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अभिव्यक्ति की आजादी और नाक का सवाल

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अपूर्वानंद ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सवाल मध्यवर्गीय दृष्टिकोण से उठा रहे हैं। उनकी ‘आजादी’ एक खास काट की अभिजात-मध्यवर्गीय आजादी है जो लेखकों-कलाकारों को प्राप्त होनी चाहिए। इरोम शर्मिला, सोनी शोरी से लेकर करोड़ों दलितों-आदिवासियों-स्त्रियों और गरीबों की आवाज जब सत्ता द्वारा अनसुनी कर दी जाती है, कुचल दी जाती है तो उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई हमला होता नहीं दिखाई देता। इस अभिजात्य-मध्यवर्गीय दृष्टिकोण के कारण ही उन्हें मजदूर दिवस के अवसर पर इकट्ठा हुए हजारों लोगों के सरोकारों और रुचियों की उपेक्षा पर भी कोई दर्द नहीं होता। मजदूर दिवस के अवसर पर जे. एन. यू. में आयोजित कार्यक्रम अखबार से लेकर इन्टरनेट तक पर गंभीर और उत्तेजक चर्चा का विषय बन गया है। अपार प्रशंसा के साथ-साथ इस कार्यक्रम की कई आलोचनाएं भी सामने आईं हैं। इनके अलावा कुछ आलोचनाएं ऐसी भी हैं, जिसका संबंध पार्टी लाइन से नहीं, बल्कि राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक-संस्कृतिकर्मी या श्रोता के रूप में हममंे से हर एक की भूमिका से जुड़ा हुआ है। अपूर्वानंद ने 6 मई के जनसत्ता में ‘मई दिवस पर गणपति’ शीर्षक लेख में उक्त अवसर पर त्रिथा को ‘गणपति-गणपति’ पूरा न करने देने को ‘सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या’ का नाम दिया है। मीरा विश्वनाथन के हस्तक्षेप के बाद यह बहस और भी गंभीर हो गयी है। ‘ट।ज्ञत्।ज्न्छक्। ड।भ्।ज्ञ।ल्।३ व्त् ॅभ्।ज् ब्।छछव्ज् ठम् ैन्छळ प्छ ज्भ्म् न्छप्टम्त्ैप्ज्ल्घ्’ शीर्षक लेख में उन्होंने बेहद संवेदनशीलता के साथ इस घटना को ‘सेंसरशिप’ का उदाहरण बताते हुए व्यापक फलक पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सवाल उठाया है। उनकी इस मार्मिक चेतावनी में सच्चाई है कि आज हम अपनी सुविधा के हिसाब से जो चाहे फैसला कर सकते हैं लेकिन उसका अनिवार्य संबंध हमारी नैतिक वैधता से बनता है, भविष्य में हम किस मुंह से सेंसरशिप का विरोध करेंगे अगर आज खुद अपने मंच से किसी को बोलने से रोकते हैं।
चूंकि हम हमेशा से अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करते रहे हैं और भविष्य में भी निश्चित रूप से सेंसरशिप का विरोध करेंगे, इसीलिए इस मुद्दे पर अपनी पोजीशन को स्पष्ट करना हमारे लिए जरूरी हो जाता है। अगर यह मान लिया जाए कि किसी को गाने या बोलने से रोकना हर हालत में ‘अभिव्यक्ति की हत्या’ या ‘सेंसरशिप’ है, तब तो बहस की कोई सूरत ही नहीं बचती। ऐसी स्थिति में हमें इस बात की भी कल्पना कर लेनी चाहिए कि कल को जब हम अपने कमरे में पढ़ या सो रहे हों तो कोई हमारे दरवाजे के बाहर गाने या बजाने लगे तो उसे मना करना भी हमारा अपराध बन जायेगा। लेकिन अगर आपको लगता है कि उसे यह कहने में कोई बुराई नहीं कि भइया मेरे किसी ऐसी जगह जाकर गाओ-बजाओ जहां लोग पसंद करे या किसी को डिस्टर्ब न हो, तो बात की जा सकती है। Article Alochana, Marxvad
‘सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या’ जैसा दिल-दहलाऊ जुमला पटकते हुए अपूर्वानंद ने इस सवाल का उत्तर देने की जरूरत ही नहीं समझी है कि अभिव्यक्ति की आजादी का उसके संदर्भ से कोई लेना-देना होता है कि नहीं, लेकिन मीरा ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि ‘‘व् िबवनतेमए ूम ेममउ जव ींअम ंहतममक जींज जीमतम ंतम सपउपजे जव जीम तिममकवउ व िमगचतमेेपवदण् ठनज ेनतमसल जीमेम सपउपजे ंतम उमंदज जव इम ष्तमंेवदंइसमष्ण्’’ किसी अभिव्यक्ति को रोकने के पीछे ‘रीजनेबल’ कारण क्या हो सकते हैं, इसका उत्तर उनके इस प्रश्न में निहित है कि ‘‘ ॅवनसक ेपदहपदह ं ीलउद जव ळंदंचंजप वद डंल क्ंल ींअम समक जव ं बंतदंहमघ् क्पक पज ंउवनदज जव ींजम.ेचममबीघ् प् िदवजए ूील ेीनज पज नच पदेजमंक व िकमंसपदह ूपजी पज पद जीम जमतउे व िकमउवबतंजपब कमइंजमघ्’’ यानि किसी भी अभिव्यक्ति को रोका जाना तभी उचित है जब वह घृणा फैला रहा हो या उससे दंगा भड़कने की उम्मीद हो ! मुझे लगता है कि यहाँ मीरा ने सेंसरशिप की वही सरकारी परिभाषा ग्रहण कर ली है, जिसका खुद सत्ता मनमाना इस्तेमाल करती है। ‘अभिव्यक्ति’ के पक्ष में इतनी अधिक ‘उदारता’ भी काफी गंभीर स्थितियां पैदा कर सकती है। मसलन कल्पना करें कि आप के ही तर्कों का सहारा लेकर निर्धारित कार्यक्रम की अवहेलना करते हुए दस-बीस और लोग मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन करने का अनुरोध करने लगें तो क्या आप उन्हें इजाजत दे देंगे ? अगर नहीं तो किस तर्क से उन्हें रोकना अभिव्यक्ति पर संेसरशिप नहीं होगा ? कोई बड़ी आसानी से कह सकता है कि वहां पर ऐसा कुछ तो हुआ नहीं था ! लेकिन जब आप किसी सवाल को भविष्य से जोड़ते हुए इतने व्यापक फलक पर उठाते हैं तो आपको उन स्थितियों की कल्पना भी करनी चाहिए जो आपके द्वारा निर्मित की जा रही सैद्धान्तिकी से पैदा हो सकती हंै। कैम्पस में न्ळठड से लेकर बाहर सेमिनारों तक में हम अक्सर देखते हैं कि कोई वक्ता जब ज्यादा लम्बा बोलने लगता है तो संचालक उसे रोकता है और अगर वह तब भी न माने तो माइक ही आॅफ कर दिया जाता है। आपकी माने तो यह भी संेसरशिप या ‘अभिव्यक्ति की हत्या’ का ही एक रूप होगा।
जाहिर है कि हमारे लिए असली सवाल खुद सेंसरशिप कि परिभाषा का है, जिसे मीरा जी ने बिना व्याख्यायित किये उस प्रकरण पर चस्पां कर दिया है और इस तरह त्रिथा को रोके जाने से सहमत हर व्यक्ति पर सेंसरशिप समर्थक होने का आरोप अप्रत्यक्ष ढंग से मढ़ दिया है। इस प्रसंग में मुझे हाई स्कूल में पढ़े निबंध त्नसमे व् िज्ीम त्वंक का एक दृष्टान्त प्रासंगिक लगता है, जो आजादी और उसकी सीमाओं को पहचानने में हमारी सहायता कर सकता है ‘एक सज्जन सुबह-सुबह अपनी छड़ी घुमाते हुए मार्निंग वाक पर जा रहे थे, सामने से आते एक व्यक्ति ने उनकी छड़ी से बचते हुए उनसे सम्हाल कर छड़ी घुमाने की प्रार्थना की। सज्जन बोले की सड़क सार्वजनिक है और छड़ी मेरी, मुझे इस जगह अपनी छड़ी घुमाने की आजादी है। दूसरे व्यक्ति ने कहा कि बिलकुल जनाब! लेकिन आपकी आजादी की सीमा वहीं खत्म हो जाती है, जहाँ से मेरी नाक शुरु होती है। अगर आपकी हरकतें दूसरों के लिए नाजायज परेशानी पैदा करने लगती हंै, तो आपको इस आजादी के औचित्य पर पुनर्विचार करना चाहिए।
