अतः नामवरजी के लिए ‘प्रगति’ का आशय भी बदल गया है और प्रगतिशील आंदोलन का भी। पाठक खुद ही तय कर लें कि उक्त दोनों में से कौन सा आशय वस्तुस्थिति के ज्यादा निकट है।
उक्त बदलाव के अनुरूप ही नामवरजी ने डा. रामविलास शर्मा को भी एकदम भिन्न रूप में याद किया है। अब उन्हें रामविलासजी प्रलेस को ‘संकीर्णतावाद’ की राह पर ले जाने के जिम्मेदार नहीं, बल्कि उसकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध बलिदानी योद्धा नजर आने लगे हैं। 1953 के प्रलेस सम्मेलन में अपने उपस्थित होने का जिक्र करते हुए नामवरजी ने लिखा है कि ‘‘शाम को जब सभा शुरू हुई तो यह खबर छनकर आई कि पार्टी नेतृत्व की ओर से यह संदेश आया है कि प्रगतिशील लेखक संघ को भंग कर दिया जाए, क्योंकि इससे फायदा कम नुकसान अधिक हो रहा है। संदेश अजय घोष ने भेजा था, जिसे नंबूदरीपाद लेकर आए थे। लेकिन प्रलेस की अपनी कार्यकारिणी ने इसे मानने से इनकार कर दिया। रामविलासजी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया और उनकी जगह उर्दू के मशहूर उपन्यासकार कृश्न चंदर को प्रलेस की कमान सौंपी गई।’’
इस घटना का जिक्र रामविलासजी ने भी किया है, लेकिन थोड़े फर्क के साथ। उन्होंने लिखा है कि ‘‘खुले अधिवेशन से पहले पार्टी लेखकों की बैठक में नंबूद्रिपाद ने अजय घोष का एक पत्र पढ़कर सुनाया। यह पत्र लेखकों के नाम नहीं था, नंबूद्रिपाद के नाम था। उसकी दो स्थापनाएं मुझे याद हैं: (1) प्रगतिशील लेखक संघ से लाभ की अपेक्षा हानि अधिक हुई है; (2) उसे चलाते रहें, यह तय करने से पहले साथियों को कई बार सोच लेना चाहिए। मैंने पूछा, यह राय पोलिट ब्यूरो की है या अजय घोष की व्यक्तिगत राय है? नंबूद्रिपाद ने कहा, यह उनकी व्यक्तिगत राय है।… खुले अधिवेशन में किसी ने भी उसे भंग करने की बात नहीं की। सम्मेलन में नई कार्यकारिणी चुनी गई, कृश्न चंदर महासचिव नियुक्त हुए।’’ दोनों विवरणों में मौजूद फर्क हमारे लिए महत्वपूर्ण है। रामविलासजी के कहने का आशय भी यही है कि प्रलेस में कम्युनिस्ट पार्टी की दिलचस्पी खत्म हो गई थी। इस बात का समर्थन अन्य तथ्यों से भी होता है। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने प्रलेस को भंग करने का प्रस्ताव कभी नहीं किया। रामविलासजी के विवरण में यह ईमानदारी है कि वे न तो पार्टी पर प्रलेस को भंग करने का आरोप लगाते हैं और न ही इस राय – कि प्रलेस से ‘हानि अधिक हुई है’ – को ‘नेतृत्व’ की राय बताते हैं। उन्होंने स्पष्ट ढंग से लिखा है कि यह अजय घोष की व्यक्तिगत राय थी और उन्होंने संघ को चलाने संबंधी निर्णय की जिम्मेदारी लेखकों पर छोड़ दी थी।
नामवर सिंह इसे ‘पार्टी बनाम रामविलास शर्मा’ का मुद्दा बना देते हैं, जिसमें पार्टी के आदेश के प्रतिरोध स्वरूप रामविलासजी ने इस्तीफा दे दिया। रामविलासजी कह रहे हैं कि सम्मेलन में नई कार्यकारिणी चुनी गई यानी लोकतांत्रिक ढंग से अन्य सदस्यों के साथ-साथ एक नए महासचिव का चुनाव किया गया। उनके समर्थक कहते हैं कि उन्हें ‘पद से हटा दिया गया’ यानी उनके साथ नाइंसाफी हुई। और नामवर सिंह कह रहे हैं कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया यानी उन्होंने अपना विरोध प्रकट किया, प्रलेस के लिए कुर्बानी दी। खुद रामविलासजी के बारे में इन तीनों बयानों में से किसके सही होने की संभावना अधिक है? नामवरजी से बड़ा समर्थक रामविलासजी को कहां मिलेगा!
