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Monthly Archive for: ‘March, 2012’

दो दशकों की गवाही

यह हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील परंपरा की बहुआयामिता कहिए, या प्रगतिशील आंदोलन की व्यापकता कि हिन्दी साहित्य में आधिकारिक रूप से कोई दक्षिणपंथ नहीं मौजूद है, ले-देके इन प्रवृत्तियों का जो पोषक समूह मौजूद है, वह कलावादियों के रूप में मौजूद रहा है। ऐसी स्थिति में (कम से कम हिन्दुस्तान में तो जरूर) लिबास बदलने वाले ‘उत्तर’ मार्क्सवादियों के लिए पूँजीपति-बुर्जुआ वर्ग की गोद में बैठने के सिवा कोई और विकल्प शेष नहीं था।

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दलित साहित्य 2011

अम्बेडकरवाद को दलित विमर्श का वैचारिक आधार बताते हुए उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि अम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकार करना कोई भूल नहीं थी, बल्कि दलितों को सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिये सुविचारित ढंग से उठाया गया एक राजनैतिक कदम था। उनका मानना है कि दलित लेखकों के बीच जाति के सवाल पर दो धड़े हैं, एक वे ‘जो जातिवाद का विघटन चाहते हैं, दूसरे वे जो जातिवाद का प्रतिष्ठापन चाहते हैं।’

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जय भीम कॉमरेड

किसी भी तरह की अस्मितावादी राजनीति की मजबूती और अपने समाज पर उसकी पकड़ को जानने के लिए उनके सांस्कृतिक उत्सव एक उम्दा औजार के रूप में काम करते हैं। अकारण नहीं है कि आनंद ने इस औजार का भरपूर इस्तेमाल किया है और फिल्म को रोचक, नाटकीय तथा संगीतमय बनाने में इस औजार का काफी योगदान है।

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दलित साहित्य 2010

दलित प्रश्न के संदर्भ में वर्ष 2010 में यह एक नई बात देखने को मिली है कि विमर्शपरक लेखन की ओर लेखकों का झुकाव बढ़ा है, जबकि सर्जनात्मक कृतियों की संख्या कम हुई है। हर बार की तरह उपन्यास विधा उपेक्षित ही रही है, लेकिन कहानियों का अभाव नहीं रहा है। रजतरानी मीनू द्वारा संपादित कहानी संग्रह हाशिये से बाहर अनामिका पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली से प्रकाशित हुआ।

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किस प्रलेस की बात कर रहे हैं आप

जो नामवर सिंह ‘साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका’ लिखकर रामविलासजी की उक्त मान्यताओं का प्रतिवाद कर रहे थे, आज वही उन मान्यताओं को दोहरा रहे हैं। नामवरजी ही नहीं प्रगतिशील आंदोलन की चर्चा करने वाले अधिकांश विद्वान चाहे वह रेखा अवस्थी हों, कर्णसिंह चैहान हों या सहारा आयोजन में शामिल रवींद्र त्रिपाठी और विश्वनाथ त्रिपाठी हों, रामविलासजी के हवाले से ही प्रगतिशील आंदोलन को समझते-समझाते हैं।

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दलित साहित्य 2009

हिंदी में मुख्यधारा का मिथक टूट चुका है, अब इसमें स्त्री विमर्श और दलित विमर्श जैसी मुख्य धाराएं हैं। दलित साहित्य ने इसमें पिछले वर्षो में अपनी इतनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है कि अब तथाकथित मुख्यधारा भी दलित विमर्श के संदर्भ में परिभाषित होने लगी है, अब उसे गैर-दलित साहित्य कहा जाने लगा है। वर्ष 2009 में भी दलित विमर्श से संबंधित कई महत्वपूर्ण कृतियां प्रकाशित हुई हैं

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हमारे बारे में

देश की शिक्षित जनसंख्या पर नजर डालें तो यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि पत्रिकाएं एक छोटे से तबके तक सीमित होकर रह गयी हैं। कुछ हजारों की संख्या वाले इस तबके को हम अकादमिक एलीट कह सकते हैं। यानी बहस जिनके नाम पर की जा रही है, उनकी ही पहुंच से दूर है। हम ये तो नहीं कह सकते कि पत्रिकाएं गैर जरूरी मुद्दों को उठा रहीं है, बावजूद इसके बाजार (जिसका स्वरूप प्रभु वर्ग ही तय करता है) के प्रभाव को नजरंदाज करना उनके लिये मुश्किल होता है।

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