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रुसी क्रांति का दर्पण : लियो तॉलस्तॉय – लेनिन

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लेनिन के समर्थक और विरोधी दोनों ही साहित्य के प्रति उनके रवैये को व्याख्यायित करने के लिये ‘पार्टी संगठन तथा पार्टी साहित्य’ शीर्षक लेख का हवाला देते हैं। निःसंदेह वह लेख बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल उसके आधार पर लेनिन के बारे में कोई राय निर्मित करना भ्रामक होगा। साहित्य के प्रति एक भिन्न किस्म का दृष्टिकोण लेनिन द्वारा ताॅलस्ताॅय पर लिखे लेखों में देखने को मिलता है। ये लेख ताॅलस्ताॅय के गलत मूल्यांकन से क्षुब्ध होकर लिखे गए थे। ये लेख उत्कृष्ट आलोचना का नमूना हंै, जिनमें ताॅलस्ताॅय की खामियों-खूबियों का पूर्वग्रहहीन मूल्यांकन किया गया है। लेनिन ने ताॅलस्ताॅय में परस्पर विरोधी प्रवृत्तियां एक साथ कार्यरत देखी – एक ओर ‘अति गम्भीर यथार्थवाद’ और दूसरी ओर ‘संसार की सबसे घिनौनी वस्तु-धर्म’ की वकालत भी। लेनिन ने इन प्रवृत्तियों को लेखक का व्यक्तिगत अन्तर्विरोध मानने से इनकार करते हुए इन अंतर्विरोधों के सामाजिक आधार को पहचानने की कोशिश की और कहा कि ताॅलस्ताॅय के नकारात्मक पक्ष उनके वर्गीय संस्कारों की उपज है, जबकि उनका प्रगतिशील पक्ष किसानों के प्रति उनकी सहानुभूति के चलते निर्मित हुआ है, इसलिए ताॅलस्ताॅय कई बार अपनी वर्गीय सीमाओं और पूर्वग्रहों को लांघ जाते हैं। लेखक के ऐतिहासिक महत्व और उसकी समकालीन प्रासंगिकता के बीच के फर्क को समझने के लिहाज से यह लेख बेहद महत्वपूर्ण है। मूलतः प्रोलेतारी पत्रिका में सितम्बर 1908 में प्रकाशित इस लेख का यह अनुवाद 1946 का है, पठनीयता की दृष्टि से सुविधाजनक बनाने के लिये हमने कहीं-कहीं वर्तनी में कुछ परिवर्तन कर दिये हैं। म्कण् . क्मइंजमव्दसपदम
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रूसी क्रांति का दर्पण: लियो ताॅलस्ताॅय
वी.आई.लेनिन

इस महान लेखक का नाम उस क्रांति के साथ जोड़ना जिसे, जैसा कि जाहिर है, वह समझता नहीं था और जिससे दूर ही वह रहता था, पहली नजर में अद्भुत और बनावटी मालूम पड़ सकता है। निसंदेह कोई भी वस्तु अगर किसी प्रक्रिया की ठीक-ठीक प्रतिच्छाया नहीं देती, तो उसे हम दर्पण नहीं कह सकते? लेकिन हमारी क्रांति स्वयं एक असाधारण और उलझी हुई प्रक्रिया है। इस क्रांति में सीधे काम करने वालों और उसमें भाग लेने वालों में बहुत से सामाजिक लोग हैं जो यह नहीं समझते कि क्या हो रहा है और उन्होंने उन ऐतिहासिक कार्यों को भी छोड़ दिया है; जिनको घटनाओं ने उनके सामने ला रखा है। और एक सत्यमेव महान लेखक क्रांति के जरूरी रूपों की प्रतिच्छाया दिये बिना नहीं रह सकता।
कानूनी रूसी प्रेस, जो कि तोलस्तोय केे अस्सीवें वर्षगांठ पर लेखों, पत्रों और नोटों से भरा हुआ था, रूसी क्रांति की रूप-रेखा और उसकी प्रणेता शक्तियों के विश्लेषण में दिलचस्पी नहीं रखता। सारा का सारा प्रेस घृणित ढोंग से भरा पड़ा है – यह ढोंग दो प्रकार का है – ‘सरकारी’ और ‘उदार’। पहला तो किराए के लेखकों का कुघड़ ढोंग है जो कि कल तक ताॅलस्ताॅय पर हमले करने पर तुला था और जो आज तोलस्तोय में देशभक्ति खोज निकालने पर तुला हुआ है और युरोप की नजरों में औचित्य के सभी नियमों को उसके प्रति पालने में लगा हुआ है। हर आदमी जानता है कि इन लेखकों को पैसे मिले हैं और ये