लेकिन रामविलासजी के लिए अचानक उमड़ी इस सहानुभूति का कारण क्या है? हो सकता है कि मौजूदा प्रलेस के संबंध मंे नामवरजी खुद को उसी भूमिका में पा रहे हों, जो उक्त प्रलेस में रामविलासजी ने निभाई थी। लेकिन इसकी संभावना थोड़ी ही है, न सिर्फ इसलिए कि नामवर सिंह का प्रलेस रामविलासजी के प्रलेस से भिन्न है, बल्कि इसलिए भी कि इन दोनों विद्वानों में भी पर्याप्त भिन्नता रही है। एक संभावना और भी है। हो सकता है कि रामविलासजी की पहली बरसी (2001) पर उनकी आलोचना के योजनाबद्ध आयोजन से नामवरजी ने जो अपयश कमाया था, पहली शतवार्षिकी (2012) पर उनका महिमामंडन करके उसका प्रक्षालन करना चाहते हों। इस अवसर पर सैकड़ों आयोजन होंगे, जिनमें रामविलासजी को पढ़ने और चाहने वाले लोगों के सामने नामवरजी को बोलना होगा- प्रगतिशील आंदोलन और उसमें रामविलासजी की भूमिका की पुनव्र्याख्या के जरिए हो सकता है कि नामवरजी अवसरानुकूल मौखिक आलोचना के लिए पूर्वाभ्यास कर रहे हों, माहौल बना रहे हों।
प्रगतिशील आंदोलन की पुनव्र्याख्या होनी ही चाहिए। उसकी उपलब्धियों ही नहीं, उसकी सीमाओं और खामियों पर भी गंभीर बहस होनी चाहिए। लेखक के ऊपर आलोचक, आलोचक के ऊपर पार्टी और पार्टी के ऊपर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली कम्युनिस्ट पार्टियों के नियंत्रण का जो पदानुक्रम उस दौर में विकसित हुआ, उसने प्रलेस ही नहीं, भारत में मार्क्सवादी राजनीति को भी गंभीर क्षति पहुंचाई। इस पदानुक्रम को आत्मसात कर चुके बहुत से बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता इसीलिए सोवियत संघ के विघटन के बाद दिग्भ्रमित और हताश दिखाई पड़ते हैं। इस हताशा की छाया सहारा आयोजन में प्रकाशित अधिकांश बुद्धिजीवियों की टिप्पणियों में प्रतिबिंबित हुई है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि एक बेहतर दुनिया की कल्पना मनुष्य का शाश्वत स्वप्न है। ने इस स्वप्न को भौतिक आधार दिया, इसी दुनिया में उसे साकार कर सकने की संभावना दी। सोवियत संघ के विघटन से न तो वह स्वप्न खत्म हो गया है और न ही उसके लिए संघर्ष करने की जरूरत। प्रगतिशील आंदोलन इसी संघर्ष का एक अंग था और ठीक इसी वजह से प्रगतिशील आंदोलन की सार्थक पुनव्र्याख्या माक्र्सवादी दृष्टिकोण से ही की जा सकती है, उसे तिलांजलि देकर नहीं। मुमकिन है कि प्रगतिशील आंदोलन की गंभीर
व्याख्या हमें एक व्यापक किंतु प्रतिबद्ध लेखक संगठन की जरूरत से वाकिफ कराने के साथ-साथ उसकी स्वायत्तता का सम्मान करने की तमीज भी हमें सिखा सके।
समयांतर फ़रवरी 2012 किस प्रलेस की बात कर रहे हैं आप kavitendra indu kis prales kee baat kar rahe hai aap samyantar februry 2012
Pragatisheel Lekhak Sangha ki Sthapana ke 75 Varsha pure hone para Rashtriya Sahara ne usa para dviamkiya (5 tatha 12 navambara) Bahas ka Ayojana kiya. isa Ayojana ko ‘mahabahasa’ kahana kahim se uchita nahim lagata, kyomki bahasa jaisi koi chija hi vaham nahim dikhati. vaha Dakshin panthi Uttar Adhuniktavadi Samajavadi Marksavadi marxvadi lekhakom dvara ki gai vaividhyapurna tippaniyom ka pitara banakara raha gaya hai. jahira hai ki svayam sampadaka ki koi pratibaddhata na to Pragatishil Andolan ke prati hai aura na hi gambhira Bauddhik Vimarsh ke prati.
Yaham isa Ayojana mem shamila Krishna datt Paliwal sarikhe aise Param Gynaniyon ke Pralap ki charcha gaira jaruri hogi, jo apani Vicharadhara ko khuleama svikara nahim kara sakate, isalie Uttara Adhunikata ka labada oढ़kara Marks vad ko kosate haim; jo Aadhar Aur Adhirachana ka ‘a’ bhi nahim janate, lekina Antonio gramsci gramsi se lekara Frederick Jemison taka ko eka phamuka mem uड़a dene ka dambha palate haim. ve baड़e utsaha se jacques derrida derida ke Marx Ke Pret ka nama lete haim, bina yaha jane ki usase derida ka Ashaya kya tha. arthahina vakyom mem yuropiya namom ko gumthakara pathakom ko atamkita karane ke lie ki gai Name Droping para isase adhika kya kaha ja sakata hai ki aise Vidvanon ko Elen Sokel ki pustaka Intelctual Imposture
i chahie, ho sakata hai ki uttara adhunikata ka bukhara kucha niche utare.Vaise shikayata dakshina pamthiyom se nahim hai, ve to vahi kara rahe haim, jo unhem karana chahie. shikayata to unase hai, jo Pragatisheel Andolan Prales ke rahanuma mane jate haim. prales ke 75 Sthapana divasa para apane Lackhnow me bhashana mem Namavar Singh ne Aarakshan ke virodha mem jo pravachana diya usaka Dalit Buddhijivi ne paryapta prativada kiya hai. lekina Age chalakara Namwar ne Pragatishil Lekhak Sangha ke bare mem jo kucha kaha usase khuda Pragatishila Aalochak ke kanom para jum taka nahim remgi yaha bata bechaina karane vali hai. Sahara 5 November ke amka mem prakashita Namvaraji ke vaktavya ka shirshaka hai Sangathan Ki Mohataj Nahi Pragatisheelta. shirshaka hi nahim, pura vaktavya chaimkane vala hai. Namwarji ne pragatishila amdolana ki bhumika para hi prashnachiõ lagate hue kaha hai ki hindi ki puri Hindi Sahityik Parampara ‘svatah sphurta pragatishila’ rahi hai, pragatishila lekhaka samgha na bhi hota to himdi sahitya para koi buniyadi pharka nahim paड़ta. yum to namavaraji ke maukhika pravachanom se Ahata hona