किसी कार्यक्रम की मर्यादा भंग करने, उसके सरोकारों को नुकसान पहुंचाने या कार्यक्रम को असफल बना देने वाले प्रयास आजादी नहीं लापरवाही, गैर जिम्मेदारी या फिर बदमाशी होते हैं और उन्हें यथासंभव हानि-रहित ढंग से रोकना ‘संेसरशिप’ नहीं, बल्कि कार्यक्रम से संबंधित हर व्यक्ति का दायित्व है। संेसरशिप वहां होती है जहाँ किसी को अपने मंच से अपनी बात कहने या सार्वजनिक मंच से जायज बात कहने से रोका जाता है। अगर त्रिथा जी को उनके एलबम प्रकाशित करने या म्यूजिक कन्सर्ट करने से रोका जाता है तो वह निःसंदेह सेंसरशिप का उदाहरण होगा और हम सभी उसके खिलाफ आवाज उठायेंगे। लेकिन जब आप किसी अन्य के मंच का इस्तेमाल कर रहे हों तो आपको अनिवार्य रूप से उसे मंच के प्रति जिम्मेदार बनना पड़ता है। अगर हम इस पूर्व शर्त को भुला देंगे तो अवसरवादी लोग अभिव्यक्ति की आजादी का नारा लगाते हुए सार्वजनिक मंचों पर कब्जा कर लेेंगे और अराजक लोग अपने विरोधियों के कार्यक्रमों को तबाह कर डालेंगे। ऐसे में कोई भी किसी कार्यक्रम का आयोजन क्यों करायेगा ? जाहिर है कि सेंसरशिप का संबंध किसी भी किस्म की अभिव्यक्ति को रोकने से नहीं बल्कि औचित्यपूर्ण (त्मंेवदंइसम) अभिव्यक्ति को बाधित करने से है। शोर मचाना भी एक अभिव्यक्ति ही है, लेकिन जाहिर है कि बहुत से मौकों पर अनुचित होने के कारण ही आप इस अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगाते हैं।
जिस तरह से दोनों लेखकांे ने गणपति के उद्भव के जनजातीय स्रोतों की ओर इशारा करते हुए ‘गणपति गायन’ को स्वीकार्य ठहराने की कोशिश की है, वह अभिव्यक्ति की आजादी और उसके औचित्य को लेकर खुद उनके मन में मौजूद उलझन का परिचायक है। अन्यथा अगर तथाकथित अभिव्यक्ति की आजादी ही सर्वोपरि मूल्य है तो फिर गणपति का संबंध जनजातियों से रहा हो, चाहे न रहा हो, इससे क्या फर्क पर पड़ जाता है ? अगर आप अभिव्यक्ति के औचित्य की जरूरत स्वीकार करने के चलते गणपति की प्रगतिशीलता सिद्ध करना चाह रहें तो यह याद रखना चाहिए कि ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्रतीकों के अर्थ बदल जाया करते हैं, इसलिए केवल ‘ओरिजिन’ के आधार के पर किसी प्रतीक की प्रगतिशीलता सिद्ध करने की बजाय उसका ‘डेवलपमेंट’ भी देखा जाना चाहिए, नहीं तो हनुमान चलीसा को भी प्रगतिशील मानना पड़ जायेगा और जाति व्यवस्था को भी। इतना तो अपूर्वानंद को भी स्वीकार करना पड़ा है कि आज ‘गणपति शुद्ध हिंदू देवता है’। इस प्रसंग में मैं मीरा के तर्को को ही दोहराना चाहूंगा ‘‘क्वमे जीम उमतम पउंहम व िब्ीम ळनमअंतं वबबनततपदह वद अवकां इवजजसमे ण्ण्ण्ण्ण् ंससवू ने जव पहदवतम ीपे पबवदपब ेजंजने ंे ं तमअवसनजपवदंतलघ्’’ जाहिर है, बिल्कुल नहीं ! मेरा प्रश्न यह है कि क्या वोद्का की बोतल पर क्रन्तिकारी चेग्वेरा का लेबल लगा देने भर से वोद्का भी क्रान्तिकारी हो उठती है ? क्या वह मई दिवस के कार्यक्रम में बांटे जाने की योग्यता हासिल कर लेती है ? जाहिर है कि बिल्कुल नहीं ! सवाल लेबल का नहीं पूरी अन्तर्वस्तु का है। इसलिए गणपति का नाम ले लेने भर से कोई गीत प्रगतिशील सिद्ध नहीं हो जाता। सवाल यह होता है कि गणपति का नाम लेकर जो कुछ सुनाया जा रहा था, घंटी बजा-बजाकर जिस शैली में सुनाया जा रहा था वह किसी जनजातीय जुड़ाव की अभिव्यक्त था या उसी ब्राहमणवादी प्रक्रिया का, जिसके जरिये एक जनजातीय देवता को हिंदू धर्म में आत्मसात कर लिया गया ? अपूर्वानंद स्वीकार करते हैं कि मई दिवस के साथ गणपति गायन की संगति बैठा पाना मुश्किल है और मीरा भी मानती हैं कि ‘‘लोग कन्सर्ट में गणपति स्तुति सुनने की उम्मीद लेकर नहीं आए थे।’’ ऐसे में तो वह प्रस्तुति अनुचित ही सिद्ध होती है, इससे निपटने करने का यही तरीका हो सकता है कि लोगों (आयोजको़श्रोताओ) की अपेक्षाओं को ही मूर्खतापूर्ण सिद्ध कर दिया जाय। ठीक यही काम अपूर्वानंद करते है। वे मजदूर दिवस का आयोजन करने वाले को दिग्भ्रमित तथा मजदूरों से कटा हुआ बताते हैं और ज्ञान देते हैं कि जो किसी अन्य अवसर पर स्वीकार्य है, वह मजदूर दिवस के अवसर पर भी स्वीकार्य होना चाहिए। इस पर एक टिप्पणीकार ने बिल्कुल ठीक पूछा है कि ‘क्या तेरही के अवसर पर सोहर का गायन भी स्वीकार्य होगा?’ मीरा ने सीधे-सीधे तो यह नहीं कहा है, लेकिन उनका लेख यही साबित करने की कोषिष करता है। उनके लेख के षीर्षक पर ध्यान दें ‘ट।ज्ञत्।ज्न्छक्। ड।भ्।ज्ञ।ल्।३ व्त् ॅभ्।ज् ब्।छछव्ज् ठम् ैन्छळ प्छ ज्भ्म् न्छप्टम्त्ैप्ज्ल्घ्’ सवाल तो मई दिवस का है फिर उन्होंने ‘यूनिवर्सिटी’ क्यों जोड़ा? इसके निहितार्थ पर गौर करें तो समझ आ जाएगा कि म्अमतलजीपदह बवनसक इम ेनदह पद जीम न्दपअमतेपजल ।दक ीमदबम वद जीम डंल कंल ंसेव! (हर चीज विश्वविद्यालय में गाई जा सकती है , इसलिए वह मजदूर दिवस के अवसर पर भी गाई जा सकती है) इस तर्क की विडम्बना तब समझ में आएगी जब कुछ शरारती लोग अम्बेडकर के जन्मदिवस पर आयोजित कार्यक्रमों में जाकर ‘गणपति स्तुति’, मुहर्रम के अवसर पर ‘वन्दे मातरम’ और गणेश चतुर्थी के कार्यक्रम में ‘कल्पना के पुत्र हे भगवान’ गाने की इजाजत मागेंगे और मना करने पर अभिव्यक्ति की हत्या का नारा लगाएंगे।
यह आष्चर्यजनक है कि दोनों लेखकों ने त्रिथा की तीनों प्रस्तुतियों के अर्थ और अंतर्वस्तु पर कोई गंभीर बात कहने की बजाय उसे कुल मिलाकर गणपति के प्रतीक में त्मकनबम कर दिया है। इसका कारण यह हो सकता है कि या तो उसमें औचित्यपूर्ण ठहराने लायक कोई बात ही उन्हें न मिली हो या खुद उन्होंने उसे ध्यान से न सुना हो, उन्हें केवल यही नागवार गुजरा हो कि कोई कुछ भी गा रहा हो उसे क्यूं रोका जाय? आपको न पसंद हो मत ध्यान दीजिए!