किसी को धोखा नहीं दे सकते। लेकिन यह उदारवादी ढोंग बहुत अधिक पैना है और इसलिये बहुत अधिक नुकसान पहुंचाने वाला और खतरनाक है। रेख के कैडेट वालालायकिन्स की बात सुनकर यह धारणा उत्पन्न हो सकती है कि तोलस्तोय के लिए उनकी सहानुभूति जोरदार और पूर्ण है। सचमुच में ‘इस महान ईश्वर अन्वेषक’ के बारे में उनके सोचे-विचारे भाषण और बड़े-बड़े वाक्यांश बिल्कुल ढोंग से भरे हैं क्योंकि रूस का उदारपंथी न तो तोलस्तोयवादी ईश्वर में विश्वास करता है और न तो मौजूदा व्यवस्था की ताॅलस्ताॅयवादी आलोचना के साथ सहानुभूति रखता है। वह अपने को एक प्रचलित नाम के साथ इसलिये शामिल करता है कि उसकी राजनैतिक पूंजी बढ़े – वह राष्ट्रीय विरोध के नेता का रोल अदा कर सके। वह कोशिश करता है कि जोशीले और जोरदार जुमलों के नीचे इस प्रश्न के सीधे और स्पष्ट उत्तर को दबा दे कि तालस्तायवाद में ये स्पष्ट असंगतियां कैसे पैदा होती हैं। उनमें हमारी कं्राति की किन कमियों और कमजोरियों की छाया मिलती है? तालस्तायवादी स्कूल की कृतियों, विचारों और शिक्षाओं की असंगतियां सचमुच अत्यंत स्पष्ट असंगतियां हैं। lenin_photo
एक तरफ वह महान लेखक है जो कि रूसी जीवन का अद्वितीय चित्र ही उपस्थित नहीं करता बल्कि पहले दर्जे का विश्व साहित्य पैदा करता है। दूसरे तरफ वह जमींदार है जो ईसा मसीह के नाम पर शहीद का ताज पहने हुए है।
एक तरफ – सामाजिक झूठों और ढोंगों का अत्यंत मजबूत, सीधा और सच्चा विरोध है। दूसरी तरफ तोलस्तोयवादी अर्थात निष्प्राण, पागलपन की सीमा तक पहुंचा हुआ, गरीबी के नारे लगाने वाला रूसी बुद्धिजीवी है जो कि आम लोगों के सामने अपनी छाती पीट-पीट कर कहता है ‘‘मैं बुरा हूं, मैं गंदा हूं, परंतु मैं नैतिक आत्मशुद्धि के लिये यत्नशील हूं; अब मैं गोश्त नहीं खाता, अब मैं चावल के कटलेट ही खाकर रह जाता हूं।’’
एक तरफ पूंजीवादी शोषण की घोर आलोचना है, सरकारी हिंसा, न्याय के नाटक और सरकारी व्यवस्था का भंडा फोड़ है; धन की बढ़ती और सभ्यता की सफलताओं और गरीबी की बढ़ती श्रमजीवी जनता पर जुल्म और ज्यादती के बीच की असंगतियों की गहराई का उद्घाटन करना है; दूसरी तरफ ‘बुराइयों के अविरोध’ की पागलपन से भरी हुई शिक्षा है। एक तरफ गंभीरतम तथ्यवाद है, और हर तरह के पर्दाें का उद्घाटन है, दूसरी तरफ संसार में मौजूद सबसे घृणित वस्तु धर्म की वकालत है, सरकारी पुरोहितों के स्थान पर आचार और नीति में विश्वास रखने वाले पुरोहितों को ला बिठाना है अर्थात इस प्रकार सबसे पैना और इसलिये सबसे कर्षित प्रकार का पुरोहितवाद है।
सत्य में,
तुम गरीब हो, तुम समृद्धिशालिनी हो,
तुम शक्तिशालिनी हो, तुम असहाय हो,
मां रूस
इन असंगतियों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि ताॅलस्ताॅय न तो मजदूरों का आन्दोलन और न समाजवाद के लिये संघर्ष में उसके रोल को समझ सका, न रूसी कं्राति को। लेकिन टॉलस्टॉय की शिक्षाओं और विचारों की ये असंगतियां आकस्मिक नहीं है, यह उन्नीसवीं सदी की अंतिम तिहाई में रूसी जीवन की असंगतियों की अभिव्यंजना है। पितृसत्तावादी गांव जो कि अभी-अभी गुलामी से मुक्त हुए थे, पूंजी और राज्य के हाथों में हिंसा और लूट के लिये दे दिये गए। किसान अर्थ-व्यवस्था और किसान जीवन की पुरानी नींव जिसने अपने को सचमुच सदियों तक जीवित रखा था, असाधारण गति से टूट गई। और, टॉलस्टॉयवादी विचारों की असंगतियों का मूल्यांकन आज के मजदूर आंदोलन और आज के