nadani hai, kyomki khuda namavaraji apani manyataom ko itani gambhirata se nahim lete haim aura na hi una para Tike rahane ka unaka koi Agraha hota hai. Ramvilashji lekina ukta vaktavya para asahamati darja karana isalie jaruri lagata hai kyomki namavaraji abhi bhi eka Namawar satta Pratishthan bane hue haim aura isi vajaha se bahuta se loga unhem Hindi Sahitya ke Pratinidhi ke rupa mem dekhate haim. atah unake havale se hi himdi sahitya ke bare mem koi raya kayama karate haim.Hindi Namvara Yaha dilachaspa hai ki Aja namavaraji bhi vahi saba kaha rahe haim, jo apane amtima varshom mem Ramvilash Ramvilas kahane lage the. Yatharth vad parampara ki svaghoshita Pragatishil Andolan pragatishilata ka ramavilasaji se baड़a marksavadi himayati aura kauna hua hai! Ve bhi kahate the ki vilayata mem paढ़e-likhe kucha amgrejidam madhyavargiya naujavanom ne Pragatisheel Lekhak Sangha ki sthapana karake koi tira nahim mara diya, yatharthavadi pravrrittiyam himdi mem pahale se hi vikasita ho rahim thim. vidambana yaha hai ki 1986 mem pralesa ki sthapana ke 50 varsha pure hone para jo namavara simha ‘sahitya mem pragatishila amdolana ki aitihasika bhumika’ likhakara ramavilasaji ki ukta manyataom ka prativada kara rahe the, Aja vahi una manyataom ko dohara rahe haim. namavaraji hi nahim pragatishila amdolana ki charcha karane vale adhikamsha vidvana chahe vaha Rekha Avasthi Karnasingh Chauhan Ravindra Tripathi Vishvanatha Tripathi hom ya sahara Ayojana mem Ramvilash Vishwanath Tripathi hom, ramavilasaji ke havale se hi pragatishila amdolana ko samajhate-samajhate haim. Pragatisheel
Vishvanatha tripathi ne pragatishilata ko prales se joड़ne ka virodha kiya hai. unaka kahana hai ki ‘‘pragatishila Sahitya Dhara ko Pragatishil lekhaka samgha ki sthapana aura uddeshyom ya Samajvadi Vichardhara se bamdhakara dekhana isa Sahitya Aalochana ko simita kara dena hai. Acharya Ramchandra Shukla Hajari Prasad Dvivedi Pragatishil Lekhaka Sangha ke sadasya nahim the, ye samajavadi bhi nahim the, phira bhi ve himdi ke sarvashreshtha pragatishila Alochaka haim.’’ Acharya Shukla Aura Acharya Dvivedi shreshtha Alochaka Alochak haim, isamem samdeha nahim, lekina ve Pragatishil Alochak haim ya nahim, isaka uttara isa bata para Nirbhar karata hai ki Pragatishilata se apaka Ashaya kya hai!कवितेंद्र इन्दुIsa prasamga mem yada rakhana chahie ki shabda hamesha apane vyutpattiparaka ya shabdika artha ka hi vahana nahim karate, kai bara eka Aitihasik prakriya mem unaka artha badala jata hai aura ve vishishta paribhashika artha ke vachaka bana jate haim- isi prakriya mem vishishta aitihasika ghatanaom-parighatanaom aura vastuom ka namakarana sambhava ho pata hai. Pragatishila Alochana udaharana ke lie kabhi Dalita Shabda kisi bhi kisma ke dalana-utpiड़na ke lie prayukta hota tha, lekina Dalit Andolan ne use eka vishishta artha pradana kiya hai. Aja koi yaha kahe ki dalita shabda ko jatigat utpidan se joड़kara dekhana, usake artha ko simita karana hai, to isase usake j~nana ka nahim balki usaki niyata ka hi pata chalega. isi taraha Pragatishila Andolana ne bhi Pragatishilata ko Jan Pakshadhar Krantikari drrishtikona ke rupa mem punarparibhashita kiya tha. Pragatishila Andolana ke samdarbha mem Pragatishilata ka yahi artha prachalita hai. phira Vishvanath Tripathi use itana udara kyom bana rahe haim? Taki usamem Acharya Shukla aura Acharya Dvivedi ko phita kiya ja sake! Udarata ke isa Chadma ka anavarana usa samaya ho jata hai, jaba ve eka hi pamkti ke bada yaha likhate haim ki Pragatisheel Alochana ne marksavada ya Samajavadi Vicharadhara se prerana prapta ki. Shivdan Singh Chauhan Prakash chanda Gupta ne Hindi mem pragatishila alochana ki nimva rakhi.’’ agara nimva hi inhomne rakhi to inake pahale vale pragatishila kaise ho gae? Agara pragatishila alochana Marksavad se prerita thi to shukla aura dvivedi ji ko Pragatishila Alochana ka tamaga pahanane ka kya auchitya hai?Ram Vilash ji se Vishwanatha Tripathi ka pharka yaha hai ki ve Hajari Prasad Dvivedi ko bhi Pragatishil ghoshita kara rahe haim, lekina paddhati unaki bhi Sharma vali hi hai. samyoga nahim hai ki Vishvanatha Tripathi aura Ravindra Tripathi donom hi alochakom ne mukta kamtha se Ramavilashji ki prasamsha ki hai aura unhim ki taraha Arambhik Pragatishila Alochana mem Sankirnata vada ke maujuda hone ki shikayata ki hai. ishara Pralesh ke arambhika Ghoshanapatra aura Shivdan Singh Chauhan Rangeya Raghav sarikhe alochakom ki ora hai. Ramavilasaji aura unake anuyayi yaha batane ka kashta nahim karate ki Tulasidas ki Alochana karana Parampara ke Avamulyan ka paryayavachi kaise ho jata hai, na hi ve yaha batate haim ki ukta Samkirnatavad jisa pravrritti se takara raha tha, usaka nama Paramparavad tha.