मेरे खयाल से यह बेहद गंभीर मुद्दा है। अभिव्यक्ति का अधिकार अनिवार्य रूप से एक जिम्मेदारी की पूर्वापेक्षा रखता है, वह है संबद्ध श्रोताओं द्वारा गंभीरतापूर्वक ध्यान दिये जाने का दायित्व। श्रोताओं के इस दायित्व के बिना अभिव्यक्ति की आजादी एक निरर्थक संवैधानिक अधिकार में बदल जाती है। जिसका आषय केवल यह होता है कि आपको बड़बड़ाने का अधिकार है और हमें उसकी उपेक्षा करने का। जब सरकार या उसके प्रतिनिधि ‘उदारतापूर्वक’ जन आन्दोलनों को प्रदर्षन और नारेबाजी की अनुमति तो देते हैं, लेकिन उनकी जायज मांगों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते तो असल में वे अपने दायित्व की घनघोर उपेक्षा करते हुए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ प्रदान करने का पाखंड कर रहे होते हैं। यह पाखंड भी अभिव्यक्ति के दमन के बराबर ही होता है। इससे सावधान होने की जरूरत इसलिये भी है क्योंकि मीरा जी कार्यक्रम के श्रोताओं से जिस सहनषीलता ;ज्वसतमदबमद्ध और अनुग्रह ;ळतंबमद्ध की मांग कर रही हैं, वह वही पाखंड है जो प्रायः इस बड़प्पन के रूप में प्रकट होता है कि ‘उसको बड़बड़ाने दो तुम क्यों ध्यान देते हो’ या ‘उसको भी अपने मन वाली कर लेने दो, तुम्हारा क्या जाता है!’ यह संवेदनहीनता की स्थिति को प्रोत्साहन देना है, जो अभिव्यक्ति के मूल उद्देष्य -संप्रेषण- को ही खारिज कर देता है।
पुस्तकों, भाषणों, या व्यक्तिगत आयोजनों मेेेेें तो यह बात किसी हद तक सहनीय हो सकती है, क्योंकि वहां श्रोताओं के पास चुनने या उपेक्षा कर देने का विकल्प सुलभ रहता है, लेकिन सरोकारों से जुड़े गंभीर आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रसंग में यह स्थिति बेहद गंभीर रूप धारण कर लेती है। एक वक्ता जब श्रोताओं को बुरी तरह उबा देता है तो वे या तो कार्यक्रम में रुचि लेना बंद कर किन्हीं अन्य गतिविधियों में लग जाते हैं या कार्यक्रम छोड़कर जाने लगते हैं। निसंदेह यह उन सरोकारों को गंभीर क्षति पहुंचाता है जिसके लिये आयोजन किया गया था। अगर श्रोता उन सरोकारों के प्रति गंभीर हुए तो फिर ऐसी स्थितियां उन्हें वक्ता/कलाकार का विरोध करने पर भी मजबूर कर सकती हैं। गणपति गायन के दौरान श्रोताओं की मुखर असहमति दरअसल ‘गणपति’ के प्रति किसी विषेष दुराग्रह की नहीं उस ऊब का स्वाभाविक परिणाम थी जो त्रिथा जी ने समझ में न आ सकने योग्य अपनी तीनों प्रस्तुतियों में कुछ शब्दों के निरंतर दुहराव के जरिये पैदा की थी। उनकी प्रस्तुतियों की असंगति और शैली का उबाऊपन तो उनके पहले गीत में ही प्रकट हो गया था। चूंकि लाल बैंड ने उन्हें इंट्रोड्यूस किया था, इसलिए श्रोताओं को उम्मींद थी की वे आगे कुछ प्रासंगिक भी सुनाएंगी लेकिन ‘गणपति स्तुति’ ने उस ऊब को विरोध के निर्णायक बिंदु तक पहुचा दिया।
अगर श्रोताओं ने त्रिथा के दो गीतों को धैर्यपूर्वक सुना तो क्या यह उनका दायित्व नहीं बनता था कि वे कुछ ऐसा भी सुनाए जिसका कुछ संबंध मजदूर दिवस से भी बनता हो ? कोई कह सकता है कि उन्हें इन चीजों के बारे में नहीं पता था, लेकिन यह जवाब बतौर कलाकार के जिम्मेदारियों और जवाबदेहियों से आपको बरी नहीं करता। आप अपने हित में किसी मंच का इस्तेमाल करने के लिए इतने आतुर हों और खुद उस मंच के बारे में जानने तक की जरूरत आपको न महसूस हो, तो अपनी ही कला के बारे में कैसी गंभीरता प्रकट कर रहें हैं आप?
कार्यक्रम का स्वरूप ही ऐसा था कि मीरा जी को भी स्वीकार करना पड़ता है कि ‘‘ब्समंतसलए चमवचसम कपक दवज बवउम जव जीम बवदबमतज मगचमबजपदह जव ीमंत ं ीलउद जव ळंदंचंजपण्’’ तो फिर त्रिथा की प्रस्तुति भी ‘ब्समंतसल’ अनौचित्यपूर्ण थी। अगर लोग ‘वक्रतुंड महाकाय’ सुनाने की उम्मींद लेकर नहीं आये थे, तो क्या उन्हें जबरदस्ती वह सुनाया जाना उचित होता? और अगर आयोजकों की ना-जानकारी/भूल से वह शुरू हो ही गया, तो समझ में आने के बाद भूल-सुधार करना चाहिए था या नहीं? श्रछन्ैन् ने ठीक यही किया था। यह तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है कि गणपति स्तुति को रोकने का फैसला श्रछन्ैन् के चन्द प्रतिनिधियों ने अपनी विचारधारा के वशीभूत होकर मनमाने ढंग से नहीं लिया, बल्कि हजारों श्रोताओं के विरोध के औचित्य को समझते हुए लिया। यह भी ‘डेमोक्रेसी’ की ही एक अभिव्यक्ति थी। श्रछन्ैन् विश्वविद्यालय के छात्र समुदाय का प्रतिनिधि होता है और अगर जनमत की आवाज जायज है तो उसकेे लिए इससे बड़ा अपराध और कुछ हो ही नहीं सकता कि वह उस जनमत की अवहेलना कर दे। श्रछन्ैन् ने ठीक वही किया जो उसका अपरिहार्य कर्तव्य था। आयोजक/संचालक कलाकारों और श्रोताओं के बीच सेतु की तरह होते हैं और उनकी जवाबदेही दोनों के प्रति होती है। दोनों में विरोध उत्पन्न हो जाने की स्थिति में उन्हें तय करना ही पड़ता है कि किसका पक्ष उचित है।
श्रोताओं से सहनषीलता की मांग करना बिल्कुल जायज है, लेकिन सहनषीलता की कोई सीमा होती है या नहीं? अभिव्यक्ति की आजादी की ही तरह असहमति प्रकट करने का अधिकार भी कोई मायने रखता है या नही? असहमति प्रकट करने की बजाय अगर श्रोतागण अपने को ठगा हुआ महसूस करते हुए कार्यक्रम छोड़कर चले जाते तो कार्यक्रम की असफलता की जिम्मेदारी किस पर होती? याद रखिए अपनी जिम्मेदारी को न समझकर श्रोताओं को उबाने वाला वक्ता/कलाकार असल में बाद वाले ‘जेनुइन परफारमर्स’ की ‘अभिव्यक्तियों’ के लिये संकट खड़ा कर रहा होता है, इसलिये उसकी अभिव्यक्ति के औचित्य का प्रष्न भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना उसकी ‘आजादी’ का !