समाजवाद के दृष्टिकोण से नहीं करना चाहिए (ऐसा मूल्यांकन, निसंदेह आवश्यक है परन्तु इतना ही सब कुछ नहीं है) बल्कि इसका मूल्यांकन उस विरोध के दृष्टिकोण से करना चाहिए जो कि पितृसत्तावादी गांवों की ओर से पूंजीवाद के हमले के खिलाफ उठा, जो कि जनता की बर्बादी और जमीन पर से उनकी बेदखली के खिलाफ उठा। मानवों की मुक्ति के लिये नुस्खे खोज निकालने वाला पैगम्बर तोल्स्तोय हास्यास्पद हो गया है – इसलिये वे रूसी और विदेशी ‘टॉलस्टॉयवादी’ जो कि उसकी शिक्षा के इस सबसे कमजोर पक्ष को रुढ़िवाद बना देना चाहते हैं, नितांत घृणित हैं।
तोल्स्तोय महान है क्योंकि उसकी कृतियों में रूस में पूंजीवादी क्रांति के बढ़ने के साथ करोड़ों रूसी किसान जनता में उठने वाले विचारों और भावों की अभिव्यंजना है; तोल्स्तोय मौलिक है क्योंकि उसके विचार कुल मिलाकर क्षति पहुंचाने वाले होते हुए भी, अपने इसी कुल जोड़ से हमारी क्रांति – किसान-पूंजीवादी का्रंति की विशिष्टताओं को ठीक-ठीक बताते हैं। ऐसा समझ लेने पर पता चलता है कि तालस्ताय के विचारों की असंगतियां उन असंगतिपूर्ण ऐतिहासिक दशाओं की छाया हैं, जिनमें हमारी कं्राति में शामिल होने वाले किसानों के कार्य बंधे हुए थे। एक तरफ सदियों के सामंतवादी जुल्मों और दशाब्दियों के उत्तर-सुधारकाल की तेजी से बढ़ती हुई बरबादियों ने घृणा, क्रोध और निश्चयात्मक दृढ़ता के अंबार लगा दिये थे। सरकारी चर्च, जमींदार और जमींदारी सरकार को बहा ले जाने वाले प्रयत्न – जमीन की मिल्कियत के सभी पुराने रूपों और व्यवस्थाओं को समाप्त करने – जमीन को आजाद कराने – पुलिस श्रेणी की सरकार के स्थान पर छोटे किसानों के स्वतंत्र और बराबरी के आधार पर बनी सामाजिक व्यवस्था के निर्माण के प्रयत्न, हमारी क्रांति में किसानों द्वारा बढ़ाए हुए प्रत्येक ऐतिहासिक कदम में एक डोरी की तरह है और निश्चय ही टॉलस्टॉय के लेखों के सिद्धांत संबंधी विषय कोरे ‘ईसाई अराजकतावाद’ से जिसको उसके विचार संबंधी दृष्टिकोण से निकालकर एक ‘व्यवस्था’ का रूप दिया गया है, कहीं ज्यादा अधिक संबंध किसानों के इस संघर्ष से रखते हैं।
दूसरी तरफ सामाजिक जीवन के नए रूप की ओर बढ़ने की कोशिश करते समय किसान जैसा सामाजिक जीवन चाहते हैं उसकी, अपनी आजादी प्राप्त करने के लिये जिस प्रकार के संघर्ष की आवश्यकता है उसकी, इस संघर्ष में जिस प्रकार के नेताओं की आवश्यकता है उसकी, पूंजीवादी और पूंजीवादी बुद्धिजीवी किसान क्रांति के प्रति कैसा रुख रखेंगे उसकी, और क्यों बड़े-बड़े जमींदारों के हाथ से जमीन छीन लेने के लिये जार की शक्ति को क्रांति के द्वारा समाप्त करना एक आवश्यक भूमिका है उसकी, एक बेहद धुंधली पितृसत्तावादी धार्मिक धारणा उनमें थी।
किसानों के सारे पिछले जीवन ने उन्हें जमींदारों और सरकारी अफसरों से घृणा करना सिखाया था, लेकिन उनको यह नहीं बताया था, न बता सकता था कि अपने सवालों को हल करने के लिये वे जाएं किसके पास। हमारी क्रंाति में एक हद तक किसानों की अल्पसंख्या ने ही सचमुच हिस्सा लिया और क्रांति के लिये संगठन किया और अपने शत्रुओं के लिये जारशाही के साथियों और जमींदारों के रक्षकों को खत्म करने के लिये उन किसानों के एक बहुत छोटे से हिस्से ने हथियार उठाया। अधिकतर किसान रोए और प्रार्थनाएं की, नीति की बातें कहीं और सपने देखे, प्रार्थना पत्र लिखे और लियो निकोलाइविख तॉलस्तॉय की भावना के अनुसार ही ‘प्रार्थना करने वाले’ भेजे!