Lekhan Aja ise yada karane ki jahamata koi nahim uthata ki Bhaktikal aur Ritikal sahitya ke prati Alochanatmak ravaiya apanana agara Sankirnatavada tha to yaha Samkirnatavad sabase prakhara rupa mem ukta ghoshanapatrom evam alochakom ke lekhana mem nahim, balki Prales Adhiveshan ke Adhyaksha pada se die gae Premchand ke Sahitya Ka Uddeshya shirshaka bhashana mem prakata hua tha. apane bhashana mem Prem chand ne Prachin Sahitya ki prashamsa mem eka vakya bhi nahim kaha, ulte shrrrimgara ke satha-satha Bhakti ko bhi Patansheel Sahitya ka lakshana batate hue likha ki ‘‘sahitya apane kala ka Pratibimba hota hai. jo Bhava Aura Vichar logom ke hrridaya ko spamdita karate haim, vahim sahitya para bhi apani chaya dalate haim. aise patana ke kala mem loga ya to ashiki karate haim ya Adhyatma aura Vairagya mem mana ramate haim. jaba sahitya para samsara ki nashvarata ka ramga chaढ़a ho aura usaka eka-eka shabda nairashya mem duba ho, samaya ki
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Sahitya Ka Sankshipt Itihas
Aisa hi garva Tripathi Ji ne Prales ke sambamdha mem bhi vyakta kiya hai Pragatishil Lekhaka Sangha desha ka ekamatra akhila bharatiya lekhaka (samgathana?) Hai jisamem desha ki sabhi bhashaom ka pratinidhitva hai. vaha desha ka sarvadhika dirghajivi lekhaka samgathana bhi hai.’’ pralesa Akhil Bharatiya bhi hai aura dirghajivi bhi, lekina kya sachamucha usamem desha ki sabhi bhashaom ka pratinidhitva hai? Desha mem na jane kitani Adivasi Bhasha haim, jisamem Likhit Sahitya taka maujuda nahim haim, Pratinidhitva kya khaka hoga? Yaha aisi atmakemdrikata hai, jisamem apani chimtaem rashtriya Samasya ke rupa mem dikhati hai aura apana Sangathan sabaka pratinidhi najara Ane lagata hai.Lekhak Parti
Pragatishila Lekhaka Samgha ki dirghajivita ke bare mem bata karate samaya eka savadhani baratana behada jaruri hai. Jales aur Jasam ki tulana mem pralesa nihsamdeha purana hai, lekina yaha 1936 vala pralesa nahim hai! 1936 vala Prales bhale hi Bharatiya Communist parti se samchalita hota raha ho, lekina taba vaha avibhajita thi, ekamatra kamyunista parti. itana hi nahim usa samaya pralesa ki parikalpana eka Sanyukt Morcha samyukta morche ke rupa mem ki gai thi, isilie vibhinna rajanaitika samgathanom se juड़e lekhakom ka sakriya samarthana bhi use prapta tha. samyukta morche ki bajaya eka parti phramta mem badalane ki koshishom ne usake vighatana mem baड़i bhumika nibhai. vartamana pralesa samyukta morche ko kauna kahe, sabhi marksavadi lekhakom ka bhi pratinidhitva nahim karata. vaha matra eka kamyunista parti ka parti phramta hai. agara samkirnatavada para bata karani hai to 1948 ki laina para bata karani hogi, usamem Ramavilas ki bhumika para bata karani hogi aura vartamana pralesa ki samkirnatavadi nitiyom para bhi bata karani hogi.
Jan Pakshadharata
San 36 mem sthapita pralesa kisi eka parti ki maurusi nahim hai, vaha una sabhi lekhakom ke lie virasata hai jo sahitya ki jana-pakshadharata aura usaki samajika bhumika mem vishvasa karate haim. use vartamana pralesa se na alagane ka parinama yaha hoga ki eka to usaki upalabdhiyom ko vartamana pralesa ke karta-dharta apana batakara usaka shreya lemge. dusari ora apani nishkriyata, kattarata tatha anya samasyaom ki jimmedari baड़i asani se usa para thopa demge, jaisa namavaraji ne kiya hai. mathadhisha ki taraha varshom pralesa ke rashtriya adhyaksha ki kursi para kumdali marakara baithane ke bada Aja namavara simha baड़e nidrvamdva bhava se kaha rahe haim ki ‘‘premachamda agara pralesa mem nahim gae hote to bhi pragatishila hote aura vahi saba likhate jo likha hai. usa samaya taka lagabhaga ve apana sara lekhana kara chuke the. pralesa nahim hota to bhi nagarjuna, kedara, muktibodha vahi likhate jo unhomne likha hai. isalie jaham taka lekhana aura rachanatmakata ka savala hai, pralesa agara nahim bhi hota to bhi hamare yaham ka bahulamsha shreshtha sahitya vaisa hi hota, jaisa ki Aja hai.’’ isa adbhuta kathana para koi bhi tippani karane se pahale acharya hajari prasada dvivedi dvara ‘jora dekara’ ki gai gumjayamana ghoshana ko yada karem ‘‘agara bharata mem islama na bhi aya hota to bhi isa sahitya ka baraha ana vaisa hi hota jaisa Aja hai.’’ namavara simha ne ‘baraha ana’ vali shabdavali ka istemala nahim kiya, anyatha pairodi ki pola khula jati. dvivedi ji ki udatta shaili ki pairodi taiyara kara dene se koi phatava aitihasika satya nahim bana jata! Vidambana yaha hai ki dvivedi islama ki bhumika ko ghatakara amka rahe the aura unake marksavadi shishya ne pragatishila amdolana ki bhumika ko hi kharija kara diya.