यह समझ पाना मुश्किल है क्यों अपूर्वानंद और मीरा दोनों ने ही इस घटना के लिए पूरी तरह जिम्मेदार लाल बैंड की भूमिका की ओर संकेत तक नहीं किया, जबकि वो खुद सार्वजनिक तौर पर अपनी गलती स्वीकार कर रहें हैं। यहाँ यह जोड़ना बेहद जरूरी है कि यह स्वीकार उनकी भूल की गंभीरता को बिलकुल कम नहीं करता, क्योंकि भले उन्होंने त्रिथा कि प्रस्तुति के विषय में अनभिज्ञ होने के चलते उन्हें इजाजत दे दी हो, लेकिन ऐसा करके उन्होंने उन्हीं सरोकारों के साथ समझौता किया है, जिनके लिए उन्हें पहचाना और सम्मानित किया जाता है। आखिर आप बिना जाने किसी को एक संस्था की साख का इस्तेमाल करने कैसे दे सकते हैं?निःसंदेह मीरा के सरोकार अपूर्वानंद से भिन्न हैं, इसीलिए वे कुडनकुलम और नोनाडांग की संघर्षरत जनता की आवाज को भी ‘अभिव्यक्ति’ ही मानती हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि अपनी सारी संवेदनशीलता के बावजूद त्रिथा प्रकरण पर उनकी समझ अपूर्वानंद की मान्यताओं का ही परिष्कृत विस्तार बनकर रह जाती है। वे उक्त कार्यक्रम में मौजूद लोगों को श्रोता नहीं बल्कि ‘भीड़’ ;बतवूकद्ध और उनके विरोध को शोर ;नचतवंतद्ध कहकर संबोधित करती हैं। इसका क्या औचित्य है? क्या उन्होंने अंडे, टमाटर या पत्थर फेंके थे या कोई और अशोभनीय व्यवहार किया था? ;क्योंकि तब बात बिल्कुल दूसरी होतीद्ध लेकिन चूंकि वे मानकर चल रहीं हैं कि वह ‘भीड़’ थी और भीड़ से विवेक की उम्मीद नहीं की जा सकती, इसीलिए उसे कोई हक नहीं है फरमाइश करने का कि वह क्या सुनना चाहती है, क्या नहीं!
आश्चर्यजनक है कि लगभग बीस मिनट तक हजारों श्रोताओं द्वारा एक नये कलाकार की असंगत प्रस्तुतियों बरदाश्त करने के बावजूद वे इसे उनके धैर्य या ‘कलाभिव्यक्ति’ को प्रोत्साहन के रूप में नहीं देखते, जबकि तीसरे गीत को बीच में रोकना उन्हें ‘सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या’ या श्रोताओं की ‘अविश्वसनीय असहनशीलता’ का प्रमाण नजर आने लगता है। आखिर श्रोताओं के भी कोई अधिकार होते हैं या नहीं ? यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन दोनों ही लेखों से जो समझ सामने आती है उसके अनुसार श्रोताओं की अपनी कोई ‘एजेंसी’ नहीं होती, कोई अधिकार नहीं होते ! केवल अभिव्यक्ति का अधिकार महत्वपूर्ण होता है और वह मंच पर मौजूद वक्ताओं/कलाकारों के पास होता है। हैरानी की बात है कि त्रिथा के ‘अधिकार’ को लेकर इतने कटिबद्ध ये बौद्धिक हजारों लोगों की असहमति को कोई ‘अभिव्यक्ति’ मानने को तैयार ही नहीं हैं ! ‘कलाभिव्यक्ति’ के प्रति गंभीर रवैये के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि न तो कलाकार श्रोताओं का जर-खरीद गुलाम है कि श्रोता जो मांगें, वही सुनाये; न ही श्रोता कलाकार के बंधुआ मजदूर हैं कि वह जो चाहेगा, वही सुनाएगा, आपको सुनना भी पड़ेगा और ताली भी बजानी पड़ेगी !
इस बात को दोहराया जाना जरूरी है कि सुनने-ध्यान देने के दयित्व के बिना अभिव्यक्ति का अधिकार केवल एक निरर्थक पाखंड है और ठीक यही तथ्य खुद वक्ताओं/कलाकारों के ऊपर यह नैतिक जिम्मेदारी डालता है कि वे अवसर, मंच और श्रोताओं की भी परवाह करें ! अगर आप उनकी मांगों को नहीं सुन सकते तो आपको उनसे यह अपेक्षा करने का क्या अधिकार है कि वे आपकी अभिव्यक्ति को सुने ? संपे्रषण वक्ता और श्रोता से एक साझेपन की अपेक्षा करता है, इस तथ्य की उपेक्षा करके अभिव्यक्ति की रक्षा नहीं की जा सकती। जे. एन. यू. में इस साझेपन के उदाहरण अक्सर देखने को मिल जायेंगे जब जनप्रिय कलाकार कुछ चीजें अपने मन की सुनाते हैं और कुछ श्रोताओं की फरमाइश पर। श्रोताओं की फरमाइश पर कुछ सुनाना कलाकार की विवशता नहीं बल्कि उसके सम्मान, उसकी जनप्रियता का सबूत होता है। उक्त लेखों के जरिए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की जो धारणा प्रस्तावित की गयी है, उसे माने तो होली की पूर्व संध्या पर आयोजित होने वाला ‘चाट सम्मेलन’ अभिव्यक्ति के हनन का भयानक उदाहरण बन जायेगा – क्योंकि वहां ‘अक्षम चाटों’ को ‘जनता की मांग’ पर आयोजकगण ससम्मान कंधे पर उठाकर किनारे लगा देते हैं। लेकिन अगर अभिव्यक्ति के संदर्भ, जिम्मेदारी तथा साझेपन की जरूरत पर ध्यान दें, तो चाट सम्मेलन बहुत कुछ सिखा सकता है। इससे इतना तो समझा ही जा सकता है कि कलाकार बनना भी सीखना पड़ता है और अपनी कला के अनुकूल मंच भी तलाशना पड़ता है।
हजारों श्रोताओं के सरोकारों, समझ और रुचि की उपेक्षा करते हुए गढ़ी गयी ‘पवित्र कला’ की अभिजात्य धारणा खुद कला के लिए भी घातक है। कबीर से लेकर फै़ज़ और लाल बैंड तक को एक रेडिकल आवाज के रूप में प्रतिष्ठित करने का काम आलोचकों ने नहीं, उसी श्रोता समुदाय ने किया है जिसे ‘भीड़’ कहकर इतनी हिकारत से दुत्कारा जा रहा है। ऐतिहासिक प्रक्रिया में कला की अन्तिम परख भी श्रोताओं पर ही निर्भर करती है। कला भी समाज के भीतर ही जन्म लेती है और उसी से खुराक पाकर पलती-बढ़ती है। व्यापक समाज से संवाद न करने वाली और अपने समय के ज्वलंत सवालों से मुंह चुराने वाली कला म्यूजियम की वस्तु बनकर रह जाती है। त्रिथा प्रकरण इसी सच्चाई का एक रूपक है। त्रिथा को गणपति स्तुति पूरी करने से रोका जाना भविष्य में दमनकारी सेंसरशिप के खिलाफ खड़े होने के हमारे नैतिक अधिकार से हमें बिलकुल वंचित नहीं करता, इसके उलट वह वक्ता और श्रोता के रूप में हमें हमारी भूमिकाओं के प्रति आगाह करता है। वह इस बात का नैतिक साहस प्रदान करता है कि लोगों को उनके अधिकार से वंचित करने वाली हर ‘दमनकारी अभिव्यक्ति’ को पूरे विवेक, पूरी गंभीरता और पूरी ताकत के साथ रोका ही जाना चाहिए!अभिव्यक्ति की आजादी और नाक का सवाल
