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Category Archive for: ‘Hindi Anuvad’

पुरुष वर्चस्व का पहला सबक

क्या होता अगर हव्वा ने जेनेसिस लिखी होती ! इंसानी सफर की पहली रात तब कैसी होती ! उसने किताब की शुरुआत ही यह बताते हुए की होती कि वह न तो किसी जानवर की हड्डी से पैदा हुई थी; न ही वह किसी सांप को जानती थी; उसने किसी को सेब भी नहीं दिए थे। ईश्वर ने उससे यह नहीं कह था कि बच्चा जनते समय उसे दर्द होगा और उसका पति उसपर हुकूमत करेगा। वह बताती कि यह सब तो सिर्फ़ झूठ और झूठ है जिसे आदम ने प्रेसवालों को बता ‘इतिहास’ और ‘सच’ का रूप दे दिया था।

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रुसी क्रांति का दर्पण : लियो तॉलस्तॉय – लेनिन

एक तरफ – सामाजिक झूठों और ढोंगों का अत्यंत मजबूत, सीधा और सच्चा विरोध है। दूसरी तरफ तॉलस्तॉयवादी अर्थात निष्प्राण, पागलपन की सीमा तक पहुंचा हुआ, गरीबी के नारे लगाने वाला रूसी बुद्धिजीवी है जो कि आम लोगों के सामने अपनी छाती पीट-पीट कर कहता है ‘‘मैं बुरा हूं, मैं गंदा हूं, परंतु मैं नैतिक आत्मशुद्धि के लिये यत्नशील हूं; अब मैं गोश्त नहीं खाता, अब मैं चावल के कटलेट ही खाकर रह जाता हूं।’’

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बलात्कार – जर्मेन ग्रीयर

अगर शारीरिक हिंसा महिलाओं के लिये अत्यधिक भयावह नहीं होती, तो अधिकांश बलात्कार कभी होते ही नहीं। अगर आप किसी पुरुष का लिंग अपने शरीर में इसलिए प्रविष्ट होने देते हैं क्योंकि वह आपकी नाक काट देगा तो निश्चित तौर पर आप अपनी नाक का कटना कहीं अधिक बुरा मानते हैं; लेकिन मूर्खतापूर्ण कानून आपकी राय से इत्तेफाक नहीं रखता। आपकी नाक काटने की सजा बलात्कार की सजा से कम ही होगी, लेकिन तब आप पर यह संदेह नहीं किया जा सकेगा कि आप अपनी नाक काटे जाने पर सहमत थीं।

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बुद्धिजीवियों का निर्माण – अंतोनियो ग्राम्शी

कहा जा सकता है कि सभी मनुष्य बुद्धिजीवी होते हैं, हालांकि सभी समाज में बुद्धिजीवी की भूमिका नहीं निभाते। जब हम बुद्धिजीवियों और गैर-बुद्धिजीवियों के बीच फर्क करते हैं तो असल में हम बुद्धिजीवियों की पेशेवर श्रेणी की प्राथमिक सामाजिक भूमिका को चिन्हित कर रहे होते हैं, यानी हमारा ध्यान इस बात पर होता है कि उनकी विशेष पेशेवर गतिविधि की दिशा किस ओर है, बौद्धिक व्याख्या की ओर या मांसपेशीय गतिविधियों की ओर।

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लिखने और पढ़ने का सम्बंध – सूसन सोनटैग

प्रायः पढ़ना लिखने से पहले होता है और लिखने की इच्छा भी पढ़ने से ही जागृत होती है। पढ़ना, पढ़ने से प्रेम ही आपको लेखक बनने का सपना दिखाता है। और आपके लेखक बन जाने के बहुत समय बाद भी, दूसरों द्वारा लिखी किताबें–अतीत में पढ़ी गई प्रिय किताबों का पुनर्पठन–लेखन से भटकने का एक जबर्दस्त आकर्षण होता है। भटकाव। सांत्वना। यातना। और हां, प्रेरणा।

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साहित्य और प्रचार – श्रीपाद अमृत डांगे

वर्गबद्ध साहित्य के समाज में आज तक जो-जो ख्यातिलब्ध कलाकृतियाँ हुई हैं, वह सारी प्रचारकीय ही थीं । श्रेष्ठ कला प्रचारकीय होती ही है और बेहतर प्रचार कलात्मक बन जाता है । श्रेष्ठ कला का विषय मनुष्य होने के कारण और मनुष्य का जीवन व भावनाएँ-संवेदनाएँ वर्गबद्ध समाज में वर्गीय गुणों से घिरे होने के कारण कला में वर्गीय रूप आ ही जाता है ।

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पूंजीवाद एक प्रेतकथा – अरुंधती रॉय

लोगों के पास पीने का साफ पानी, या शौचालय, या खाना, या पैसा नहीं है मगर उनके पास चुनाव कार्ड या यूआइडी नंबर होंगे। क्या यह संयोग है कि इनफोसिस के पूर्व सीईओ नंदन नीलकेणी द्वारा चलाया जा रहा यूआइडी प्रोजेक्ट, जिसका प्रकट उद्देश्य ‘गरीबों को सेवाएं उपलब्ध करवाना’ है, आइटी उद्योग में बहुत ज्यादा पैसा लगाएगा जो आजकल कुछ परेशानी में है?

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पर्सनल इज पॉलिटिकल – कैरोल हैनिच

मुझे बहुत ठेस पहुँचती है जब कोई कहे कि मुझे या किसी और स्त्री को मनोचिकित्सा की जरूरत है। क्योंकि स्त्रियाँ अपनी दयनीय स्थिति के लिए स्वयं जिम्मेदार नहीं है, उन्हें इस स्थिति तक पहुँचाया गया है। हमें जरूरत है इस वस्तुस्थिति को बदलने की, न कि अपने उपचार की या स्थिति के अनुसार खुद को ढालने की। उपचार का अर्थ तो अपने खोटे निजी विकल्प के अनुसार स्वयं को ढाल लेने से है।

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निर्वासन चिंतन – एडवर्ड सईद

कई साल पहले मुझे समकालीन उर्दू कविता के महानतम कवि फैज़ अहमद फैज़ के साथ कुछ समय बिताने का मौका मिला था। जियाउल हक की सैनिक सरकार ने उन्हें देश-निकाला दे दिया था और संकटों से जूझ रहे बेरूत में उन्होंने शरण ली थी। …फैज़ मेरी खातिर कविताओं का अनुवाद करते रहे लेकिन जैसे-जैसे रात गहराने लगी, अनुवाद की जरूरत ही नहीं रह गई। जो मैं देख रहा था, उसके अनुवाद की जरूरत नहीं थी

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रंगभेद और पुरुष वर्चस्व का पहला सबक

स्पेन में ऐतिहासिक धार्मिक अदालतों के दौर में कोई भी सिर्फ अपनी नहाने की आदत भर से ही ईसाई धर्म के खिलाफ और इस्लामी तौर-तरीकों वाला मान लिया जा सकता था और इसीलिये जिंदा जला दिया जा सकता था। वास्तव में यूरोप में नहाना बहुत बाद में लोकप्रिय हुआ, लगभग उसी वक्त जब टी.वी. पहले-पहल लोकप्रिय हुआ।
रंगभेद और पुरुष वर्चस्व की पहली सीख

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