Akhila Bharatiya
Pragatishila amdolana na hota to anyom ka kya hota, yaha to bada ki bata hai, savala hai ki khuda namavaraji kaham hote? Kya ve marksavadi Alochaka hote? Agara hote to pralesa ke bina kya unhem vahim pratishtha hasila hoti, jo unhem hui? Marksavadi alochana ko yaha pratishtha kisane dilai? Lekhakom ki astha aura unake samgathita prayatna ne! Kya vaha sambhava thi pralesa ke bina? Dvivedi ji ke vaktavya ko sammana mila to isalie ki usake piche phira bhi eka aitihasika vishleshana maujuda tha, namavaraji ke bayana ke piche kya hai? Unake bayana ke piche pralesa ka koi vastugata mulyamkana nahim, balki adhyaksha ke rupa mem apani karagujariyom ko pralesa ke sira para maढ़ dene ka kaushala chupa hua hai. Aja pralesa apane sakaratmaka rupa mem adhika se adhika lekhakom ki ‘treda yuniyana’ kaha ja sakata hai, vaha lekhakom ko koi urja, koi prerana de sakane mem asamartha hai. kya isamem usake rashtriya adhyaksha aura ‘marksavadi alochana ke shikhara purusha’ ki koi bhumika nahim hai? Vartamana pralesa mem namavaraji ki bhumika ka vistrrita adhyayana to nahim hua hai, kimtu apani tippani mem varishtha kathakara j~nana ramjana ne marmika shabdom mem pralesa ke prati apani nishtha jatate hue usaki durgati mem namavaraji ke yogadana ko baड़i kasaka ke satha yada kiya hai. Prales
Namavaraji ka kathana eka khasa artha mem bilkula sahi hai. parti se juड़ava ke adhara para lekhakom ki baड़ebamdi karane vala aisa pralesa aisa na bhi ho to himdi sahitya para koi buniyadi prabhava nahim paड़ega, lekina yahi bata samajika parivartana ke lie pratibaddha aura vyapaka adhara para samyukta morche ke rupa mem gathita pragatishila lekhaka samgha ke lie nahim kahi ja sakati. Aja ke pralesa ko dekhakara koi anumana bhi nahim kara sakata ki britisha damana ke sammukha ekaki aura asahaya khaड़e sahityakara ko usaki samgathita shakti aura samajika-rajanaitika badalava mem usaki mahatvapurna bhumika ka use ahasasa kara dena kitana urjavana aura preraka raha hoga. san 36 vale pralesa ki takata isamem nahim dekhani chahie ki usane kitane logom ko pralesa ka sadasya banaya, balki isamem dekhani chahie ki usane samata mulaka samaja ke svapna ko kitane lekhakom ke lie kamya bana diya. usane rashtriya svadhinata ke prashna ko samajavada ke svapna ke satha joड़ diya. yaha svapna sabhi ke mana mem tha, chahe ve kamyunista lekhaka hom, chahe kamgresi hom ya phira soshalista! Aja DA. Anamda kumara pucha rahe haim ki ‘‘kya pralesa lekhakom ne kabhi koi kahani, kavita, nataka chamaroti, cheri ya anya kisi dalita basti ko kemdra mem rakhakara likhi hai. lagata to nahim hai.’’ jaise ki unaki rajaniti se juड़e hue lekhaka kabhi pralesa ke amga the hi nahim ! Jahira hai ki anamda kumara ko sahitya mem koi vishesha dilachaspi nahim hai, anyatha unhem ‘anatachebala’, ‘balachanama’, ‘harijana gatha’ aura ‘nachyau bahuta gopala’ jaisi rachanaom ke bare mem pata hota. dalita aura stri prashna para samvedanashilata ke satha paryapta dhyana na dene, unaki samasya ko ‘varga’ ke bhitara hi vicharaniya manane ke lie pragatishila amdolana ki alochana bilkula ki jani chahie, lekina amkha mumdakara unake yogadana ko kharija kara dena apani aj~nanata ka parichaya dena hai. Prales
Pralesa ki sthapana ke bada premachamda lambe samaya taka jivita nahim raha sake, isalie namavaraji kalpana kara sakate haim ki ve pralesa mem na jate taba bhi vahi likhate, jo unhomne likha. yani pralesa mem shamila hone ka premachamda para koi prabhava nahim paड़ta. kya isaka Ashaya yaha lagaya jae ki premachamda apane samaya ke samajika-rajanaitika amdolanom se achute the, ya yaha ki gamdhi se to ve prabhavita ho sakate the, lekina marksavada se nahim? Pucha ja sakata hai ki premachamda pralesa mem na jate to bhi apana vaha aitihasika bhashana de pate, jisamem unhomne sahitya ki kasauti badalane ka ahvana kiya tha? Aura kya isa ahvana ne himdi lekhakom para koi prabhava nahim dala hoga? Pragatishila amdolana ke daurana lekhakom dvara lokajivana ki bhasha ke sarjanatmaka prayoga ki charcha karate hue mainejara pamdeya ne premachamda ke ahvana ke mahatva ko rekhamkita kiya hai. unhomne thika likha hai ki sahitya ko jana-jivana se joड़ne ki prakriya mem ‘‘pragatishila rachanakara ina prayogom se sumdarata ki vaha abhijana kasauti hi badala rahe the.’’ nihsamdeha pralesa ke pahale bhi pragatishilata maujuda thi, lekina vaha pragatishilata na sirpha apani prakrriti mem bhinna thi, balki vaha kisi lekhaka ka vyaktigata chayana hua karati thi. pragatishila amdolana ne janata se pratibaddhata ko sahityakara ka apariharya naitika dayitva bana diya. Samajavadi