कवितेन्द्र इन्दु Apurvanand ‘abhivyakti ki ajadi’ ka savala madhyavargiya drrishtikona se utha rahe haim| unaki ‘ajadi’ eka khasa kata ki abhijata-madhyavargiya ajadi hai jo lekhakom-kalakarom ko prapta honi chahie| iroma sharmila, soni shori se lekara karoda़om dalitom-adivasiyom-striyom aura garibom ki avaja jaba satta dvara anasuni kara di jati hai, kuchala di jati hai to unhem abhivyakti ki ajadi para koi hamala hota nahim dikhai deta| isa abhijatya-madhyavargiya drrishtikona ke karana hi unhem majadura divasa ke avasara para ikattha hue hajarom logom ke sarokarom aura ruchiyom ki upeksha para bhi koi darda nahim hota| majadura divasa ke avasara para je. Ena. Yu. Mem Ayojita karyakrama akhabara se lekara intaraneta taka para gambhira aura uttejaka charcha ka vishaya bana gaya hai| apara prashamsa ke satha-satha isa karyakrama ki kai alochanaem bhi samane AIM haim| inake alava kucha alochanaem aisi bhi haim, jisaka sambamdha parti laina se nahim, balki rajanaitika-samajika karyakarta, lekhaka-samskrritikarmi ya shrota ke rupa mem hamamame se hara eka ki bhumika se juda़A hua hai| apurvanamda ne 6 mai ke janasatta mem ‘mai divasa para ganapati’ shirshaka lekha mem ukta avasara para tritha ko ‘ganapati-ganapati’ pura na karane dene ko ‘samuhika sahamati se kalabhivyakti ki hatya’ ka nama diya hai| mira vishvanathana ke hastakshepa ke bada yaha bahasa aura bhi gambhira ho gayi hai| ‘Ta|j~nat|jnchak| Da|bh|j~na|l|3 vt .cbh|j b|chachavj Tham ainchala pcha jbhm nchaptamtaipjlgh’ shirshaka lekha mem unhomne behada samvedanashilata ke satha isa ghatana ko ‘semsarashipa’ ka udaharana batate hue vyapaka phalaka para ‘abhivyakti ki ajadi’ ka savala uthaya hai| unaki isa marmika chetavani mem sachchai hai ki Aja hama apani suvidha ke hisaba se jo chahe phaisala kara sakate haim lekina usaka anivarya sambamdha hamari naitika vaidhata se banata hai, bhavishya mem hama kisa mumha se semsarashipa ka virodha karemge agara Aja khuda apane mamcha se kisi ko bolane se rokate haim|
Chumki hama hamesha se abhivyakti ki ajadi ka samarthana karate rahe haim aura bhavishya mem bhi nishchita rupa se semsarashipa ka virodha karemge, isilie isa mudde para apani pojishana ko spashta karana hamare lie jaruri ho jata hai| agara yaha mana liya jae ki kisi ko gane ya bolane se rokana hara halata mem ‘abhivyakti ki hatya’ ya ‘semsarashipa’ hai, taba to bahasa ki koi surata hi nahim bachati| aisi sthiti mem hamem isa bata ki bhi kalpana kara leni chahie ki kala ko jaba hama apane kamare mem padha़ ya so rahe hom to koi hamare daravaje ke bahara gane ya bajane lage to use mana karana bhi hamara aparadha bana jayega| lekina agara Apako lagata hai ki use yaha kahane mem koi burai nahim ki bhaiya mere kisi aisi jagaha jakara gao-bajao jaham loga pasamda kare ya kisi ko distarba na ho, to bata ki ja sakati hai|
‘samuhika sahamati se kalabhivyakti ki hatya’ jaisa dila-dahalau jumala patakate hue apurvanamda ne isa savala ka uttara dene ki jarurata hi nahim samajhi hai ki abhivyakti ki ajadi ka usake samdarbha se koi lena-dena hota hai ki nahim, lekina mira ne spashta shabdom mem svikara kiya hai ki ‘‘v ibavanatemae Uma emamau java imama Mhatamamaka jimja jimatama Mtama sapaupaje java jima timamakavau va imagachatameepavadan Thanaja enatamasala jimema sapaupaje Mtama umamdaja java ima shtamamevadamisamashn’’ kisi abhivyakti ko rokane ke piche ‘rijanebala’ karana kya ho sakate haim, isaka uttara unake isa prashna mem nihita hai ki ‘‘ .cvanasaka epadahapadaha M Ilauda java lamdamchamjapa vada damla kmla imama samaka java M bamtadamhamagh kpaka paja Muvanadaja java imjama.echamamabigh p idavajae uila einaja paja nacha padejamamka va ikamamsapadaha upaji paja pada jima jamataue va ikamauvabatamjapaba kamaimjamagh’’ yani kisi bhi abhivyakti ko roka jana tabhi uchita hai jaba vaha ghrrina phaila raha ho ya usase damga bhada़kane ki ummida ho ! Mujhe lagata hai ki yaha.N mira ne semsarashipa ki vahi sarakari paribhasha grahana kara li hai, jisaka khuda satta manamana istemala karati hai| ‘abhivyakti’ ke paksha mem itani adhika ‘udarata’ bhi kaphi gambhira sthitiyam paida kara sakati hai| masalana kalpana karem ki Apa ke hi tarkom ka sahara lekara nirdharita karyakrama ki avahelana karate hue dasa-bisa aura loga mamcha para apani kala ka pradarshana karane ka anurodha karane lagem to kya Apa unhem ijajata de demge ? Agara nahim to kisa tarka se unhem rokana abhivyakti para samesarashipa nahim hoga ? Koi bada़I asani se kaha sakata hai ki vaham para aisa kucha to hua nahim tha ! Lekina jaba Apa kisi savala ko bhavishya se joda़te hue itane vyapaka phalaka para uthate haim to Apako una sthitiyom ki kalpana bhi karani chahie jo Apake dvara nirmita ki ja rahi saiddhantiki se paida ho sakati hamai| kaimpasa mem nlathada se lekara bahara seminarom taka mem hama aksara dekhate haim ki koi vakta jaba jyada lamba bolane lagata hai to samchalaka use rokata hai aura agara vaha taba bhi na mane to maika hi A.cpha kara diya jata hai| apaki mane to yaha bhi samesarashipa ya ‘abhivyakti ki hatya’ ka hi eka rupa hoga|
Jahira hai ki hamare lie asali savala khuda semsarashipa ki paribhasha ka hai, jise mira ji ne bina vyakhyayita kiye usa prakarana para chaspam kara diya hai aura isa taraha tritha ko roke jane se sahamata hara vyakti para semsarashipa samarthaka hone ka Aropa apratyaksha dhamga se madha़ diya hai| isa prasamga mem mujhe hai skula mem padha़e nibamdha tnasame v ijima tvamka ka eka drrishtanta prasamgika lagata hai, jo ajadi aura usaki simaom ko pahachanane mem hamari sahayata kara sakata hai ‘eka sajjana subaha-subaha apani chada़I ghumate hue marnimga vaka para ja rahe the, samane se Ate eka vyakti ne unaki chada़I se bachate hue unase samhala kara chada़I ghumane ki prarthana ki| sajjana bole ki sada़ka sarvajanika hai aura chada़I meri, mujhe isa jagaha apani chada़I ghumane ki ajadi hai| dusare vyakti ne kaha ki bilakula janaba! Lekina apaki ajadi ki sima vahim khatma ho jati hai, jaha.N se meri naka shuru hoti hai| agara apaki harakatem dusarom ke lie najayaja pareshani paida karane lagati hamai, to Apako isa ajadi ke auchitya para punarvichara karana chahie|