और, जैसा कि हमेशा ऐसे मामले में होता है राजनीति से टॉलस्टॉयवादी निवृत्ति, राजनीति से टॉलस्टॉयवादी संबंध विच्छेद, राजनीति से उदासीनता और राजनीति की नासमझदारी – इन सबका नतीजा यह हुआ कि केवल एक अल्पमत ने ही सजग क्रांतिकारी सर्वहारा का साथ दिया और बहुसंख्यक किसान बिना किसी सिद्धांत वाले छोटे किस्म के उन पूंजीवादी बुद्धिजीवियों के चक्कर में फंस गए जो कैेडेट होते हुए भी त्रुदोविकों की सभा से भाग निकले, जिन्होंने समझौता कर लिया और समझौता करने का वादा तब तक करते रहे जब तक कि वे हमेशा के लिये सिपाहियों के बूटों की ठोकर खाकर निकाल नहीं दिये गए।
तोल्स्तोयवादी विचार, हमारे किसान बगावत की कमजोरियों और कमियों का दर्पण है। वह पितृसत्तावादी गांव की अदृढ़ता और ‘कंजूस मजिक’ रूसी किसान की स्वभावगत कायरता की प्रतिच्छाया है।
1905-1906 के बागियों का उदाहरण लीजिए; सामाजिक दृष्टि से हमारी क्रांति के ये लड़ाके किसान और सर्वहारा के बीच के थे। चूंकि सर्वहारा अत्यंत अल्पमत में थे, इसलिये फौज के भीतर का आंदोलन रूस भर की पूर्ण एकता के स्तर तक कभी न उठ सका। अथवा उसकी पार्टी श्रेणी सजगता उस तरह की न हो सकी जैसा कि वह सामाजिक प्रजातंत्रवादी होने के बाद हो गई; जैसे किसी ने एक बार हाथ फेर दिया। दूसरी तरफ इससे ज्यादा गलत और दूसरी राय नहीं हो सकती कि बगावत में हार इसलिये हुई कि अफसरों ने उनका नेतृत्व नहीं किया।
इसके उलटे, नरोद्नाया वोल्या के समय से आज तक की क्रांति की महान प्रगति ठीक इस बात में दिखाई पड़ती है कि ‘अब उन जानवरों’ ने जिनकी आजादी ने उदारपंथी जमींदारों और उदारपंथी अफसरों को इतना डरा दिया था, अपने अफसरों के विरुद्ध हथियार उठाए। सिपाही किसानों के हितों से पूरी सहानुभूति रखते थे। जमीन के नाम पर उनकी आंखे चमक उठती थीं। फौज में कितनी बार सिपाहियों ने पेशकदमी की थी – लेकिन इस शक्ति का कोई भी दृढ़ प्रयोग अमल में नहीं लाया गया।
सिपाही हिचकिचाए। कई दिनों बाद – कभी-कभी कई घंटों बाद – एक घृणित सेनापति को मारकर उन्होंने दूसरों को छोड़ दिया, अधिकारियों से समझौते की बातचीत की और चुपके से मौत के घाट उतर गए अथवा कोड़े के आगे अपने शरीर को झुका दिया, जुए में एक बार फिर अपना कंधा झोंक दिया और यह सब हुआ लियो निकोलाइविख तोल्स्तोय की भावना के अनुसार!