Pragatishila Andolana ne bharatiya sahitya mem yugamtara sthapita kiya. vaha sacheta aura samgathita rupa se chalaya gaya pahala akhila bharatiya samskrritika Andolana hai. rajendra yadava ne thika rekhamkita kiya hai ki pragatishila Andolana mem na sirpha vibhinna bharatiya bhashaom ke lekhakom ko Apasa mem joड़a, balki unhem eka amtarrashtriya samdarbha bhi upalabdha karaya. usane sahitya jagata mem abhijata varga ke prati maujuda akarshana ko nirnayaka chunauti di. usane ghoshita kiya ki vamchita-utpiड़ita manavata ka pakshadhara hue bina koi rachana pragatishila nahim ho sakati. pragatishila Andolana ka mahatva dasa-bisa nami lekhakom ko paida karane taka simita nahim hai. usaka mahatva lakhom-karoड़om bejubana bharatavasiyom ki avaja bana jane mem nihita hai. usaka mahatva hajarom loka gayakom aura loka kalakarom ko paida karane mem nihita hai. Marksavad
Jisa taraha bhakti Andolana na hota saikaड़om dalita rachanakarom ko jubana na milati. usi taraha pragatishila Andolana na hota to jana-mana ko jhakajhora kara jaga dene vale ve nimnavargiya kalakara bhi na hue hote. Aja hindi ka Ama pathaka agara una rachanakarom se aparichita hai, to isaliye nahim ki ve kucha kama mahatvapurna the, balki isaliye ki hindi mem alochana aura itihasa lekhana ki abhijata-vyaktivadi paddhati kevala baड़e namom aura baड़e prakashanom se prakashita-pracharita rachanaom para hi apani krripa drrishti dalati hai. jina logom ke liye dalita prashna ka astitva kevala atha-dasa dalita atmakathaom taka simita hai, ve jarura pragatishila Andolana ki sarthakata para savala utha sakate haim; lekina aise logom ko janana chahie ki satha ke dashaka mem hi dalita prashna ko sashakta dhamga se uthane vali eka puri piढ़i taiyara ho chuki thi. unake lekhana ke kendra mem asmita ke nahim, balki astitva ke savala the aura isiliye isa taraha ke phatave unhomne kabhi nahim diye ki sirpha dalita hi dalita samasya para likha sakata hai. eka Andolana aura samgathana ke rupa mem pralesa jarura khatma ho gaya lekina usaki preranaem nahim mari. rajendra yadava ne vimarsha prabhavita samakalina rachanashilata ko uchita hi pragatishila sahitya ke vistara ke rupa mem dekha hai. Shukla
DA. Namavara simha ne udarata ki sabhi hadem toड़te hue himdi sahitya ki puri parampara ko hi pragatishila bata diya hai, mano himdu parampara aura jatigata-jemdaragata purvagrahom se himdi sahitya ka dura-dura taka koi vasta hi na raha ho. sabase jyada Apattijanaka to yaha hai ki isake lie unhomne premachamda ko madhyama banaya hai. ve kahate haim ki ‘‘hamem yaha samajhana chahie ki himdi sahitya ki parampara gaira sampradayika aura svatah sphurta pragatishila rahi hai. shayada isilie premachamda ne kaha ki lekhaka svabhavatah pragatishila hota hai.’’ premachamda ne nihsamdeha kalakara ko svabhavatah pragatishila kaha tha, lekina unake do tuka bhashana mem kahim usa ‘shayada’ ke lie gumjaisha nahim thi, jise namavaraji ne unhem vikrrita karane ke lie apani ora se joड़a hai. premachamda ne apane bhashana mem na to himdi sahitya ko gaira sampradayika bataya tha, na hi svatah sphurta pragatishila. isake ulata unhomne spashta shabdom mem kaha tha ki ‘‘hamane jisa yuga ko abhi para kiya hai, use jivana se koi matalaba na tha. hamare sahityakara kalpana ki eka srrishti khaड़i karake usamem manamane tilisma bamdha karate the.’’ agara purvavarti sahitya ke bare mem premachamda ki yaha dharana thi to unhomne kalakara ko svabhavatah pragatishila kyom kaha?
Isa virodhabhasa ka samadhana tabhi hoga, jaba premachamda ke bhashana ko usaki sampurnata mem dekhem. kala ki abhijata vargiya dharana para prahara karate hue usi bhashana mem premachamda ne kaha ki ‘‘kala nama tha, aura aba bhi hai, samkuchita rupa-puja ka, shabda-yojana ka, bhava nibamdhana ka. usake lie koi Adarsha nahim hai, jivana ka keai umcha uddeshya nahim hai- bhakti, vairagya, adhyatma aura duniya se kinarakashi usaki sabase umchi kalpanaem haim. hamare usa kalakara ke vichara se jivana ka charama lakshya yahi hai. usaki drrishti abhi itani vyapaka nahim ki jivana-samgrama mem saumdarya ka paramotkarsha dekhe.’’ aisi kala aura kalakara ko premachamda ne pragatishila nahim kaha tha. isake viruddha premachamda ne saumdarya ki kasauti ko badalane ka prastava kiya, samaja ko behatara banane ke lie pratibaddha jana pakshadhara kala ki vaikalpika dharana prastavita ki. kala ki isa vaikalpika dharana mem kalakara ki bhi eka Adarsha vaikalpika Chavi amtarnihita hai. unhomne kaha ki ‘‘jo adami sachcha kalakara hai, vaha svarthamaya jivana ka premi nahim ho sakata.’’ isa sachche kalakara ko hi unhomne svabhavatah kalakara kaha tha, dhana aura yasha ke lie chatukarita karane vale jhuthe kalakara ko nahim.