Kisi karyakrama ki maryada bhamga karane, usake sarokarom ko nukasana pahumchane ya karyakrama ko asaphala bana dene vale prayasa ajadi nahim laparavahi, gaira jimmedari ya phira badamashi hote haim aura unhem yathasambhava hani-rahita dhamga se rokana ‘samesarashipa’ nahim, balki karyakrama se sambamdhita hara vyakti ka dayitva hai| samesarashipa vaham hoti hai jaha.N kisi ko apane mamcha se apani bata kahane ya sarvajanika mamcha se jayaja bata kahane se roka jata hai| agara tritha ji ko unake elabama prakashita karane ya myujika kansarta karane se roka jata hai to vaha nihsamdeha semsarashipa ka udaharana hoga aura hama sabhi usake khilapha avaja uthayemge| lekina jaba Apa kisi anya ke mamcha ka istemala kara rahe hom to Apako anivarya rupa se use mamcha ke prati jimmedara banana pada़ta hai| agara hama isa purva sharta ko bhula demge to avasaravadi loga abhivyakti ki ajadi ka nara lagate hue sarvajanika mamchom para kabja kara leemge aura arajaka loga apane virodhiyom ke karyakramom ko tabaha kara dalemge| aise mem koi bhi kisi karyakrama ka Ayojana kyom karayega ? Jahira hai ki semsarashipa ka sambamdha kisi bhi kisma ki abhivyakti ko rokane se nahim balki auchityapurna (tmamevadamisama) abhivyakti ko badhita karane se hai| shora machana bhi eka abhivyakti hi hai, lekina jahira hai ki bahuta se maukom para anuchita hone ke karana hi Apa isa abhivyakti para pabamdi lagate haim|
Jisa taraha se donom lekhakame ne ganapati ke udbhava ke janajatiya srotom ki ora ishara karate hue ‘ganapati gayana’ ko svikarya thaharane ki koshisha ki hai, vaha abhivyakti ki ajadi aura usake auchitya ko lekara khuda unake mana mem maujuda ulajhana ka parichayaka hai| anyatha agara tathakathita abhivyakti ki ajadi hi sarvopari mulya hai to phira ganapati ka sambamdha janajatiyom se raha ho, chahe na raha ho, isase kya pharka para pada़ jata hai ? Agara Apa abhivyakti ke auchitya ki jarurata svikara karane ke chalate ganapati ki pragatishilata siddha karana chaha rahem to yaha yada rakhana chahie ki aitihasika prakriya mem pratikom ke artha badala jaya karate haim, isalie kevala ‘orijina’ ke adhara ke para kisi pratika ki pragatishilata siddha karane ki bajaya usaka ‘devalapamemta’ bhi dekha jana chahie, nahim to hanumana chalisa ko bhi pragatishila manana pada़ jayega aura jati vyavastha ko bhi| itana to apurvanamda ko bhi svikara karana pada़A hai ki Aja ‘ganapati shuddha himdu devata hai’| isa prasamga mem maim mira ke tarko ko hi doharana chahumga ‘‘kvame jima umatama paumhama va ibima lanamaamtam vababanatatapadaha vada avakam ivajajasame NNNNN msasavu ne java pahadavatama Ipe pabavadapaba ejamjane Me M tamaavasanajapavadamtalagh’’ jahira hai, bilkula nahim ! Mera prashna yaha hai ki kya vodka ki botala para krantikari chegvera ka lebala laga dene bhara se vodka bhi krantikari ho uthati hai ? Kya vaha mai divasa ke karyakrama mem bamte jane ki yogyata hasila kara leti hai ? Jahira hai ki bilkula nahim ! Savala lebala ka nahim puri antarvastu ka hai| isalie ganapati ka nama le lene bhara se koi gita pragatishila siddha nahim ho jata| savala yaha hota hai ki ganapati ka nama lekara jo kucha sunaya ja raha tha, ghamti baja-bajakara jisa shaili mem sunaya ja raha tha vaha kisi janajatiya juda़Ava ki abhivyakta tha ya usi brahamanavadi prakriya ka, jisake jariye eka janajatiya devata ko himdu dharma mem atmasata kara liya gaya ? Apurvanamda svikara karate haim ki mai divasa ke satha ganapati gayana ki samgati baitha pana mushkila hai aura mira bhi manati haim ki ‘‘loga kansarta mem ganapati stuti sunane ki ummida lekara nahim Ae the|’’ aise mem to vaha prastuti anuchita hi siddha hoti hai, isase nipatane karane ka yahi tarika ho sakata hai ki logom (Ayojako़shrotao) ki apekshaom ko hi murkhatapurna siddha kara diya jaya| thika yahi kama apurvanamda karate hai| ve majadura divasa ka Ayojana karane vale ko digbhramita tatha majadurom se kata hua batate haim aura j~nana dete haim ki jo kisi anya avasara para svikarya hai, vaha majadura divasa ke avasara para bhi svikarya hona chahie| isa para eka tippanikara ne bilkula thika pucha hai ki ‘kya terahi ke avasara para sohara ka gayana bhi svikarya hoga?’ mira ne sidhe-sidhe to yaha nahim kaha hai, lekina unaka lekha yahi sabita karane ki koshisha karata hai| unake lekha ke shirshaka para dhyana dem ‘Ta|j~nat|jnchak| Da|bh|j~na|l|3 vt .cbh|j b|chachavj Tham ainchala pcha jbhm nchaptamtaipjlgh’ savala to mai divasa ka hai phira unhomne ‘yunivarsiti’ kyom joda़A? Isake nihitartha para gaura karem to samajha A jaega ki mamatalajipadaha bavanasaka ima enadaha pada jima ndapaamatepajala |daka Imadabama vada jima damla kamla Mseva! (hara chija vishvavidyalaya mem gai ja sakati hai , isalie vaha majadura divasa ke avasara para bhi gai ja sakati hai) isa tarka ki vidambana taba samajha mem aegi jaba kucha shararati loga ambedakara ke janmadivasa para Ayojita karyakramom mem jakara ‘ganapati stuti’, muharrama ke avasara para ‘vande matarama’ aura ganesha chaturthi ke karyakrama mem ‘kalpana ke putra he bhagavana’ gane ki ijajata magemge aura mana karane para abhivyakti ki hatya ka nara lagaemge|
Yaha ashcharyajanaka hai ki donom lekhakom ne tritha ki tinom prastutiyom ke artha aura amtarvastu para koi gambhira bata kahane ki bajaya use kula milakara ganapati ke pratika mem tmakanabama kara diya hai| isaka karana yaha ho sakata hai ki ya to usamem auchityapurna thaharane layaka koi bata hi unhem na mili ho ya khuda unhomne use dhyana se na suna ho, unhem kevala yahi nagavara gujara ho ki koi kucha bhi ga raha ho use kyum roka jaya? Apako na pasamda ho mata dhyana dijie!