तॉलस्तॉय में बटुरी हुई घृणा, आधे जीवन के लिये थकी हुई आकांक्षा, बीते को छोड़ फेंकने की इच्छा दिखाई देती है – और साथ ही अपरिपक्वता, स्वप्नवादी चिंतनात्मकता, राजनैतिक अनुभवहीनता और गांवों की क्रांतिकारी अदृढ़ता भी। ऐतिहासिक आर्थिक दशाएं बताती हैं कि जनता के क्रांतिकारी संघर्ष का उभरना अनिवारणीय है। वे यह भी बताती हैं कि संघर्ष के लिये जनता तैयार नहीं है। बुराई के प्रति उस तोल्स्तोयवादी अविरोध को भी वे बताती हंै जो कि पहले क्रांतिकारी आंदोलनों की असफलता का सबसे मुख्य कारण है।
कहा जाता है कि हारी हुई सेनाएं ही सबसे अधिक सीखती हैं। निश्चय ही, एक क्रांतिकारी श्रेणी और सेना में मुकाबला एक छोटे से हद तक ही किया जा सकता है। पूंजीवाद की विश्रृंखलता उन दशाओं को जिसने कि सामंतवादी जमींदारों और उनकी सरकार के प्रति घृणा के कारण एक हुए करोड़ों किसानों को क्रांतिकारी-प्रजातंत्रवादी संघर्ष में ढकेल दिया, घंटों में बदलती और घंटों में तेज करती है। खुद किसानों के बीच भी विनिमय की उन्नति, बाजार के असर और रुपये की शक्ति पितृसत्तावाद और उसके साथी तॉलस्तॉयवादी विचारधारा को हटाती जा रही है। लेकिन क्रांति के प्रथम वर्षों और जन-क्रांतिकारी संघर्ष की पहली हारों में निश्चय ही एक सफलता मिली। उन्होंने जनता की एक समय की मुलायमियत और अदृढ़ता को मरणांतक आघात पहंुचाया। विलगाव की रेखाएं स्पष्टतर हो गईं। श्रेणियों तथा पार्टियों के लिए सीमाएं निर्धारित हो गईं। स्तोलिविन के शिक्षात्मक हथौड़े के नीचे सामाजिक प्रजातंत्रवादियों के पथारूढ़ संलग्न आंदोलन के जरिये, केवल समाजवादी सर्वहारा के भीतर से ही नहीं, किसानों के प्रजातंत्रवादी जनता के भीतर से भी, निश्चय ही अधिक से अधिक तपे हुए लड़ाके निकलेंगे, जिनकी हमारे तोल्स्तोयवादी ऐतिहासिक पाप के गढ़े में गिरने की संभावना कम से कम होगी। डिबेट ऑनलाइन

Translated by Shri Ram Krishndas
धर्म पर लेनिन के विचार पुस्तक में ‘लियो ताल्स्ताय – रूसी क्रांति के दर्पण के रूप में’ शीर्षक से प्रकाशित (प्रकाशक – इंडिया पब्लिशर्स, इलाहाबाद, 1946)




  1. तोल्सताय को समझने के लिए बेहतरीन आलेख. अपने लेखन में तोल्सतॉय उन गिने—चुने बुर्जुआ बुद्धिजीवियों में से थे, जो अपनी भावुकता और अंतर्मन की नैतिकता के कारण सर्वहारा के साथ खड़े दिखाई पड़ते हैं, किंतु उनके वर्गीय संस्कार कहीं न कहीं ​पीछे की ओर खींचते हैं. वे मार्क्स के वर्ग—संघर्ष से सहानुभूति प्रकट करते हैं, तो गांधी की अहिंसा भी उन्हें अपनी ओर खींचती है. ‘युद्ध और शांति’ के बीच घिरे ताल्सतॉय समतावादी समाज का सपना तो देखते हैं, मगर धर्म के सामंती संस्कार में वह कैसे संभव हो, इसकी कोई ठोस रूपरेखा उनके लेखन में नजर नहीं आती. इसलिए मौलिक और प्रतिभाशाली लेखक के रूप् में वे पूरी दुनिया को प्रभावित करते हैं, मगर विचारक के रूप में उनका अवदान उतना मौलिक नहीं है. कोरी सहानुभूति और स्वप्नदर्शिता के बूते यह संभव भी नहीं था.

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