Himdi sahitya ki tathakathita svatah sphurta pragatishilata ke paksha mem namavaraji ne eka aura tarka diya hai ‘‘jisa sahitya mem kabira jaisa bhakta kavi hua ho usa sahitya ki pragatishilata kisi pralesa ke karana paida nahim hui hai.’’ adbhuta itihasabodha hai namavaraji ka, kabira ki pragatishilata aura pralesa ki pragatishilata eka jaisi ho gai hai! Isase to aisa lagata hai ki yadi kabira chahate to pralesa bana sakate the, lekina usaki vyarthatata samajhakara hi unhomne yaha vichara tyaga diya hoga. jisa sahitya (bhasha?) Mem kabira ho gae, usaki pragatishilata svayamsiddha ho gai? Kya usi ‘sahitya’ (!) Mem ritikala nahim hua, tulasidasa nahim hue aura musalamana striyom ki durdasha ko shivaji ki virata ke pramana ki taraha bakhanane vale bhushana nahim hue? Kya jisa bhasha aura desha ne marksa ko janma diya, usi ne hitalara ko paida nahim kiya tha!
Dvivedi ji ki shaili ka anusarana karate hue namavaraji ne pragatishila amdolana ko pragatishila parampara ka svabhavika vikasa batane ki cheshta ki hai. unhomne likha hai ki ‘‘pragatishila lekha samgha ki sthapana ne himdi sahitya ki chali A rahi svabhavika parampara ko aura tvarita kiya. pragatishila lekhaka samgha ne pragatishilata ko janma nahim diya, balki usane hatha lagakara kramashah pragatishilata ki ora unmukha dhara ko aura gati di.’’ arthata kevala matratmaka parivartana kiya, koi yugantara sthapita nahim kiya. yaham pralesa ki 50vim varshagamtha para prakashita namavaraji ke hi nibamdha ‘sahitya mem pragatishila amdolana ki aitihasika bhumika’ ka eka amsha uddhrrita karane ka lobha samvarana nahim kiya ja sakata. yatharthavada aura pralesa ke bare mem ramavilasaji ki manyataom ko prastuta karane ke bada namavara simha ne likha tha ki ‘‘yatharthavada sambamdhi isa dharana se yaha nishkarsha nikalata hai ki yadi pragatishila amdolana na bhi arambha hota to himdi sahitya mem yatharthavada ka vikasa hota hi. sthiti yaha hai ki san 36 se pahale yatharthavada ke satha yatharthavada-virodhi pravrrittiyam bhi kai thim aura unamem se kucha yatharthavada ka abhasa bhi deti thim, kyomki yathartha ko dekhane ki drrishti mem vividhata thi. sahityika pravrrittiyom ke isa jatila samgharsha ko na dekhakara yatharthavada ke svatah sphurta vikasa ki kalpana karana itihasa ki sidhi-sarala vikasavadi drrishti hai, jisaka pragativada se koi sambamdha nahim hai.’’
To kya pralesa ki sthapana ne isa paridrrishya para koi ullekhaniya prabhava dala? Namavaraji ne agale hi paira mem isaka uttara dete hue likha tha ki ‘‘vastutah san 36 ke bada ka himdi sahitya pragatishila amdolana ke sacheta aura samgathita hastakshepa ka phala tha aura use hama chahem to valtara benyamina ke shabdom mem ‘itihasa ke nairamtarya mem visphota’ ki samj~na de sakate haim. usa samaya sahitya mem ‘pragati’ se pragatishila lekhakom ka yahi Ashaya tha. samaja aura samskrriti ke samana hi sahitya bhi samkata ke daura se gujara raha tha. vikasa ki gati ruddha thi. avashyakata thi srrijana ki shaktiyom ke unmochana ki. yaha unmochana hi pragati hai.’’ Aja samaya badala gaya hai, atah namavaraji ke lie ‘pragati’ ka Ashaya bhi badala gaya hai aura pragatishila amdolana ka bhi. pathaka khuda hi taya kara lem ki ukta donom mem se kauna sa Ashaya vastusthiti ke jyada nikata hai.समयान्तर
Ukta badalava ke anurupa hi namavaraji ne DA. Ramavilasa sharma ko bhi ekadama bhinna rupa mem yada kiya hai. aba unhem ramavilasaji pralesa ko ‘samkirnatavada’ ki raha para le jane ke jimmedara nahim, balki usaki raksha ke lie pratibaddha balidani yoddha najara Ane lage haim. 1953 ke pralesa sammelana mem apane upasthita hone ka jikra karate hue namavaraji ne likha hai ki ‘‘shama ko jaba sabha shuru hui to yaha khabara Chanakara AI ki parti netrritva ki ora se yaha samdesha aya hai ki pragatishila lekhaka samgha ko bhamga kara diya jae, kyomki isase phayada kama nukasana adhika ho raha hai. samdesha ajaya ghosha ne bheja tha, jise nambudaripada lekara Ae the. lekina pralesa ki apani karyakarini ne ise manane se inakara kara diya. ramavilasaji ne apane pada se tyagapatra de diya, jise svikara kara liya gaya aura unaki jagaha urdu ke mashahura upanyasakara krrishna chamdara ko pralesa ki kamana saumpi gai.’’