Mere khayala se yaha behada gambhira mudda hai| abhivyakti ka adhikara anivarya rupa se eka jimmedari ki purvapeksha rakhata hai, vaha hai sambaddha shrotaom dvara gambhiratapurvaka dhyana diye jane ka dayitva| shrotaom ke isa dayitva ke bina abhivyakti ki ajadi eka nirarthaka samvaidhanika adhikara mem badala jati hai| jisaka ashaya kevala yaha hota hai ki Apako bada़bada़Ane ka adhikara hai aura hamem usaki upeksha karane ka| jaba sarakara ya usake pratinidhi ‘udaratapurvaka’ jana andolanom ko pradarshana aura narebaji ki anumati to dete haim, lekina unaki jayaja mamgom para bilkula dhyana nahim dete to asala mem ve apane dayitva ki ghanaghora upeksha karate hue ‘abhivyakti ki ajadi’ pradana karane ka pakhamda kara rahe hote haim| yaha pakhamda bhi abhivyakti ke damana ke barabara hi hota hai| isase savadhana hone ki jarurata isaliye bhi hai kyomki mira ji karyakrama ke shrotaom se jisa sahanashilata ;jvasatamadabamaddha aura anugraha ;latambamaddha ki mamga kara rahi haim, vaha vahi pakhamda hai jo prayah isa bada़ppana ke rupa mem prakata hota hai ki ‘usako bada़bada़Ane do tuma kyom dhyana dete ho’ ya ‘usako bhi apane mana vali kara lene do, tumhara kya jata hai!’ yaha samvedanahinata ki sthiti ko protsahana dena hai, jo abhivyakti ke mula uddeshya -sampreshana- ko hi kharija kara deta hai|
Pustakom, bhashanom, ya vyaktigata ayojanom meeeeem to yaha bata kisi hada taka sahaniya ho sakati hai, kyomki vaham shrotaom ke pasa chunane ya upeksha kara dene ka vikalpa sulabha rahata hai, lekina sarokarom se juda़e gambhira ayojanom aura samskrritika karyakramom ke prasamga mem yaha sthiti behada gambhira rupa dharana kara leti hai| eka vakta jaba shrotaom ko buri taraha uba deta hai to ve ya to karyakrama mem ruchi lena bamda kara kinhim anya gatividhiyom mem laga jate haim ya karyakrama choda़kara jane lagate haim| nisamdeha yaha una sarokarom ko gambhira kshati pahumchata hai jisake liye Ayojana kiya gaya tha| agara shrota una sarokarom ke prati gambhira hue to phira aisi sthitiyam unhem vakta/kalakara ka virodha karane para bhi majabura kara sakati haim| ganapati gayana ke daurana shrotaom ki mukhara asahamati daraasala ‘ganapati’ ke prati kisi vishesha duragraha ki nahim usa Uba ka svabhavika parinama thi jo tritha ji ne samajha mem na A sakane yogya apani tinom prastutiyom mem kucha shabdom ke niramtara duharava ke jariye paida ki thi| unaki prastutiyom ki asamgati aura shaili ka ubaupana to unake pahale gita mem hi prakata ho gaya tha| chumki lala baimda ne unhem imtrodyusa kiya tha, isalie shrotaom ko ummimda thi ki ve Age kucha prasamgika bhi sunaemgi lekina ‘ganapati stuti’ ne usa Uba ko virodha ke nirnayaka bimdu taka pahucha diya|
Agara shrotaom ne tritha ke do gitom ko dhairyapurvaka suna to kya yaha unaka dayitva nahim banata tha ki ve kucha aisa bhi sunae jisaka kucha sambamdha majadura divasa se bhi banata ho ? Koi kaha sakata hai ki unhem ina chijom ke bare mem nahim pata tha, lekina yaha javaba bataura kalakara ke jimmedariyom aura javabadehiyom se Apako bari nahim karata| Apa apane hita mem kisi mamcha ka istemala karane ke lie itane Atura hom aura khuda usa mamcha ke bare mem janane taka ki jarurata Apako na mahasusa ho, to apani hi kala ke bare mem kaisi gambhirata prakata kara rahem haim Apa?
Karyakrama ka svarupa hi aisa tha ki mira ji ko bhi svikara karana pada़ta hai ki ‘‘bsamamtasalae chamavachasama kapaka davaja bavauma java jima bavadabamataja magachamabajapadaha java imamta M Ilauda java lamdamchamjapan’’ to phira tritha ki prastuti bhi ‘bsamamtasala’ anauchityapurna thi| agara loga ‘vakratumda mahakaya’ sunane ki ummimda lekara nahim Aye the, to kya unhem jabaradasti vaha sunaya jana uchita hota? Aura agara ayojakom ki na-janakari/bhula se vaha shuru ho hi gaya, to samajha mem Ane ke bada bhula-sudhara karana chahie tha ya nahim? Shrachanain ne thika yahi kiya tha| yaha tathya behada mahatvapurna hai ki ganapati stuti ko rokane ka phaisala shrachanain ke chanda pratinidhiyom ne apani vicharadhara ke vashibhuta hokara manamane dhamga se nahim liya, balki hajarom shrotaom ke virodha ke auchitya ko samajhate hue liya| yaha bhi ‘demokresi’ ki hi eka abhivyakti thi| shrachanain vishvavidyalaya ke chatra samudaya ka pratinidhi hota hai aura agara janamata ki avaja jayaja hai to usakee lie isase bada़A aparadha aura kucha ho hi nahim sakata ki vaha usa janamata ki avahelana kara de| shrachanain ne thika vahi kiya jo usaka apariharya kartavya tha| Ayojaka/samchalaka kalakarom aura shrotaom ke bicha setu ki taraha hote haim aura unaki javabadehi donom ke prati hoti hai| donom mem virodha utpanna ho jane ki sthiti mem unhem taya karana hi pada़ta hai ki kisaka paksha uchita hai|
Shrotaom se sahanashilata ki mamga karana bilkula jayaja hai, lekina sahanashilata ki koi sima hoti hai ya nahim? Abhivyakti ki ajadi ki hi taraha asahamati prakata karane ka adhikara bhi koi mayane rakhata hai ya nahi? Asahamati prakata karane ki bajaya agara shrotagana apane ko thaga hua mahasusa karate hue karyakrama choda़kara chale jate to karyakrama ki asaphalata ki jimmedari kisa para hoti? Yada rakhie apani jimmedari ko na samajhakara shrotaom ko ubane vala vakta/kalakara asala mem bada vale ‘jenuina parapharamarsa’ ki ‘abhivyaktiyom’ ke liye samkata khada़A kara raha hota hai, isaliye usaki abhivyakti ke auchitya ka prashna bhi utana hi mahatvapurna hota hai, jitana usaki ‘ajadi’ ka !
Yaha samajha pana mushkila hai kyom apurvanamda aura mira donom ne hi isa ghatana ke lie puri taraha jimmedara lala baimda ki bhumika ki ora samketa taka nahim kiya, jabaki vo khuda sarvajanika taura para apani galati svikara kara rahem haim| yaha.N yaha joda़na behada jaruri hai ki yaha svikara unaki bhula ki gambhirata ko bilakula kama nahim karata, kyomki bhale unhomne tritha ki prastuti ke vishaya mem anabhij~na hone ke chalate unhem ijajata de di ho, lekina aisa karake unhomne unhim sarokarom ke satha samajhauta kiya hai, jinake lie unhem pahachana aura sammanita kiya jata hai| Akhira Apa bina jane kisi ko eka samstha ki sakha ka istemala karane kaise de sakate haim?Nihsamdeha mira ke sarokara apurvanamda se bhinna haim, isilie ve kudanakulama aura nonadamga ki samgharsharata janata ki avaja ko bhi ‘abhivyakti’ hi manati haim| lekina vidambana yaha hai ki apani sari samvedanashilata ke bavajuda tritha prakarana para unaki samajha apurvanamda ki manyataom ka hi parishkrrita vistara banakara raha jati hai| ve ukta karyakrama mem maujuda logom ko shrota nahim balki ‘bhida़’ ;batavukaddha aura unake virodha ko shora ;nachatavamtaddha kahakara sambodhita karati haim| isaka kya auchitya hai? Kya unhomne amde, tamatara ya patthara phemke the ya koi aura ashobhaniya vyavahara kiya tha? ;kyomki taba bata bilkula dusari hotiddha lekina chumki ve manakara chala rahim haim ki vaha ‘bhida़’ thi aura bhida़ se viveka ki ummida nahim ki ja sakati, isilie use koi haka nahim hai pharamaisha karane ka ki vaha kya sunana chahati hai, kya nahim!
Ashcharyajanaka hai ki lagabhaga bisa minata taka hajarom shrotaom dvara eka naye kalakara ki asamgata prastutiyom baradashta karane ke bavajuda ve ise unake dhairya ya ‘kalabhivyakti’ ko protsahana ke rupa mem nahim dekhate, jabaki tisare gita ko bicha mem rokana unhem ‘samuhika sahamati se kalabhivyakti ki hatya’ ya shrotaom ki ‘avishvasaniya asahanashilata’ ka pramana najara Ane lagata hai| Akhira shrotaom ke bhi koi adhikara hote haim ya nahim ? Yaha durbhagyapurna hai, lekina donom hi lekhom se jo samajha samane ati hai usake anusara shrotaom ki apani koi ‘ejemsi’ nahim hoti, koi adhikara nahim hote ! Kevala abhivyakti ka adhikara mahatvapurna hota hai aura vaha mamcha para maujuda vaktaom/kalakarom ke pasa hota hai| hairani ki bata hai ki tritha ke ‘adhikara’ ko lekara itane katibaddha ye bauddhika hajarom logom ki asahamati ko koi ‘abhivyakti’ manane ko taiyara hi nahim haim ! ‘kalabhivyakti’ ke prati gambhira ravaiye ke lie yaha samajhana behada jaruri hai ki na to kalakara shrotaom ka jara-kharida gulama hai ki shrota jo mamgem, vahi sunaye; na hi shrota kalakara ke bamdhua majadura haim ki vaha jo chahega, vahi sunaega, Apako sunana bhi pada़ega aura tali bhi bajani pada़egi !
Isa bata ko doharaya jana jaruri hai ki sunane-dhyana dene ke dayitva ke bina abhivyakti ka adhikara kevala eka nirarthaka pakhamda hai aura thika yahi tathya khuda vaktaom/kalakarom ke Upara yaha naitika jimmedari dalata hai ki ve avasara, mamcha aura shrotaom ki bhi paravaha karem ! Agara Apa unaki mamgom ko nahim suna sakate to Apako unase yaha apeksha karane ka kya adhikara hai ki ve apaki abhivyakti ko sune ? Samperashana vakta aura shrota se eka sajhepana ki apeksha karata hai, isa tathya ki upeksha karake abhivyakti ki raksha nahim ki ja sakati| je. Ena. Yu. Mem isa sajhepana ke udaharana aksara dekhane ko mila jayemge jaba janapriya kalakara kucha chijem apane mana ki sunate haim aura kucha shrotaom ki pharamaisha para| shrotaom ki pharamaisha para kucha sunana kalakara ki vivashata nahim balki usake sammana, usaki janapriyata ka sabuta hota hai| ukta lekhom ke jarie ‘abhivyakti ki ajadi’ ki jo dharana prastavita ki gayi hai, use mane to holi ki purva samdhya para Ayojita hone vala ‘chata sammelana’ abhivyakti ke hanana ka bhayanaka udaharana bana jayega – kyomki vaham ‘akshama chatom’ ko ‘janata ki mamga’ para ayojakagana sasammana kamdhe para uthakara kinare laga dete haim| lekina agara abhivyakti ke samdarbha, jimmedari tatha sajhepana ki jarurata para dhyana dem, to chata sammelana bahuta kucha sikha sakata hai| isase itana to samajha hi ja sakata hai ki kalakara banana bhi sikhana pada़ta hai aura apani kala ke anukula mamcha bhi talashana pada़ta hai|
Hajarom shrotaom ke sarokarom, samajha aura ruchi ki upeksha karate hue gadha़I gayi ‘pavitra kala’ ki abhijatya dharana khuda kala ke lie bhi ghataka hai| kabira se lekara phai़ja़ aura lala baimda taka ko eka redikala avaja ke rupa mem pratishthita karane ka kama alochakom ne nahim, usi shrota samudaya ne kiya hai jise ‘bhida़’ kahakara itani hikarata se dutkara ja raha hai| aitihasika prakriya mem kala ki antima parakha bhi shrotaom para hi nirbhara karati hai| kala bhi samaja ke bhitara hi janma leti hai aura usi se khuraka pakara palati-badha़ti hai| vyapaka samaja se samvada na karane vali aura apane samaya ke jvalamta savalom se mumha churane vali kala myujiyama ki vastu banakara raha jati hai| tritha prakarana isi sachchai ka eka rupaka hai| tritha ko ganapati stuti puri karane se roka jana bhavishya mem damanakari semsarashipa ke khilapha khada़e hone ke hamare naitika adhikara se hamem bilakula vamchita nahim karata, isake ulata vaha vakta aura shrota ke rupa mem hamem hamari bhumikaom ke prati agaha karata hai| vaha isa bata ka naitika sahasa pradana karata hai ki logom ko unake adhikara se vamchita karane vali hara ‘damanakari abhivyakti’ ko pure viveka, puri gambhirata aura puri takata ke satha roka hi jana chahie! Kavitendra Indu




  1. Kavita KrishnanKavita Krishnan05-15-2012

    आपने विस्तार से उन सारे तर्कों को बखूबी रखा है जिन्हें कहे जाने की ज़रूरत थी

  2. digamberdigamber05-16-2012

    “हँसुआ के वियाह में खुरपी का गीत” गाने वालों को शराफत से रोंक देना, वह भी दो गीत झेल लेने के बाद, इसे अभिव्यक्ति की हत्या और बड़े-बड़े वैचारिक-दार्शनिक सवालों से सजाना वितण्डा के सिवा कुछ नहीं. आप का जवाब ठीक है.

  3. sudhir sumansudhir suman05-17-2012

    कुतर्को की जैसी भरमार और वैचारिक लफ्फाजी जनसत्ता से लेकर विभिन्न ब्लोग्स पर नज़र आ रही थी, उसका बिलकुल तार्किक जवाब दिया है कवितेंद्र ने. मैं तो लगातार व्यस्तता में कुछ लिख नहीं पाया, पर मेरी बात जैसे इसमें पूरी तरह आ गई. उस रोज दर्शकों में मैं भी था.

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