Isa ghatana ka jikra ramavilasaji ne bhi kiya hai, lekina thoड़e pharka ke satha. unhomne likha hai ki ‘‘khule adhiveshana se pahale parti lekhakom ki baithaka mem nambudripada ne ajaya ghosha ka eka patra paढ़kara sunaya. yaha patra lekhakom ke nama nahim tha, nambudripada ke nama tha. usaki do sthapanaem mujhe yada haim: (1) pragatishila lekhaka samgha se labha ki apeksha hani adhika hui hai; (2) use chalate rahem, yaha taya karane se pahale sathiyom ko kai bara socha lena chahie. maimne pucha, yaha raya polita byuro ki hai ya ajaya ghosha ki vyaktigata raya hai? Nambudripada ne kaha, yaha unaki vyaktigata raya hai…. Khule adhiveshana mem kisi ne bhi use bhamga karane ki bata nahim ki. sammelana mem nai karyakarini chuni gai, krrishna chamdara mahasachiva niyukta hue.’’ donom vivaranom mem maujuda pharka hamare lie mahatvapurna hai. ramavilasaji ke kahane ka Ashaya bhi yahi hai ki pralesa mem kamyunista parti ki dilachaspi khatma ho gai thi. isa bata ka samarthana anya tathyom se bhi hota hai. lekina kamyunista parti ne pralesa ko bhamga karane ka prastava kabhi nahim kiya. ramavilasaji ke vivarana mem yaha imanadari hai ki ve na to parti para pralesa ko bhamga karane ka Aropa lagate haim aura na hi isa raya – ki pralesa se ‘hani adhika hui hai’ – ko ‘netrritva’ ki raya batate haim. unhomne spashta dhamga se likha hai ki yaha ajaya ghosha ki vyaktigata raya thi aura unhomne samgha ko chalane sambamdhi nirnaya ki jimmedari lekhakom para choड़ di thi.
Namavara simha ise ‘parti banama ramavilasa sharma’ ka mudda bana dete haim, jisamem parti ke Adesha ke pratirodha svarupa ramavilasaji ne istipha de diya. ramavilasaji kaha rahe haim ki sammelana mem nai karyakarini chuni gai yani lokatamtrika dhamga se anya sadasyom ke satha-satha eka nae mahasachiva ka chunava kiya gaya. unake samarthaka kahate haim ki unhem ‘pada se hata diya gaya’ yani unake satha naimsaphi hui. aura namavara simha kaha rahe haim ki unhomne istipha de diya yani unhomne apana virodha prakata kiya, pralesa ke lie kurbani di. khuda ramavilasaji ke bare mem ina tinom bayanom mem se kisake sahi hone ki sambhavana adhika hai? Namavaraji se baड़a samarthaka ramavilasaji ko kaham milega!
Lekina ramavilasaji ke lie achanaka umaड़i isa sahanubhuti ka karana kya hai? Ho sakata hai ki maujuda pralesa ke sambamdha mame namavaraji khuda ko usi bhumika mem pa rahe hom, jo ukta pralesa mem ramavilasaji ne nibhai thi. lekina isaki sambhavana thoड़i hi hai, na sirpha isalie ki namavara simha ka pralesa ramavilasaji ke pralesa se bhinna hai, balki isalie bhi ki ina donom vidvanom mem bhi paryapta bhinnata rahi hai. eka sambhavana aura bhi hai. ho sakata hai ki ramavilasaji ki pahali barasi (2001) para unaki alochana ke yojanabaddha Ayojana se namavaraji ne jo apayasha kamaya tha, pahali shatavarshiki (2012) para unaka mahimamamdana karake usaka prakshalana karana chahate hom. isa avasara para saikaड़om Ayojana homge, jinamem ramavilasaji ko paढ़ne aura chahane vale logom ke samane namavaraji ko bolana hoga- pragatishila amdolana aura usamem ramavilasaji ki bhumika ki punavryakhya ke jarie ho sakata hai ki namavaraji avasaranukula maukhika alochana ke lie purvabhyasa kara rahe hom, mahaula bana rahe hom.
Pragatishila amdolana ki punavryakhya honi hi chahie. usaki upalabdhiyom hi nahim, usaki simaom aura khamiyom para bhi gambhira bahasa honi chahie. lekhaka ke Upara Alochaka, Alochaka ke Upara parti aura parti ke Upara amtarrashtriya stara para prabhutvashali kamyunista partiyom ke niyamtrana ka jo padanukrama usa daura mem vikasita hua, usane pralesa hi nahim, bharata mem marksavadi rajaniti ko bhi gambhira kshati pahumchai. isa padanukrama ko atmasata kara chuke bahuta se buddhijivi aura karyakarta isilie soviyata samgha ke vighatana ke bada digbhramita aura hatasha dikhai paड़te haim. isa hatasha ki chaya sahara Ayojana mem prakashita adhikamsha buddhijiviyom ki tippaniyom mem pratibimbita hui hai. lekina yaha yada rakhana chahie ki eka behatara duniya ki kalpana manushya ka shashvata svapna hai. ne isa svapna ko bhautika adhara diya, isi duniya mem use sakara kara sakane ki sambhavana di. soviyata samgha ke vighatana se na to vaha svapna khatma ho gaya hai aura na hi usake lie samgharsha karane ki jarurata. pragatishila amdolana isi samgharsha ka eka amga tha aura thika isi vajaha se pragatishila amdolana ki sarthaka punavryakhya makrsavadi drrishtikona se hi ki ja sakati hai, use tilamjali dekara nahim. mumakina hai ki pragatishila amdolana ki gambhira
Vyakhya hamem eka vyapaka kimtu pratibaddha lekhaka samgathana ki jarurata se vakipha karane ke satha-satha usaki svayattata ka sammana karane ki tamija bhi hamem sikha sake

कवितेन्द्र इन्दु kis prales ki bat kar rahe hain aap




  1. PriyankaPriyanka04-29-2012

    very nice article….. yah aaj ke bauddhik logo k liye sochne aur samjhne ka avsar deta hai…

  2. DebateOnlineDebateOnline06-12-2012

    इस बहस से संबंधित एक अन्य लेख देखें प्रलेस के मंच से आरक्षण का विरोध -वीरेन्द्र यादव

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